50 सालों से भी अधिक समय के साथी नानक को आज यमुना किनारे बने हुए निगमबोध घाट पर बड़ी तादाद में शामिल हुए लोगों ने अंतिम विदाई दी। मुख्तलिफ विचारधाराओ, पार्टियों, संगठनों, पेशों के लोग आपस में नानक के साथ के निजी,करीब रिश्तो का जिक्र कर रहे थै।
चंद रोज पहले जब मैं उनसे मिलने उनके घर गया था। वापस आने पर मैंने उनके बारे में एक पोस्ट लिखी थी, बदकिस्मती से वह अब शोकांतिका में बदल गई। उनका पूरा मुंह बड़ी आकर के ऑक्सीजन के यंत्र से ढका हुआ है, देख कर तकलीफ हुई। माहौल को हल्का करने के लिए मैने जोर से कहा की लाला तलब लगी हुई है, चाय के साथ जो सबसे बढ़िया मिठाई घर पर है उसे खिलवाओ। नानक ने मुझे देखा तो पास में रखी हुई घंटी को बजाकर अपने सहायक को बुलाया, मंद आवाज में कहा चाय और मिठाई लेकर आओ। अभी कुछ सेकंड ही नहीं गुजरे थे फिर बोले अरे भाई लेकर आओ, मैंने कहा जल्दी क्या है लाता ही होगा, उन्होंने मेरी बात को अनसुनी करके फिर दोहराया चाय लाओ भाई। बहुत मंद आवाज में बतियाने लगे। बीमारी की जकड़ में आ जाने के बावजूद पुरानी यादों, संघर्षों पर बात छिड़ जानेपर पूरी मुस्तैदी के साथ नानक चर्चा में शिरकत करने लगे। साथ में गए कृष्ण भदोरिया से जब मैं नानक के द्वारा कालिज जीवन में उनके द्वारा किए गए संघर्षों का सिलसिलेवार जिक्र कर रहा था, उस समय के कुछ अन्य साथियों का नाम जोड़ते हुए उन्होंने कहा की वे भी तो साथ में थे। अपनी तारीफ में भी उस समय के साथियों का नाम जोड़ने में उनका साथीपन झलक रहा था। दिल्ली यूनिवर्सिटी के बहुत ही नामवर हंसराज कॉलेज के वे छात्र थे। अंतर कॉलेज वाद विवाद प्रतियोगिता में ऐसी धाक थी, की प्रतियोगिता में कोई ना कोई ईनाम उनको मिल ही जाता था। दिल्ली के एक पुराने व्यापारिक खानदान से ताल्लुक रखने वाले नानक समाजवादी युवजन सभा मैं शामिल हो गए थे, आज तक उसी वैचारिक आस्था के साथ जुड़े हुए हैं। छात्र जीवन में हर तरह के संघर्षों मैं मुस्तैदी के साथ वे शिरकत करते रहे। उस दौर में दिल्ली यूनिवर्सिटी का समाजवादी टोला समाजवादी विचार दर्शन, सिद्धांतों, नीतियों, कार्यक्रमों के प्रचार प्रसार में एक दीवानेपन की हद तक उसमें लगा रहता था। धरने प्रदर्शन, सत्याग्रह जेल जाने के अतिरिक्त दिसंबर ,-जनवरी की उस जमाने की हाड कंपकपाती सर्दी में रात भर विश्वविद्यालय की दीवारों पर लोहिया के विचार लिखने में लगा रहता था। जसवीर सिंह, विजय प्रताप, रमाशंकर सिंह, रविंद्र मनचंदा , ललित गौतम जैसे अन्य साथियों के साथ नानक हाथ में रंग ब्रश लेकर डॉ लोहिया की सूक्तियों को दिल्ली यूनिवर्सिटी की दीवारों पर लिखता था। दिल्ली के मशहूर व्यापारिक परिवार में जन्म लेने के बावजूद सोशलिस्ट तंजीम में नानक ने अपनी सारी जिंदगी गुजारी। अपनी प्रतिभा के बल पर वे भारत सरकार के समाज कल्याण विभाग की पत्रिका का संपादन करने के साथ-साथ अन्य लेखन कार्यों में भी जुटे रहे। उनकी साहित्यिक प्रतिभा को देखकर उन्हें दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी का सचिव भी बनाया गया। एक औपचारिक सरकारी संस्था को उन्होंने कुछ ही समय में जीवंतता प्रदान कर दी
नानक ने अंतर्जातीय, प्रेम विवाह किया था, जो उनके परिवार वालों को नापसन्द था। परंतु उनकी जीवन संगिनी श्रीमती प्रेम गर्ग जो हाल ही में दिल्ली के एक बहुत ही प्रतिष्ठित सीनियर सेकेंडरी पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल की जिम्मेदारी से मुक्त हुई है, उनके व्यवहार, साहचर्य, पारिवारिक मर्यादाओं, परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते देखकर परिवार के बुजुर्ग कहते थे कि हमारी बहू लाखों में एक है। किसी भी समाजवादी से जब आप नानक के घर का जिक्र करेंगे तो एक ही स्वर में सब कहेंगे कि घर में दाखिल होने से लेकर वापस आते समय तक नाना प्रकार के व्यंजनों को खाने की जबरदस्ती आप हमेशा उसके घर में पाएंगे। ऐसी मेहमान नवाजी बहुत कम देखने को मिलती है। उसको देखकर मन भारी हो गया था उनके घर से चलते समय मैंने नानक से कहा कि अब मैं चाहता हूं की तुमसे अगली मुलाकात पार्क में टहलने और गपशप करते वक्त हो। अपने हाथ मैं मेरा हाथ रखते हुए मुस्कुराहट के साथ मेरी हां में हां मिलाई। घर आने पर प्रेम का टेलीफोन आया, और कहने लगी भाई साहब माफ करना, मैं आपकी कोई आव भगत नहीं कर पाई, अस्वस्थ होने के कारण मैं दूसरे कमरे में थी। आज के दौर में नानक जैसा साथी मिलना एक नियामत से से कम नहीं था।
शरीर से लाचार होने के बावजूद नानक दिमागी रूप से व्यवस्था परिवर्तन, समाजवादी विचार दर्शन के प्रचार प्रसार के लिए पूरी तरह से जागृत था। 2025 की शुभकामनाओं में उसने लिखा था
“नव वर्ष की नव भोर का स्नेह वंदन। वर्ष 2025 आपको नई चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाए और नए लक्ष्यों की पूर्ति का सारथी बने। आप और आपके परिजन – स्वजन स्वस्थ रहें।”
राजकुमार जैन








