बिहार में बिछी चुनावी बिसात, चिराग-मांझी के विवाद से बिगड़ सकता है एनडीए का खेल! 

सीटों और वोटबैंक को लेकर झगड़ रहे चिराग पासवान और जीतन राम मांझी

चिराग पासवान की रैली में उमड़ रही भीड़ को भाड़े की बता रहे जीतन राम मांझी

चरण सिंह 

पटना। बिहार में भले ही विधानसभा चुनाव की घोषणा न हुई हो पर सभी दलों ने चुनावी बिसात सजा दी है। हर दल अपने-अपने हिसाब से मुहरे सेट करने में लगा है। कांग्रेस मुस्लिमों और दलितों पर दांव लगाने जा रही है तो राजद फिर से माई समीकरण पर काम कर रहा है। एनडीए में नीतीश लव कुश और महादलितों के बल पर चुनावी समर में है तो बीजेपी हिंदुत्व के बल पर।

लोजपा (रामविलास) पासवान वोटों के दम पर चुनाव जीतने की फ़िराक में है। 8 जून को आरा में रैली करने के बाद चिराग 29 में राजगीर में रैली करने जा रहे हैं। वह खुद भी विधानसभा चुनाव लड़ने की जब्त कर रहे हैं। कई बार तो वह सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कर देते हैं। चिराग पासवान इन विधानसभा चुनाव में किंग मेकर बनने की इच्छा पाले बैठे हैं। उधर जीतन राम मांझी 40-50 सीटें मांग कर रहे हैं। चिराग पासवान की रैलियों में उमड़ रही भीड़ को जीतन राम मांझी भाड़े की भीड़ बता रहे हैं।

दरअसल बिहार विधानसभा चुनाव में कुछ महीने बच गए हैं। इस बीच केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी ने एनडीए में सिर दर्द को बढ़ा दिया है। जीतन राम मांझी पहले ही 30 से 40 सीट पर दावा ठोक रहे हैं तो दूसरी ओर चिराग पासवान रैली पर रैली कर रहे हैं।  आठ जून को आरा में बड़ी सभा की तो 29 को राजगीर में रैली करने वाले हैं। भले चिराग और मांझी दोनों एनडीए में हैं, लेकिन हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रमुख ने बीते मंगलवार को यह कह दिया कि चिराग पासवान की भीड़ पैसों के बल पर जुटाई जाती है। जिनको ताकत होती है वह बोलते नहीं हैं. अब ऐसे में सवाल उठ रहा कि चुनाव से पहले मांझी के बयानों का एनडीए पर क्या असर होगा?
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के समीकरण जटिल और प्रतिस्पर्धी हैं, जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर और बिहार की दलित राजनीति में उनकी स्थिति को प्रभावित करते हैं। दोनों नेता दलित समुदाय के प्रमुख चेहरों के रूप में उभरे हैं, लेकिन उनकी जातिगत आधार, राजनीतिक रणनीति और गठबंधन में भूमिका अलग-अलग हैं। नीचे उनके समीकरण का विश्लेषण किया गया है:

जातिगत आधार और वोटबैंक

जीतन राम मांझी: मांझी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के नेता हैं और मुसहर जाति (महादलित) से आते हैं, जो बिहार की आबादी का लगभग 3.09% है। उनका कोर वोटबैंक मुसहर और अन्य महादलित समुदाय हैं, खासकर गया, जहानाबाद, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार जैसे जिलों में, जहां उनकी जाति की उपस्थिति मजबूत है। बिहार में महादलितों की कुल हिस्सेदारी लगभग 14% है, और मांझी इस वोटबैंक पर दावा करते हैं।
चिराग पासवान: लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान पासवान/दुसाध जाति से आते हैं, जो बिहार की आबादी का लगभग 5.3% है। उनका प्रभाव पासवान समुदाय में मजबूत है, और उनकी “बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट” की रणनीति के माध्यम से वे युवाओं और सर्वसमाज को आकर्षित करने की कोशिश करते हैं।
दोनों नेताओं के वोटबैंक दलित समुदाय के अलग-अलग हिस्सों पर आधारित हैं, जिसके कारण उनकी प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। हालांकि, दोनों एनडीए के हिस्सा हैं, लेकिन दलित वोटों का बंटवारा और नेतृत्व की होड़ उनके बीच तनाव का कारण बनता है।

