Constitution Day : कैसा होना चाहिए भारत?

नव विकासशील लोकतंत्रात्मक भारत को लेकर मेरे मन में अनेक विचार उठते है, महिलाओं की श्रम शक्ति की भागीदारी कम होती दिख रही है। युवाओं की राजनीतिक भागीदारी के लिए मीडिया मुखर हो, न कि केवल अपना लक्ष्य चुने। यूके में, मंत्रियों को अनैतिक आचरण या अनैतिक व्यवहार के कारण इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया जाता है, जब तक भारतीय गणराज्य 100 साल का हो जाता है नागरिकों को सवाल, बहस, चर्चा करने के लिए आवाजें उठानी चाहिए और उन लोगों को बाहर निकालना चाहिए जो केवल अपने राजनीतिक दल के लिए चीयरलीडर्स के रूप में बैठते हैं।


प्रियंका सौरभ

जब भारत आजादी के सौ साल मनाएगा, तब तक उसे और उसके संविधान को अधिक समतावादी और अधिक खुले विचारों वाला हो जाना चाहिए। एक दार्शनिक परिप्रेक्ष्य है जो लिंग, धर्म, आर्थिक स्थिति और राजनीतिक मान्यताओं में समानता और समान व्यवहार पर जोर देता है। समतावाद आय असमानता और वितरण पर ध्यान केंद्रित कर सकता है, जो ऐसे विचार हैं जो विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक प्रणालियों के विकास को प्रभावित करते हैं। कानून के तहत समतावाद यह भी देखता है कि कानून के तहत व्यक्तियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।

जहां ब्राह्मण, क्षत्रिय, बनिया, ओबीसी, दलित या आदिवासी होना मायने नहीं रखता हो। नागरिकों को नियंत्रित करने और उनकी रक्षा करने के लिए जिम्मेदार लोगों को अधिक जवाबदेह बनाया जाता है, न कि कानून और अदालतों द्वारा। मतदाताओं को सुशासन और ढोंग के बीच अंतर करने में सक्षम होना चाहिए। एक ऐसे देश में वर्ग विभाजन को पाटें जहाँ भुगतान करने वाले और कर्मचारी, चाहे कितने ही कुशल या कितने ही वफादार क्यों न हों, उन्हें कम वेतन दिया जाता है और कुख्यात रूप से आखिर क्यों कम भुगतान किया जाता है।

आजादी के 100 साल तक भारत के लिए विजन में जातिवाद से मुक्ति दिलाओ, समुदाय और जाति को अलग करने वाली दीवारों को तोड़े जिस तरह से चुनाव लड़े जाते हैं और वोट डाले जाते हैं उसमें युवा भारतीय सोच-समझकर हिस्सा लेते हैं। नागरिकों को सवाल उठाने, बहस करने, चर्चा करने और उन लोगों को बाहर निकालने के लिए आवाज उठानी चाहिए जो केवल अपने राजनीतिक दल के चीयरलीडर्स के रूप में बैठते हैं। वर्गहीन समाज जो भारत में मौजूद है लेकिन जिस पर हमने कभी ध्यान नहीं दिया।

राजनीतिक आवाज और सरकारी सेवाओं में आरक्षण प्रयास छोटे अनुपात में ही प्रभावी रहे हैं।
जो बेहतर स्थिति में हैं, वे शिक्षा तक पहुंच या अपनी स्वयं की पहल के माध्यम से लाभ प्राप्त करना जारी रखते हैं। सकारात्मक कार्रवाई ने इन समूहों की निरंतर दुर्दशा के मूल कारणों को संबोधित नहीं किया है। अधिक अंतर-जातीय विवाहों को फलने-फूलने दें और संस्कृतियों की विविधता को युवा भारतीयों का एक समूह बनाने दें, जिन्हें साथी चुनने के लिए जाति-आधारित साइटों पर जाने की आवश्यकता नहीं है।

वंचन की पहचान न केवल जाति के नाम से राज्य सूची में शामिल किया जा रहा है, बल्कि इन्हीं समूहों के बीच परिवारों की पहचान करके भी करें। हमें अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बीच महिलाओं की जनगणना करने और उन्हें शिक्षित करने और सफलता की एक कसौटी से लैस करने की दिशा में काम करने की आवश्यकता है। प्रजनन क्षमता घटने के साथ, लक्ष्यों को बदलना चाहिए क्योंकि भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ महिलाओं की श्रम शक्ति की भागीदारी कम होती दिख रही है।

युवाओं की राजनीतिक भागीदारीके लिए मीडिया मुखर हो, न कि केवल अपना लक्ष्य चुने। यूके में, मंत्रियों को अनैतिक आचरण या अनैतिक व्यवहार के कारण इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया जाता है। जब तक भारतीय गणराज्य 100 साल का हो जाता है नागरिकों को सवाल, बहस, चर्चा करने के लिए आवाजें उठानी चाहिए और उन लोगों को बाहर निकालना चाहिए जो केवल अपने राजनीतिक दल के लिए चीयरलीडर्स के रूप में बैठते हैं।

एक ऐसा भारत देश जिसमें बेरोजगारी की कोई भी जगह ना हो ताकि लोगों को आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या जैसा कदम ना उठाना पड़ेगा साथ ही लोगों को रोजगार प्राप्त करने के लिए अपने घर को छोड़कर के देश परदेश में न जाना पड़े। लोगों को घर में ही रोजगार देने के लिए मैं हर जिले में कम से कम एक फैक्ट्री की स्थापना अवश्य हो ताकि उस जिले के लोग उसी फैट्री में नौकरी कर अपने घर के आस-पास रह करके ही रोजगार प्राप्त कर सकें।

(लेखिका रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

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