चीन के साथ संबंध खराब होने के बावजूद बढ़ रहा है व्यापार 

रविंद्र पटवाल 

भारत-चीन तनाव के बावजूद वर्ष 2021 में व्यापार में 43.3% की अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है। कुल व्यापार अब 126 अरब डॉलर पर पहुँच गया है। चीन के सरकारी अखबार द ग्लोबल टाइम्स की 14 जनवरी की यह खबर इस समय दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है। ग्लोबल टाइम्स के अनुसार द्विपक्षीय संबंधों में तनाव के बावजूद यह एक प्रमाण के तौर पर देखना चाहिए कि नई दिल्ली चाहते हुए भी चीनी बाजार पर अपनी निर्भरता को कम कर पाने में असफल सिद्ध हो रही है।
आखिर मन की बात, लाल लाल आँख और विश्व गुरु बनने के बड़े-बड़े दावों और अंतर्राष्ट्रीय निवेश की झड़ी लगा देने का दावे जिन्हें पिछले 7 वर्षों में शीर्ष से लेकर व्हाट्सएप ग्रुपों में भक्त मंडली से सुन-सुनकर आज औसत भरतीय के दिमाग जहाँ सुन्न हो चुके हैं, वहां पर ‘आत्म-निर्भर भारत’ की जगह पर सीधे चीन की गोद में सिर छुपाने वाले शासन और उनके व्यापरिक नीतियों का लगातार हर साल डेढ़ करोड़ की बढ़ती आबादी, घटते छोटे और मझौले उद्योग और गैर-प्रतिस्पर्धी बाजार और उच्च लागत मूल्य कैसे इस चीनी चुनौती से मुकाबले के बजाय सीधे आत्मसमर्पण कर चुके हैं।
खबर के मुताबिक, 2021 में भारत और चीन के बीच कुल व्यापार 125.66 अरब डॉलर का रहा, जो कि 2020 की तुलना में 43.3% अधिक था। इसमें चीन से आयात 100 अरब डॉलर के करीब (97.52 अरब डॉलर) था, जो कि पिछले साल की तुलना में 46.2% की रफ्तार से बढ़ा। वहीं दूसरी तरफ भारत से चीन को वस्तुओं का निर्यात 28.14 अरब डॉलर मूल्य का था, जो कि 34.2% की वृद्धि को दर्शाता है। ये आंकड़े शुक्रवार को जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ़ कस्टम्स (जीएसी) ने जारी किये हैं।
चीनी विश्लेषकों का इस बारे में कहना है कि इस बढ़ोत्तरी के पीछे दोनों देशों के औद्योगिक श्रृंखला में सहयोगी पहलुओं की प्रमुख भूमिका है। उदाहरण के लिए, भारतीय दवा उद्योग जो कि भारत का एक प्रमुख उद्योग है, की 50-60 प्रतिशत केमिकल एवं अन्य वस्तुओं का आयात भारत के द्वारा चीन से ही किया जाता है। भारतीय पाठक इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि देश में सबसे बड़ी संख्या में केमिकल उद्योग किस राज्य में हैं? यदि नहीं पता तो कभी पधारिये न गुजरात में।
वहीं चीन में विश्लेषकों का मानना है कि चीन के उत्पादों के बहिष्कार के नारों से भारत के निर्यात बढ़ाने में मदद नहीं मिलने जा रही है। उन्होंने तो यह सलाह दे डाली है कि भारत के द्वारा, चीन को अधिक से अधिक निर्यात कैसे किया जाए, यह एक सही विकल्प है, जिस पर उसे ध्यान देना चाहिए। लेकिन शायद चीनी विशेषज्ञों को नहीं पता कि, भारत में चुनावों को जीतने के लिए जिसे हमेशा लूटने की मंशा होती है, उसके ही घर पर जाकर भोजन करने और प्रेम दिखाने का स्वांग रचना पड़ता है। चूँकि यह मजबूरी चीन के पास नहीं है, इसलिए उसे कई बार यह अजीबोगरीब पहेली समझ में नहीं आती होगी।
वहीं उनका यह भी सुझाव है कि मुक्त व्यापार की पहल में भारत को चीन को छोड़कर आगे नहीं बढ़ना चाहिए, क्योंकि चीन पहले से ही अंतर्राष्ट्रीय मुक्त व्यापार ढांचे में मौजूद है। अब चूँकि, 1 जनवरी से वैसे भी आरसीईपी संगठन अपने अस्तित्व में आ चुका है, जिसमें शामिल होते-होते अचानक से भारत उससे निकल गया था, और इस प्रकार चीन सहित करीब-करीब सभी प्रमुख क्षेत्रीय देश एवं ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड इसमें शामिल हैं, भारत के लिए आगे की राह सरल होने के बजाय मुश्किल होनी स्वाभाविक है। इसी बात को हाल के दिनों में द वायर के इन्टरव्यू में करण थापर ने पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार, अरविन्द सुब्रमण्यम से किया था, जिस पर उन्होंने बेहद चिंता व्यक्त की थी।
सुब्रमण्यम आरसीईपी से बाहर रहने के भारत के फैसले को अविवेकपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार न सिर्फ आपके पास प्रतिस्पर्धी मूल्य वाली वस्तुएं हासिल करने में दिक्कतें खड़ी होंगी, बल्कि चीन जो आज अपेक्षाकृत बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, और बेहतर वेतन एवं अन्य कारकों के कारण उसके यहाँ से यदि पूंजी का बहिर्गमन होता है, तो उसके लिए तैयार अर्थव्यवस्था के लिए जिस प्रकार के बुनियादी ढाँचे, कच्चे माल एवं कराधान सहित निवेश के माहौल की जरूरत है, वह भारत की जगह वियतनाम, बांग्लादेश जैसे देशों में चले जाने की संभावना है।
आज भाजपा को यदि छोड़ भी दें तो विपक्षी दलों ने भी छोटे एवं मझौले उद्योगों के आधार पर करोड़ों बेरोजगार युवाओं और 90% आबादी के हाथों में काम, पैसे के बल पर देश की अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाने के लिए कोई ठोस वैकल्पिक नीति पेश नहीं की है। भाजपा हटाओ, देश बचाओ के नारे में यदि चीन की तरह ही एक ऐसे ठोस आर्थिक मॉडल को अपनाने के लिए कोई ड्राइव शीर्ष से लेकर जन-जन तक नहीं तैयार की जाती है, तो हमारे पास एक बार फिर से मोदी को बदलकर किसी अन्य को लाने पर भी कुछ चुनिंदा क्रोनी कैपिटल के हित में नीतियों का बनना और करोड़ों करोड़ लोगों के भुखमरी की हालत से भी बदतर हालात और दुर्भिक्ष की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।

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