एनडीए में सीट बंटवारा

2025 विधानसभा चुनाव के लिए संभावित फॉर्मूला: जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) को 102-103 सीटें, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को 101-102 सीटें मिलने की संभावना है।
चिराग पासवान की पार्टी (एलजेपी-रामविलास) को 25-28 सीटें, मांझी की पार्टी (हम) को 6-7 सीटें, और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा को 4-5 सीटें मिल सकती हैं।
हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि चिराग की पार्टी को 30 सीटें और मांझी को 10 सीटें मिल सकती हैं, लेकिन यह अभी अनौपचारिक है।
2020 के समीकरण की तुलना: 2020 में जेडीयू ने अपने कोटे से मांझी को 7 सीटें दी थीं, जबकि चिराग ने एनडीए से अलग होकर 137 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा था, जिससे जेडीयू को नुकसान हुआ। इस बार दोनों एनडीए में हैं, लेकिन सीटों की संख्या को लेकर तनाव बना हुआ है।
मांझी और चिराग दोनों अपनी-अपनी पार्टियों के लिए अधिक से अधिक सीटें चाहते हैं, और बीजेपी-जेडीयू के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है। मांझी ने पहले ही कुछ सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं, जो उनकी आक्रामक रणनीति को दर्शाता है।

राजनीतिक रणनीति और महत्वाकांक्षा

चिराग पासवान: चिराग ने 2025 विधानसभा चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाने का संकेत दिया है और संभवतः खुद भी किसी विधानसभा सीट (शायद सामान्य सीट) से चुनाव लड़ सकते हैं। उनकी नजर अपनी पार्टी के “स्ट्राइक रेट” को बेहतर करने और एनडीए की जीत में अहम भूमिका निभाने पर है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी नजर मुख्यमंत्री पद पर नहीं है, और नीतीश कुमार ही गठबंधन का चेहरा रहेंगे।

जीतन राम मांझी: मांझी की रणनीति अपनी पार्टी की सीटों को बढ़ाने और मुसहर वोटबैंक को मजबूत करने पर केंद्रित है। उनके बेटे संतोष सुमन और बहू दीपा मांझी पहले से ही सक्रिय हैं, और परिवार के अन्य सदस्यों को भी राजनीति में लाने की योजना है। मांझी ने चिराग पर तंज कसते हुए उनकी “हैसियत” को 10 सीटों तक सीमित बताया है, जो दोनों के बीच बढ़ती कटुता को दर्शाता है।

दोनों के बीच तनाव और मतभेद

उपचुनाव में मतभेद: 2024 के इमामगंज उपचुनाव में मांझी की बहू दीपा मांझी उम्मीदवार थीं, लेकिन चिराग ने वहां प्रचार नहीं किया, जबकि अन्य सीटों पर सक्रिय थे। इससे दोनों के बीच तनाव उजागर हुआ।
आरक्षण पर असहमति: सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण फैसले पर चिराग ने नाराजगी जताई, जबकि मांझी ने इसका स्वागत किया और चिराग को घेरा।
सार्वजनिक बयानबाजी: मांझी ने चिराग को “ताकतवर दिखाने की कोशिश करने वाला” बताया और उनकी राजनीतिक हैसियत पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, चिराग ने मांझी के साथ खुले टकराव से बचने की कोशिश की है, लेकिन उनके समर्थकों के बयान तनाव को बढ़ाते हैं।

नीतीश कुमार और बीजेपी की भूमिका

नीतीश कुमार ने चिराग और मांझी दोनों को साधने के लिए अनुसूचित जाति आयोग में उनके रिश्तेदारों (चिराग के बहनोई मृणाल पासवान को अध्यक्ष और मांझी के दामाद देवेंद्र मांझी को उपाध्यक्ष) को नियुक्त किया है। यह कदम दोनों नेताओं को खुश करने और दलित वोटबैंक को एकजुट करने की रणनीति का हिस्सा है। बीजेपी चिराग को अधिक महत्व दे रही है, क्योंकि उनकी युवा छवि और व्यापक अपील गठबंधन के लिए फायदेमंद है। इससे मांझी और उनके समर्थकों में असंतोष की संभावना बढ़ रही है।

चुनौतियां और संभावनाएं

एनडीए के लिए जोखिम: मांझी और चिराग के बीच बढ़ती कटुता एनडीए के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है, खासकर अगर दलित वोट बंट गए।
महागठबंधन और अन्य खिलाड़ी: राजद के तेजस्वी यादव और जन सुराज के प्रशांत किशोर भी दलित वोटों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, जो मांझी और चिराग के लिए चुनौती है।
संभावित प्रभाव: अगर चिराग और मांझी एकजुट रहते हैं, तो एनडीए का वोट शेयर 60% तक पहुंच सकता है। लेकिन उनके बीच मतभेद महागठबंधन को फायदा पहुंचा सकते हैं।
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