बिहार में बिना लगन चुनावी शहनाई?

 ‘आभार’ के जरिए तेजस्वी ऐक्टिव

 मिशन ‘मेंबर’ पर बीजेपी तो नीतीश का मेगा मुआयना जारी

दीपक कुमार तिवारी।

पटना। बिहार विधानसभा के चुनाव में अभी साल भर का समय बाकी है। पर, राजनीतिक दलों की सक्रियता अभी से बढ़ गई है। पिछले ही महीने 24 अगस्त को जेडीयू ने अपनी प्रदेश कमेटी का पुनर्गठन किया तो आरजेडी ने अपने सांसदों-विधायकों के साथ बुधवार को बैठक की। भाजपा ने भी सदस्यता अभियान के बहाने मंगलवार को अपने तमाम सांसदों-विधायकों को जुटाया। तीनों दलों के काम विधानसभा चुनाव को ध्यान में रख कर ही किए गए। साल भर से पहले से चुनाव की तैयारी में सियासी दलों का लगना अचंभित करता है। इससे एक बात तो स्पष्ट समझ में आती है कि सभी दल अपनी-अपनी ताकत बढ़ाने की कवायद कर रहे हैं।
आरजेडी इस बार कुछ अधिक ही उत्साहित है। उसे लगता है कि पिछली बार जहां तक महागठबंधन पहुंच चुका था, उससे आगे बढ़ने की इस बार पूरी संभावना है। इसलिए कि लोकसभा चुनाव में भाजपा की जो हालत हुई है और पहली बार विपक्षी दलों का इंडिया ब्लाक मजबूत हुआ है, उसका अतिरिक्त लाभ बिहार में आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन को मिल सकता है। इसलिए तेजस्वी यादव के लिए मत चूको चौहान वाली स्थिति दिख रही है। तेजस्वी भी अपनी ओर मेहनत में कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं। लोकसभा चुनाव में ही उन्होंने 200 से अधिक जनसभाओं को संबोधित किया था। विधानसभा चुनाव को ध्यान में रख कर ही वे 10 सितंबर से आभार यात्रा पर निकलेंगे।
पिछले विधानसभा चुनाव के वक्त लालू प्रसाद यादव नहीं थे। संयोग से इस बार उनका भी साथ तेजस्वी को मिला है। भले ही लालू चुनाव प्रचार के लिए न जाएं, लेकिन रणनीति बनाने में वे तेजस्वी की मदद तो करेंगे ही। लालू सियासी रणनीति के धुरंधर माने जाते हैं। हवा को रुख मोड़ना कोई उनसे सीखे। इसके लिए दो ही उदाहरण काफी होंगे। वर्ष 2015 में नीतीश कुमार के जेडीयू और आरजेडी महागठबंधन बना कर विधानसभा का चुनाव लड़ रहे थे। लालू तब जमानत पर बाहर आए थे। आरजेडी के साथ नीतीश को जोड़ने की रणनीति लालू यादव ने ही बनाई थी।
चुनाव के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा को लेकर बयान दिया। लालू ने इसे मुद्दा बना दिया। उन्होंने कहना शुरू किया भाजपा आरक्षण विरोधी है। भागवत का बयान इसका संकेत है। चुनावी माहौल बिहार में तब बदल गया, जब 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 40 में 22 सीटों पर अकेले कब्जा जमा लिया था। महागठबंधन की सरकार बन गई। इस साल लोकसभा चुनाव में भी लालू ने आरक्षण और संविधान पर खतरे का मुद्दा उछाल कर न सिर्फ बीजेपी को बैकफुट पर पहुंचा दिया, बल्कि 400 पार सीटों का नारा लगाने वाली बीजेपी को बहुमत तक भी पहुंचने के लिए मुश्किल खड़ी कर दी। 2020 में विधानसभा चुनाव के वक्त लालू नहीं थे, तब भी तेजस्वी ने महागठबंधन के विधायकों की संख्या 110 तक पहुंचा दी थी। इस बार लालू साथ हैं तो 2015 की पुनरावृत्ति कोई बड़ी बात नहीं होगी।
कुछ समय छोड़ दें तो भाजपा नीतीश कुमार के साथ लगातार सत्ता में रही है। इसके बावजूद भाजपा नेतृत्व के स्तर पर नीतीश या लालू के बरक्स कोई चेहरा खड़ा नहीं कर पाई। सुशील मोदी में नेतृत्व के निखार की भरपूर संभावना थी, लेकिन उन्होंने स्वतः नीतीश का पिछलग्गू बनना पसंद किया। नतीजतन पार्टी भी उस हिसाब से नहीं पनपी, जितनी संभावना थी। पार्टी में अगर चमक आई भी तो 2014 में नरेंद्र मोदी के चेहरे की वजह से। भाजपा संगठन के स्तर पर यादव, वैश्य, कुशवाहा कार्ड ही खेलती रह गई। उसकी बिहार में जो भी ताकत है, वह स्थानीय स्तर पर किसी कोशिश का परिणाम नहीं है, बल्कि नरेंद्र मोदी के चेहरे की वजह से लोगों का भाजपा के प्रति बढ़ते आकर्षण का नतीजा है।इसलिए भाजपा ने सदस्यता बढ़ाने का टास्क प्रदेश नेतृत्व को सौंपा है। इसके लिए पार्टी का बिहार में अभियान कल से चालू हो गया है। कल इस बाबत भाजपा के सांसदों-विधायकों का महाजुटान भी हुआ था।
विधानसभा में फतेह के लिए जब दूसरे दलों ने तैयारी शुरू कर दी है तो जेडीयू कैसे पीछे छूटता। जेडीयू और नीतीश कुमार एक दूसरे के पर्याय हैं। बिहार के ज्यादातर लोग जेडीयू से ज्यादा नीतीश को ही जानते हैं। नीतीश ने अभी अपने संगठन को चुस्त-दुरुस्त किया है। उन्हें दूसरों से ज्यादा अपने काम पर भरोसा है। जिस तरह योजनाओं के कार्यान्वयन में तेजी लाने की हर जुगत कोशिश कर रहे हैं, वह ऐसे ही नहीं है। नीतीश जानते हैं कि वे किसी बिरादरी के वजह से सत्ता में 18-19 साल से कायम नहीं हैं, बल्कि जनता के लिए किए गए कामों का यह प्रतिफल है। इसलिए उन्होंने काम की गति बढ़ा दी है। कम बोल रहे हैं, लेकिन वे लगातार काम कर रहे हैं।

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