आपातकाल, तिहाड़ जेल में कमाई

प्रोफेसर राजकुमार जैन

यूं तो मैं अनेक बार, अनेक जेल में बंदी रहा हूं। परंतु आपातकाल में तिहाड़ जेल के बंदी जीवन में जो प्राप्त हुआ, उसे शायद ही कही और पा सकता। मैंने महात्मा गांधी के बारे में केवल पढ़ा तथा सुना ही था, परंतु दो लोगों की संगत से थोड़ा बहुत जान पाया। एक लाला रूपनारायण तथा दूसरे सोशलिस्ट नेता मधु लिमए। रूप नारायण जी अंबाला जेल से ट्रांसफर होकर दिल्ली की जेल में आए थे, जाहिर था कि उन्हें सोशलिस्टों के साथ ही रहना था। दो नंबर वार्ड के नारकीय जीवन से जब 16 नंबर वार्ड में ट्रांसफर हो गया तो मैंने फौरन एक कोठरी (Cell) पर कब्जा जमा लिया। सुरेंद्र मोहन जी भी जेल आ चुके थे, मैंने साफ तौर पर कह दिया कि मैं सेल किसी और से साझा नहीं करूंगा। परंतु कुछ दिन बाद मैं देखता हूं की रूपनारायण जी अपने सामान सहित मेरे सेल पर आ गए। मैं शुरू से उनकी बेइंतहा इज्जत करता हूं। ईट सीमेंट से बने लेटने के प्लेटफार्म से अपना बिस्तर हटाकर मैंने रूप जी का बिस्तर बिछा दिया तथा अपना बिस्तर नीचे जमीन पर कोने में लगा लिया। रूप जी ने बहुत मना किया तथा कहा कि मैं जमीन पर सोने का आदी हूं, तुम ऊपर ही रहो, परंतु ऐसा कैसे हो सकता था। रूप जी को मेरे सेल में भेजने की होशियारी सुरेंद्र मोहन जी ने की थी, वे जानते थे की राजकुमार उनको मना नहीं कर सकता।
परंतु रूप नारायण जी के साथ रहना मेरे जेल जीवन की सबसे बड़ी कमाई बन गया। मैंने रूप जी के माध्यम से गांधी को जाना। रूप जी का नियम था की हर रोज वे अपनी खादी की बनियान, कच्छे, पजामा, तोलिया अपने हाथ से धोते थे, रात्रि को बड़े करीने से अपने तकिए के नीचे तय करके एक तरह की प्रेस करते थे। एक बार वे बीमार पड़ गए, मैंने भरसक प्रयत्न किया कि मैं उनके कपड़े धो दूं। बुखार होने के बावजूद उन्होंने अपने कपड़े खुद धोए। खाने के बर्तन जिन्हें जेल के मशकती धोते थे, वे उन्हें ड्रम के सादे पानी में डूबा कर, निकाल कर दोबारा इस्तेमाल के लिए रख देते थे। बर्तनों पर चिकनाई, कालस तथा दाल सब्जी के पीले दाग लगे रहते थे एक दिन मैंने देखा कि रूप जी लाइन में बैठकर चमचमाते बर्तनों में खाना खा रहे थे। मैंने रूप जी से कहा कि क्या आपने अपने घर से अपने निजी बर्तन मंगाए हैं, रूप जी ने कहा कि नहीं, यही के हैं, तुम इसको ले लो मैं दूसरे ले लूंगा। तो पता चला कि रूप जी खाने के बाद सरकारी बर्तनों को खुद मांझकर अपने पास रख लेते हैं। मैंने भी ऐसा किया, तीन-चार दिन के बाद मेरे बर्तन भी चमकने लगे। देखा देखी अन्य बंदीयों ने भी यही करना शुरू कर दिया। जेल की तरफ से खादी का कुर्ता पजामा पहनने को मिला था, मैं भी उसको रोज धोकर सुखा देता था। क्योंकि सारे कपड़े एक जैसे थे, कई बंदी उन धुले हुए कपड़ों को उठाकर इस्तेमाल कर लेते थे, उससे बचने के लिए मैंने अपने कुर्ते और पाजामे को थोड़ा काट लिया, अब वह वैसे ही मिल जाते थे।
दिल्ली के रईस खानदान से ताल्लुकात होने के बावजूद रूप जी जंगे आजादी में न केवल खुद, उनकी माताजी सरस्वती देवी, उनकी दो बहनें गुणवती देवी और शांति देवी सत्याग्रह करते हुए दो बार जेल गई थी। मुल्क को बरतानिया हुकूमत से आजाद कराने के लिए रूप जी ने लंबी जेले काटी, दिल्ली तथा मुल्तान की जेल में अनेको तकलीफें भोगी। रूप जी जब दसवीं क्लास में पढ़ते थे तब उनका दिल्ली के कुछ क्रांतिकारियों से भी संपर्क हो गया। रेडिकल ह्यूमैनिस्ट के संस्थापक एम,एन, राय रूस चीन मैक्सिको आदि रहने के