दिल्ली के अभिभावकों की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री से अपील-निजी स्कूलों की फीस संबंधी अध्यादेश में संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें

अनसुने और बोझिल अभिभावक केंद्र सरकार से कर रहे हैं मदद की अपील

दिल्ली सरकार की चुप्पी के बीच, फीस अध्यादेश, बेलगाम फीस वृद्धि, बच्चों के उत्पीड़न और भेदभाव को लेकर अभिभावक फिर सड़कों पर उतरने को मजबूर

नई दिल्ली । दिल्ली के विभिन्न निजी स्कूलों से जुड़े सैकड़ों अभिभावकों, अभिभावक संघों, शिक्षाविदों और बाल अधिकार संगठनों ने एकजुट होकर राष्ट्रपति महोदय को एक सामूहिक अपील पत्र सौंपा है, जिसकी प्रतिलिपि प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री को भी भेजी गई है। यह अपील “दिल्ली स्कूल शिक्षा (शुल्क निर्धारण और पारदर्शिता) अध्यादेश/विधेयक, 2025” के खिलाफ है, और केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करती है।

यह अपील अध्यादेश की प्रक्रिया में संवैधानिक सिद्धांतों की अवहेलना, स्टेकहोल्डरों से सलाह-मशविरा न करने, और जन भागीदारी की कमी को उजागर करती है। इसमें यह भी कहा गया है कि यह अध्यादेश भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 21 और 21A द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

 

अपील के मुख्य आधार:

 

कोई आपात स्थिति नहीं जो अध्यादेश लाने को जायज़ ठहराए: सरकार ने अध्यादेश लाने के पीछे कोई असाधारण या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कारण नहीं बताया है।

सार्वजनिक परामर्श का न होना: अभिभावकों जैसे प्रमुख हितधारकों से कोई परामर्श नहीं किया गया, न ही विधेयक का प्रारूप पूर्व-वैधानिक परामर्श नीति (PLCP), 2014 के अनुसार सार्वजनिक किया गया।

मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: यह विधेयक बिना पर्याप्त जवाबदेही और पारदर्शिता के, गुणवत्तापूर्ण और किफायती शिक्षा को खतरे में डालता है।

नई शिक्षा नीति 2020 के सिद्धांतों का उल्लंघन: प्रस्तावित कानून सहभागी और पारदर्शी शैक्षिक शासन के सिद्धांतों को नजरअंदाज करता है।

मुख्यमंत्री, दिल्ली सरकार द्वारा किए गए वादे, जो अब तक अधूरे हैं:

30 जून 2025 को, दिल्ली के विभिन्न स्कूलों के प्रतिनिधि मुख्यमंत्री से मिले थे, जिन्होंने आश्वासन दिया था कि शीघ्र ही एक खुली बैठक एवं संवाद का आयोजन किया जाएगा, जिसमें शिक्षा मंत्री, शिक्षा निदेशक, अतिरिक्त निदेशक और पीएसबी शाखा के अधिकारी भाग लेंगे।

हालांकि, दो बार लिखित अनुस्मारक भेजने के बावजूद, अब तक न तो कोई प्रतिक्रिया मिली है और न ही कोई बैठक निर्धारित की गई है। यह चुप्पी पारदर्शिता की कमी और अभिभावकों की उपेक्षा को दर्शाती है।

राष्ट्रीय स्तर पर अपील करने से पहले जिन अधिकारियों को ज्ञापन दिए गए:

माननीय उपराज्यपाल, दिल्ली

माननीय मुख्यमंत्री एवं सदन की नेता, दिल्ली सरकार

माननीय उपमुख्यमंत्री एवं विधायी मामलों के मंत्री, दिल्ली

माननीय शिक्षा एवं गृह मंत्री, दिल्ली

माननीय विधानसभा अध्यक्ष

विपक्ष के नेता, दिल्ली

विधानसभा सचिव, दिल्ली

शिक्षा निदेशक, दिल्ली

प्रमुख राजनीतिक दलों के अध्यक्ष, जैसे कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी

इसके बावजूद, कोई भी सार्थक संवाद या विधेयक का मसौदा सार्वजनिक नहीं किया गया, जिससे अभिभावकों को राष्ट्रीय नेतृत्व से अपील करनी पड़ी।

अपील के साथ संलग्न दस्तावेज:

1. उपरोक्त अधिकारियों को भेजे गए पूर्व पत्रों/ईमेल की प्रतियां

2. हजारों परिवारों का प्रतिनिधित्व करने वाले अभिभावक संघों, शिक्षाविदों और एनजीओ द्वारा प्रस्तुत ज्ञापन

3. अध्यादेश के विरोध में हुए प्रदर्शनों और अभिभावकों की आपत्तियों को कवर करने वाली मीडिया रिपोर्ट्स

4. 21 और 30 जून 2025 को दिए गए औपचारिक ज्ञापनों की प्राप्तियों की प्रतियां

देश के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने इस मुद्दे पर व्यापक कवरेज दी है:

“दिल्ली सरकार द्वारा फीस अध्यादेश का मसौदा साझा न करने पर अभिभावकों का विरोध” – द प्रिंट

“आप ने अध्यादेश को अभिभावक-विरोधी बताया, पारदर्शिता की मांग की” – द हिंदू

शामिल मीडिया संस्थान: इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान (हिंदी), टाइम्स ऑफ इंडिया, एनडीटीवी, नवभारत टाइम्स, इंडिया टुडे, द ट्रिब्यून, द फेडरल, न्यूज़18 और पीटीआई, एएनआई, यूनीवार्ता न्यूज़ इत्यादि।

राष्ट्रीय नेतृत्व से अपील:

अभिभावकों/नागरिकों ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं केंद्रीय गृह मंत्री महोदय से आग्रह किया है कि:

उपराज्यपाल एवं दिल्ली सरकार को अध्यादेश व विधेयक को स्थगित करने की सलाह दें, जब तक कि अभिभावकों और अन्य हितधारकों से विधिवत परामर्श न हो

विधेयक के मसौदे को कम से कम 30 दिनों के लिए सार्वजनिक किया जाए, जैसा कि PLCP, 2014 के तहत अनिवार्य है

संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप पारदर्शी, जवाबदेह और सहभागी विधायी प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए

“यह अध्यादेश दिल्ली के हर घर को प्रभावित करता है। जनता से जुड़े कानून जनता के साथ मिलकर बनाए जाने चाहिए, उनके बिना नहीं,” एक अभिभावक प्रतिनिधि ने कहा।

जन असंतोष बढ़ने से पहले तुरंत कार्रवाई की आवश्यकता:

यदि सरकार की ओर से समय पर सकारात्मक और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो दिल्ली के निजी स्कूलों के अभिभावक जल्द ही शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन फिर से शुरू करने के लिए विवश हो सकते हैं। उनकी चिंताएं केवल अध्यादेश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बेलगाम फीस वृद्धि, बच्चों के साथ हो रहे उत्पीड़न और निजी स्कूलों में हो रहे भेदभाव जैसे गंभीर मुद्दों से भी जुड़ी हैं।

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