‘बदलाव’ नहीं माना जा सकता दल बदलुओं के बल पर होने वाला सत्ता परिवर्तन ! 

चरण सिंह राजपूत 
योगी आदित्यनाथ के मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह के अलावा पूर्व मंत्री धर्म सिंह सैनी और विधायक भगवती सागर सहित भाजपा और अपना दल के कुछ विधायकों ने सपा की सदस्यता ग्रहण की। भाजपा छोड़ने वाले पांच विधायक भगवती प्रसाद सागर, विनय शाक्य, रोशन लाल वर्मा, डॉ मुकेश वर्मा, ब्रजेश कुमार प्रजापति और अपना दल के विधायक चौधरी अमर सिंह हैं। इनके अलावा सपा में शामिल होने वाले पूर्व विधायकों में अली यूसुफ अली, राम भारती, नीरज मौर्या, हरपाल सैनी, राजेन्द्र प्रसाद सिंह पटेल और पूर्व राज्य मंत्री विद्रोही धनपत राम मौर्य के अलावा बलराम सैनी (पूर्व एमएलसी) समेत कई नेता सपा में शामिल हुए हैं।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या दलबदलू नेता वास्तव में बदलाव के लिए यह सब कुछ कर रहे हैं? क्या इन लोगों ने पांच साल तक सत्ता की मलाई नहीं चाटी है ? क्या ये लोग सपा की सरकार बनती देख सत्ता की मलाई फिर से चाटने की फ़िराक में नहीं हैं ? क्या दल बदलू नेता पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं का हक़ नहीं मारते हैं ? क्या इन नेताओं के आने से सत्ता में आने से राजनीति गंदी नहीं होती है ? बात भाजपा से सपा में आने की ही नहीं है। बात हर चुनाव और हर पार्टी की है। पश्चिमी बंगाल में भाजपा की सरकार की उम्मीद जगी तो टीएमसी के कितने नेता भाजपा की ओऱ लपक लिए थे। यही नेता टीएमसी की सरकार बनने के बाद फिर से टीएमसी में आ गए।
दरअसल देश की राजनीति बस सत्ता के  लिए हो रही है।

न किसी पार्टी की कोई विचारधारा है और न ही किसी के जनहित के मुद्दे। बस किसी भी तरह से सत्ता मिल जाए। जो सरकार दल बदलू नेताओं के बल पर बनती हो वह क्या जनता का क्या खाक भला करेगी ? पार्टियां भी सत्ता के लिए पांच साल तक टिकट का इंतजार करने वाले नेताओं का टिकट काट देती है। दलबदलूओं के बल पर होने वाले सत्ता के स्थानांतरण को बदलाव नहीं कहा जा सकता है। ऐसे में सबसे कठिन स्थिति जनता के लिए पैदा हो जाती है।

दरअसल भाजपा ने भी जिन दल बदलुओं को विश्वास कर अपने कार्यकर्ताओं का टिकट काटा था उन्हीं नेताओं ने उसे धोखा दिया है। 2017 विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने 67 दल-बदलू नेताओं को टिकट दिया था। ये लोग चुनाव से कुछ ही समय पहले पार्टी में शामिल हुए थे। इनमें से 54 नेता जीते भी। ऐसा नहीं कि ये नेता अपने दम पर चुनाव जीते थे। इन नेताओं को मुजफ्फरनगर दंगे और मोदी लहर का फायदा हुआ था। अब भाजपा के बढ़िया प्रदर्शन के दौरान पार्टी में शामिल होकर सत्ता का लाभ लेने वाले यही दल-बदलू आज सबसे पहले पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। राजनीतिक दलों के केंद्रीय नेतृत्व को यह सोचना चाहिए कि पार्टी की विचारधारा को समर्पित कार्यकर्ता-विधायक टिकट कटने पर भी पार्टी के साथ बने रहते हैं और चुनाव में पार्टी के लिए काम करते हैं। लेकिन पार्टी के पक्ष में हवा देखकर साथ आने वाले नेता मौका मिलते ही दूसरे दलों में अपना भाग्य तलाशने लगते हैं।

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