भारत में संवैधानिक नैतिकता: डॉ. आंबेडकर के दृष्टिकोण और स्वतंत्रता के बाद उसके उल्लंघनों का एक आंबेडकरवादी विश्लेषलण

एस आर दारापुरी 

 

संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा भारतीय लोकतंत्र के बौद्धिक और नैतिक आधारों में एक केंद्रीय स्थान रखती है, जिसे सर्वाधिक स्पष्टता और गहराई से B. R. Ambedkar ने प्रतिपादित किया। उनके लिए संविधान केवल एक विधिक दस्तावेज नहीं था, बल्कि एक नैतिक-राजनीतिक ढांचा था, जिसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि राज्यसत्ता और नागरिक दोनों उसके मूल्यों के प्रति कितने प्रतिबद्ध हैं। इस प्रकार, संवैधानिक नैतिकता का अर्थ केवल कानूनों का पालन करना नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, संस्थागत मर्यादा और विशेष रूप से वंचित वर्गों के अधिकारों के प्रति गहरी निष्ठा रखना है। तथापि, स्वतंत्रता के बाद भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि संवैधानिक आदर्शों और राजनीतिक व्यवहार के बीच एक स्थायी अंतर बना हुआ है, जो इस अवधारणा की व्यवहारिकता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

संवैधानिक नैतिकता का विचार आंबेडकर ने George Grote से ग्रहण किया, जिन्होंने इसे प्राचीन यूनानी लोकतंत्र में संवैधानिक प्रक्रियाओं के प्रति सम्मान के रूप में परिभाषित किया था (Grote 1862)। किंतु आंबेडकर ने इस अवधारणा को भारतीय संदर्भ में कहीं अधिक व्यापक और गहन रूप प्रदान किया। उनके लिए संवैधानिक नैतिकता केवल प्रक्रियात्मक निष्ठा नहीं थी, बल्कि यह न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों के प्रति एक नैतिक प्रतिबद्धता थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह नैतिकता स्वाभाविक नहीं होती, बल्कि इसे शिक्षा और अभ्यास के माध्यम से विकसित करना पड़ता है (Ambedkar 1948)।

आंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता के केंद्र में संविधान की सर्वोच्चता का सिद्धांत निहित है। एक ऐसे समाज में, जो परंपरागत रूप से धार्मिक ग्रंथों और जातिगत मान्यताओं द्वारा संचालित रहा है, यह सिद्धांत अत्यंत क्रांतिकारी था। इसका अर्थ यह है कि सभी सामाजिक और धार्मिक प्रथाएँ संविधान के मूल्यों के अधीन होंगी। इसके साथ ही उन्होंने संस्थागत मर्यादा और संतुलन पर भी बल दिया। उनके अनुसार, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को अपने-अपने सीमाओं में कार्य करना चाहिए और किसी भी प्रकार का अतिक्रमण लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करता है (Austin 1966)।

आंबेडकर विशेष रूप से बहुसंख्यकवाद के खतरों के प्रति सजग थे। उनका मानना था कि एक जाति-आधारित समाज में बहुसंख्यक शासन आसानी से सामाजिक वर्चस्व का रूप ले सकता है। इसलिए संवैधानिक नैतिकता का एक महत्वपूर्ण पक्ष अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना है। यह विचार उनके विधि के शासन (Rule of Law) के सिद्धांत से जुड़ा हुआ था, जो कानून के समक्ष समानता और मनमानी सत्ता के निषेध की वकालत करता है (Dicey 1959)। किंतु आंबेडकर का दृष्टिकोण इससे भी आगे जाता है, जब वे बंधुत्व को लोकतंत्र की नैतिक आधारशिला मानते हैं। उनके अनुसार, सामाजिक एकता के बिना स्वतंत्रता और समानता टिक नहीं सकती। जाति व्यवस्था, जो मनुष्यों के बीच गहरे विभाजन और अपमान को जन्म देती है, संवैधानिक नैतिकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है (Omvedt 1994)।

संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण (1949) में आंबेडकर ने भारतीय लोकतंत्र की कमजोरियों की ओर स्पष्ट संकेत किया। उन्होंने चेतावनी दी कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता जब तक सामाजिक लोकतंत्र स्थापित नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि भारत का समाज मूलतः असमान और अलोकतांत्रिक है, और राजनीति में व्यक्तिपूजा तानाशाही की ओर ले जा सकती है (Ambedkar 1949)। यह चेतावनी स्वतंत्र भारत के इतिहास में बार-बार सत्य सिद्ध हुई है।

