बच्चों की हर फ़रमाइश पूरी न करें!

ऊषा शुक्ला

बहुत से माता-पिताओं को लगता है कि बच्चे की अच्छी परवरिश करने का मतलब है, उसकी लगभग हर फरमाइश पूरी करना। मिसाल के लिए, बच्चों का सर्वे लिया गया था, जिसमें उनसे पूछा गया कि जब उनके मम्मी-पापा किसी बात के लिए इनकार करते हैं, तो वे क्या करते हैं। इस पर बच्चों ने कहा कि वे ज़िद करने लगते हैं। और उनमें से कुछ बच्चों ने कहा कि उनकी यह तरकीब काफी कामयाब रही है। उनके माता-पिताओं को शायद लगे कि इस तरह बच्चों को छूट देकर वे अपना प्यार जताते हैं। लेकिन क्या यह सच है? क्या आपने कभी एक बच्चे को किसी ऐसे खिलौने की ज़िद करते देखा है, जिसे खरीदने से उसके माँ-बाप ने इनकार कर दिया है? या क्या आपने ऐसे बच्चे को देखा है, जो खेलने-कूदने के लिए उतावला हो रहा है, जबकि उसके मम्मी-पापा ने उससे कहा है कि “चुपचाप खड़े रहो”? आप समझ सकते हैं कि इस तरह के हालात में माँ-बाप वही करना चाहते हैं, जिससे बच्चे का भला हो। फिर भी, देखा गया है कि माँ-बाप अकसर अपने बच्चे की ज़िद के आगे घुटने टेक देते हैं। बच्चा अपने रोने-धोने और चीखने-चिल्लाने के ज़रिए अपने माँ-बाप की नाक में इतना दम कर देता है कि उनकी ‘ना,’ ‘हाँ’ में बदल जाती है। हर जिद्द मानना सच्चा प्यार नहीं ।बच्चे की हर ज़िद पूरी करना ज़रूरी नहीं होता। ज़िद पूरी करने के बजाय, बच्चे को शांत और समझदार तरीके से समझाना चाहिए. ज़िद पूरी करने से बच्चे का विकास बाधित हो सकता है और उन्हें जिम्मेदार और आत्मविश्वासी बनने में मुश्किल हो सकती है।
बच्चे बहुत नादान होते हैं अपना भला बुरा नहीं जानते हैं उन्हें तो हर बुरी चीज़ें अच्छी लगती है । बच्चे अपने आस पास के उन लोगों को देखते हैं जो ग़लत काम कर रहे हो । बहुत कम बच्चे ऐसे होते हैं जो अपने आस पास के लोगों को नहीं देखते हैं और सही रास्ते पर चलने की कोशिश करते हैं । अक्सर बच्चों को कहते सुना होगा मेरे दोस्तों पार्टी कर रहे हैं ,मेरे दोस्त दारू पी रहे हैं , मेरे दोस्त मनाली में मस्ती मार रहे हैं कोई मेरा दोस्त बाइक में स्टंट कर रहा है , मेरे दोस्त घूम रहे हैं और मैं घर में बैठकर परिवार के साथ रह रहा हूँ। बच्चे नासमझ होते हैं वो हर समय ग़लत ज़िद ही करते हैं। बच्चे अपना भला बुरा नहीं जानते । माता पिता को चाहिए कि बच्चों को सही राह दिखाए ।

