इमरजेंसी तब और अब : आपातकाल के 50 वर्ष के बाद का मंजर

डॉ. सुनीलम

50 साल पहले 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रायबरेली का चुनाव रद्द किए जाने के बाद इस्तीफा देने की बजाय देश पर इमरजेंसी थोप दी थी। विपक्ष के सभी नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। राष्ट्रपति संविधान प्रमुख होते हैं लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति ने इमरजेंसी लगाने पर आपत्ति करने की बजाय सहमति दे दी थी। इमरजेंसी लगने के तुरंत बाद न तो जनता सड़क पर उतरी, न मीडिया ने लोकतंत्र की रक्षा करने में कोई दिलचस्पी दिखाई, कार्यपालिका लंबलेट हो गई थी। मतलब यह कि इंदिरा गांधी के एक फैसले ने चारों स्तंभों को एक झटके में ध्वस्त कर दिया था।
जॉर्ज फर्नांडिस और अनेक समाजवादी  साथियों ने भूमिगत होकर इमरजेंसी का विरोध किया। उन्हें देश में सत्ता पलटने (देशद्रोह) के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था।
आज आपातकाल के 50 वर्ष पूरे हुए है। देश भर में भाजपा ने काला दिवस’ मनाया है ।
50 साल के बाद के हालातों पर नजर  दौड़ाना जरूरी है। 2014 से नरेंद्र मोदी – अमित शाह ने सत्ता संभाली है उनके द्वारा अपने हर फैसले पर राष्ट्रपति की मोहर लगवा ली जाती है।
कोरोना काल में अचानक लॉकडाउन कर दिया गया, अचानक नोटबंदी कर दी गई, राज्यों में विपक्ष की चुनी हुई 10 सरकारों को अलोकतांत्रिक तरीके से गिराकर भाजपा द्वारा कब्जा कर लिया गया लेकिन राष्ट्रपति ने चूं तक नही की। राज्यपाल विपक्ष की सरकारों को अस्थिर और परेशान करने में व्यस्त रहे। उन्हें आंख बंद करके राष्ट्रपति का समर्थन मिलता रहा।
इंदिरा गांधी के समय में संजय गांधी और उनकी टोली सत्ता का केंद्र बनी हुई थी, जिसे हर मनमानी करने की छूट थी। आज संघ परिवार, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और उनसे जुड़े संगठन भाजपा और एनडीए की सरकारों की एक्स्ट्रा कांस्टीट्यूशन अथॉरिटी बने हुए हैं। गौ रक्षा के नाम पर  उन्हें लिनचिंग करने, लव जिहाद, गृह वापसी और धर्म परिवर्तन के नाम पर तांडव करने की छूट मिली हुई है।
इंदिरा गांधी के समय में मीडिया में किसी की हिम्मत नही थी कि वे सरकार के खिलाफ कोई बयान दे और उसे कोई छापे। आज सरकार का विरोध करने वाले तमाम लोगों पर सरकार के इशारे पर पुलिस प्रशासन द्वारा फर्जी मुकदमें   लगाए जाते हैं । दिल्ली दंगे, भीमा कोरेगांव के नाम पर सैकड़ों लोगों को जेल में डाला गया है। मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि पूरे समाज में नफरत, हिंसा फैलाने और बांटने की रही है। मणिपुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मैतेई और कुकी के बीच में नफरत और हिंसा का यह आलम है कि मैतेई के गांव में कोई कुकी और कुकी के गांव में कोई मैतेई नहीं रह सकता।
जहां तक मानव अधिकारों का सवाल है, पूरे जम्मू कश्मीर को सरकार ने जेल में तब्दील कर दिया गया है। असंवैधानिक तरीके से 5 अगस्त  2019 को जब धारा 370 को हटाया गया तथा राज्य का विभाजन किया गया, उसके बाद लगभग 2 वर्षों तक सभी पूर्व मुख्यमंत्री नजर बंद रहे। कश्मीर की इंटरनेट सेवाओं को बंद रखा गया । आज भी बिना किसी पूछ-परख के कश्मीर में युवाओं को फर्जी मुकदमें लगाकर बंद रखा गया है। हाल ही में बस्तर में माओवाद खत्म करने के नाम पर जो कुछ किया गया है वह अभूतपूर्व है। पिछले 1 साल में 500 से अधिक निर्दोष आदिवासियों की माओवादी बताकर हत्या कर दी गई। देश भर में जहां कहीं भी जन आंदोलन चल रहे हैं, वहां सैकड़ों फर्जी मुकदमें आंदोलनकारियों पर लगाए जा रहे है।
संसद में ताकत की तुलना यदि की जाए तो पता चलता है कि पांचवीं लोकसभा में 1971 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस को 360 सीटें मिली थीं। जनसंघ के पास 22 सीटें थी, समाजवादियों के पास केवल 5, कांग्रेस (ओ) की 16 सीटें थीं । लेकिन जनता पार्टी बनने के बाद कांग्रेस हार गई थी। जनता पार्टी को अकेले 43.2% वोट और गठबंधन को 50% से अधिक वोट मिला था। लेकिन सभी यह स्वीकार करेंगे कि यदि चुनाव आयोग और चारों केंद्रीय एजेंसियां आज की तरह केंद्र सरकार की गुलाम होती तो शायद कांग्रेस को हराना मुश्किल हो जाता, भले ही जनता पार्टी
सरकार बना लेती।
आपातकाल के 50 वर्ष बाद भा ज पा 303 से घट कर  2024 मे 240 पर सिमट गई है। यानी 50 वर्ष पहले की तुलना में विपक्ष अत्यधिक मजबूत है। समाजवादी तब 5 थे आज समाजवादी पार्टी के  37 सांसद हैं।
संसद और सड़क पर जो भी स्थिति हो लेकिन यह निष्कर्ष निकाला ही जाना चाहिए कि आपातकाल का वायरस अभी देश में न केवल जिंदा है बल्कि और विकृत और जहरीला होकर समाज और देश को हर स्तर को प्रदूषित और खंडित कर रहा है।
इंदिरा गांधी ने लिखित तौर पर मौलिक अधिकारों और न्यायिक अधिकारों को खत्म किया था लेकिन मोदी सरकार पूरे संविधान को ही ध्वस्त करने पर आमादा है ।
जिस समय देश में इंदिरा का आपातकाल लागू हुआ था तब   गुजरात- बिहार के छात्र आंदोलन से चुनौती मिली थी। जिसका नेतृत्व लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने किया था। रेलवे मजदूर की हड़ताल ने इंदिरा गांधी सरकार की चूलें  हिला दी थी।
हम उम्मीद करते हैं कि इस बार लोकतंत्र की बहाली संयुक्त किसान मोर्चा (सभी किसान संगठनों ) एवं केंद्रीय श्रमिक संगठनों (सभीं मजदूर संगठनों) और नागरिक समाज के संगठनों के नेतृत्व में लड़ी जाएगी, जिसका समर्थन इंडिया गठबंधन की 26 पार्टियों के 234 सांसद तथा हजारों विधायक करेंगे।
50 वर्ष जो नाउम्मीदी थी वह आज बिल्कुल भी नहीं है । भविष्य संभावनाओं से भरा हुआ है। केवल भा ज पा के 37% वोटरों के अलावा 63% वोट पाने वाले संपूर्ण विपक्ष को एकजुट करने की जरूरत है।

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