स्वतंत्रता के बाद संवैधानिक नैतिकता का सबसे गंभीर उल्लंघन इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल के दौरान हुआ। इस अवधि में मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया, राजनीतिक विरोध को दबा दिया गया और प्रेस की स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया गया। यद्यपि ये कदम विधिक रूप से वैध बनाए गए थे, परंतु उन्होंने संवैधानिक नैतिकता की आत्मा को नष्ट कर दिया (Austin 1999)। यह घटना इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार संवैधानिक प्रावधानों का उपयोग करके लोकतंत्र को कमजोर किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 356 का बार-बार राजनीतिक उपयोग संघीय ढांचे को कमजोर करता रहा है। इसी प्रकार, बहुसंख्यकवादी राजनीति का उदय संवैधानिक नैतिकता के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। धार्मिक राष्ट्रवाद के प्रभाव ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को प्रभावित किया है (Jaffrelot 2003)। आंबेडकरवादी दृष्टिकोण से यह प्रवृत्ति संविधान की समानतावादी भावना के विरुद्ध है।

जातिगत असमानता की निरंतरता संवैधानिक नैतिकता की विफलता का एक और प्रमुख कारण है। संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के बावजूद दलितों और अन्य वंचित वर्गों के विरुद्ध भेदभाव और हिंसा आज भी व्यापक है। यह स्थिति राजनीतिक लोकतंत्र और सामाजिक यथार्थ के बीच गहरे अंतर्विरोध को उजागर करती है (Guru 2009)।

इसके साथ ही, लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण भी एक गंभीर समस्या है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रश्न, विधायिका की कार्यक्षमता में गिरावट और कार्यपालिका की राजनीतिककरण की प्रवृत्ति संवैधानिक संतुलन को कमजोर करती है (Mehta 2003)। चुनावी प्रक्रिया में धनबल और बाहुबल का बढ़ता प्रभाव तथा राजनीति का अपराधीकरण लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को कम करता है (Chhibber and Nooruddin 2004)।

नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध भी संवैधानिक नैतिकता के उल्लंघन का संकेत है। असहमति को दबाने के लिए राजद्रोह और कठोर कानूनों का उपयोग लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है। आंबेडकर के अनुसार, असहमति लोकतंत्र का एक आवश्यक अंग है (Baxi 1982)।

फिर भी, कुछ अवसरों पर संवैधानिक नैतिकता की रक्षा न्यायपालिका द्वारा की गई है। Supreme Court of India ने कई महत्वपूर्ण निर्णयों में संवैधानिक मूल्यों को सामाजिक परंपराओं से ऊपर रखा है। यह प्रयास आंबेडकर की दृष्टि को आंशिक रूप से साकार करने का संकेत देता है।

आंबेडकरवादी दृष्टिकोण से इन उल्लंघनों का मूल कारण संरचनात्मक है। जाति व्यवस्था, सामाजिक असमानता, और सत्ता का अभिजात वर्गों के हाथों में केंद्रीकरण संवैधानिक मूल्यों के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करते हैं। साथ ही, संवैधानिक चेतना का अभाव भी एक महत्वपूर्ण कारण है।

संवैधानिक नैतिकता की पुनर्स्थापना के लिए केवल संस्थागत सुधार पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए सामाजिक परिवर्तन आवश्यक है। आंबेडकर द्वारा प्रतिपादित “जाति का उन्मूलन” इस दिशा में एक केंद्रीय शर्त है। इसके साथ ही, संवैधानिक शिक्षा, संस्थागत सुदृढ़ीकरण, असहमति की रक्षा और नैतिक नेतृत्व का विकास भी आवश्यक है।

अंततः, संवैधानिक नैतिकता आंबेडकर का एक अत्यंत गहन और दूरदर्शी योगदान है, जो यह स्पष्ट करता है कि लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं, बल्कि एक नैतिक व्यवस्था है। स्वतंत्र भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि संवैधानिक आदर्शों और सामाजिक वास्तविकताओं के बीच का अंतर अभी भी बना हुआ है। जब तक संवैधानिक नैतिकता समाज के व्यवहार में समाहित नहीं होती, तब तक भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता सुनिश्चित नहीं की जा सकती। आंबेडकर की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी संविधान के निर्माण के समय थी।

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