दोस्तों, आज ये प्रश्न पैरंट्स के लिए बहुत ही बड़ा प्रश्न बनता जा रहा है। हमें अपने बच्चो की हर जरुरत पूरी करनी चाहिए हर मांग को नहीं। बच्चे को समझ नहीं होती कि वो क्या करे या क्या ना करे ऐसे में हमारे ये जिमेदारी हैं की हम वो ही करे जो उनके लिए सही हो।बच्चों को सही राह दिखाना आसान नहीं है क्योंकि जब बच्चे अपने दोस्तों को देखने लग जाते हैं तो उन्हें लगता है कि मेरे माता पिता दोस्त के माता पिता से बहुत बुरे हैं ।आज कल हम सब ये मानने लगे है कि बच्चो की जिद्द को पूरी करना ही सच्चा प्यार कहते है। तो ही हम सच्चे और अच्छे पेरेंट्स कहलायेंगे। ये सरासर गलत है। कई पेरेंट्स बच्चो की हर जिद्द इसलिए पूरी करते है ताकि लोगो को उनका स्टेटस पता चले।। माता पिता बच्चों के सुख की ख़ातिर सारे दोष अपने ऊपर ले लेते हैं ।बच्चो की हर जिद्द को पूरी करने से वो जिद्दी तो बनते ही है पर साथ ही साथ में उनको पैसो को चीज़ो की कोई वैल्यू ही नहीं रहती। उनको यही लगता है की लाइफ में कोई भी चीज़ ऐसे ही आसानी से मिलती होगी। इसके लिए कोई मेहनत नहीं लगती। इसलिए वो हर हाल में केवल जिद्द करना सीखते है महेनत नहीं। यही वजह है की बड़े और सक्सेसफुल लोगो के बच्चे अक्सर अपनी लाइफ में अनसक्सेस रहते है, क्योकि उन्होंने अपने जीवन में संघर्ष करना सीखा ही नहीं।बच्चे को ख़ुश रखने का ये कोई तरीक़ा नहीं होता कि बच्चे ने जो कहा उसकी हर बात पूरी कर दी जाए। कई बार बच्चों की ज़िद बच्चों के लिए ही भारी पड़ जाती है।

माता पिता को थोड़ा कठोर बनना चाहिए और बच्चों के सुंदर भविष्य को अपने दिमाग़ में रख कर बच्चों की हर ग़लत निर्णय को पूरा नहीं करना चाहिए।बच्चे की ज़िद पूरी करना ज़रूरी नहीं होता। ज़िद को समझदारी से समझाना और नियंत्रित करना बच्चों के लिए बेहतर होता है. ज़िद पूरी करने से बच्चों का विकास बाधित हो सकता है और उन्हें जिम्मेदार और आत्मविश्वासी बनने में मुश्किल हो सकती है। इसलिए यदि हम बच्चो को सच्चा प्यार करते है तो हमें उनकी हर जिद्द कभी पूरी नहीं करनी चाहिए।पुराने ज़माने के एक नीतिवचन पर गौर कीजिए, जिसमें एक बड़े पते की बात कही गयी है: “जो बचपन से अपने नौकर को सिर चढ़ाता, वह अंत में उसे निकम्मा बना देगा।” यह सच है कि आपका बच्चा नौकर नहीं है, मगर क्या आप इस बात से सहमत नहीं होंगे कि यही सिद्धांत बच्चों की परवरिश पर भी लागू होता है? अगर आप बच्चों को सिर चढ़ाकर रखेंगे और उनकी हर फरमाइश पूरी करेंगे, तो वे बड़े होकर ‘निकम्मे’ बन सकते हैं। यानी वे बिगड़ सकते हैं, अड़ियल और एहसानफरामोश इंसान बन सकते हैं। इसके बिलकुल उलट, बाइबल माता-पिताओं को यह सलाह देती है: “लड़के को शिक्षा उसी मार्ग की दे जिस में उसको चलना चाहिये।” समझदार माता-पिता इस सलाह पर चलते हैं। कैसे? वे सोच-समझकर अपने बच्चों के लिए नियम बनाते हैं, उनके बारे में अपने बच्चों को साफ-साफ बताते हैं और फिर दृढ़ता के साथ उन्हें लागू करते हैं। वे यह नहीं सोचते कि बच्चों की हर माँग पूरी करना, प्यार दिखाने का एक तरीका है। और ना ही वे बच्चों के रोने-धोने, ज़िद करने या चीखने-चिल्लाने की वजह से उनकी बात मान लेते हैं। इसके बजाय, वे अपनी बुद्धि-भरी सलाह पर चलते हैं।

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