बाद हिंदुस्तान वापस लौट आए और हिंदुस्तान के मजदूरों को संगठित करने के कार्य में जुट गए तो उस वक्त दिल्ली में भी राय के कुछ समर्थक कार्य करने लगे, उन्होंने लाल कुआं जहां हमदर्द दवाखाना बना हुआ है वहां पर अपना दफ्तर खोला । इस पर ‘इंकलाबी टेलरिंग हाउस’ का साइन बोर्ड टंगा रहता था । दिल्ली में जब कपड़ा मिलों के मजदूरों द्वारा हड़ताल की जा रही थी तब रूप जी भी इनके संपर्क में आए। क्रांतिकारियों से संपर्क होने के कारण उन्होंने अपने घर में क्रांतिकारी साहित्य, रिवाल्वर, एक माउजर पिस्टल, कुछ कारतूस घर की अंधेरी कोठरी में छुपा कर रखा था। हालांकि रूप जी ने कभी क्रांतिकारी गतिविधियों से संबंधित किसी गतिविधि में कोई भाग नहीं लिया था परंतु उनका घर क्रांतिकारी स्टोर के रूप में इस्तेमाल करते थे। चंद्रशेखर आजाद को इनके बारे में जानकारी थी, उन्हें बताया गया था कि कठिनाई के समय उनके घर का इस्तेमाल हो सकता है तथा कुछ आर्थिक सहयोग भी मिल सकता है। चंद्रशेखर आजाद को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने जब घेर लिया था तो उसके उनके पास वही माउजर पिस्टल थी जो रूप नारायण जी के घर पर छिपा कर रखी गई थी।
1942 को मुंबई में कांग्रेस अधिवेशन में दिल्ली कांग्रेस के दो प्रतिनिधि शामिल हुए जिनमें एक रूप जी थे। महात्मा गांधी की हत्या के बाद उनकी अस्थियों को लेकर कैलाश मानसरोवर में जान जोखिम डालकर उन्होंने अस्थियां विसर्जित की। विद्यार्थी जीवन में ही सोशलिस्ट बन गए। दिल्ली में जयप्रकाश नारायण के सबसे निकटतम व्यक्ति थे। हर बार उन्हें स्टेशन लेने जाते थे, एक बार 1962 में चीनी आक्रमण के समय आंदोलन करने के कारण दिल्ली की जेल में बंद थे, जयप्रकाश जी को पता चला तो उन्होंने गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को खत लिखा कि मैं चाहता हूं कि हमेशा की तरह रूप नारायण मुझे लेने आए, पंडित जवाहरलाल नेहरू दिल्ली से बाहर थे, शास्त्री जी ने उनको खबर दी तब जाकर रात्रि को उनकी रिहाई के आदेश हुए। जेलर ने कहा कि आप रिहा हो गए हैं जाइए। रूप जी ने कहा इतनी रात को मैं कहां जाऊं तो जेलर ने कहा होम मिनिस्ट्री से सीधे ऑर्डर आए हैं, मेरी नौकरी चली जाएगी।
रूप जी नियम के पक्के थे। बेनागा दिल्ली की सोशलिस्ट पार्टी के दफ्तर सिद्दीकी बिल्डिंग, बाड़ा हिंदू राव में पुराने वक्त में ₹10 महीना चंदा देते थे। निजी जीवन में गांधी के असूलों का निर्वाह करते तथा एक प्रतिबद्ध निष्ठावान सोशलिस्ट थे।
रूप जी हंसमुख तथा मजाकिया स्वभाव के भी थे। उनके साथ भी कैसे-कैसे मजाकिया घटनाक्रम हो जाते थे उसको भी वह बड़े रोचक ढंग से सुनाते थे। रूप जी अखिल भारतीय नशाबंदी समिति के महासचिव थे। थिएटर कम्युनिकेशन बिल्डिंग कनॉट प्लेस में समिति का दफ्तर था, दफ्तर सायंकाल बंद हो जाता था। कनॉट प्लेस में शराब पीने वाले बड़े इत्मीनान से एकांत में नशाबंदी के अहाते में शराब पीकर बोतल वहीं छोड़ देते थे। सुबह दफ्तर जाने पर रूप जी पहले, उन बोतलों को उठाकर कूड़ेदान में पहुंचाते थे। इसी तरह नशाबंदी समिति का अखिल भारतीय सम्मेलन था, उन्होंने दिल्ली के एक पत्रकार को कहा कि भाई एक अच्छा सा संदेश लिख दो, पत्रकार महोदय ने कहा रूप जी एक बोतल मंगवा दो, मैं बहुत ही शानदार लिख दूंगा। तब रूप जी ने कहा तोबा तोबा।
बाकी का किस्सा मेरे साथी प्रोफेसर हरीश खन्ना भूतपूर्व विधायक दिल्ली विधानसभा की कलम से लिखा पढ़ें।

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