बीएमसी से ठाकरे परिवार का दबदबा खत्म होने के बाद अब यूपी से यादव परिवार का भी लग सकता है नंबर
चरण सिंह
हरियाणा में चौटाला परिवार तो बिहार में लालू परिवार और अब महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के बाद बीएमसी में भी ठाकरे परिवार का दबदबा ख़त्म होने के बाद परिवारवादी पार्टियों को यह समझ लेना चाहिए कि अब इन पार्टियों के वजूद पर खतरा मंडरा रहा है। अगला नंबर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और यूपी में अखिलेश यादव का आ सकता है।
दरअसल महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार की राजनीति का दबदबा इसलिए रहा है क्योंकि 25-30 साल से ठाकरे परिवार उस नगर निगम पर कायम रहा है जो देश का सबसे धनवान नगर निगम माना जाता है। एक रणनीति के तहत बीजेपी ने एकनाथ शिंदे को शिवसेना से तोड़कर जहां विधानसभा से ठाकरे परिवार को बेदखल किया वहीं अब बीएमसी से भी बाहर कर दिया है वह दोनों भाइयों उद्धव ठकरे और राज ठाकरे के मिलने के बावजूद।
उद्धव ठाकरे ने बीएमसी को फिर से हथियाने के लिए अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से पुरानी दुश्मनी भुलाकर हाथ मिलाया पर बीएमसी चुनाव में कुछ कर नहीं पाए। 227 सीटों में 118 सीटें लाकर महायुति ने पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया। ठाकरे परिवार 71 सीटों पर ही सिमट कर रहा गया, जिसमें उद्धव ठाकरे 65 तो राज ठाकरे को मात्र 6 सीटें मिली। कांग्रेस 24 सीटों पर सिमट कर रह गई। 25 साल बाद मुंबई का मेयर बीजेपी का बनने जा रहा है।
देखने की बात यह है कि बीजेपी एक कर परिवारवादी पार्टियों को सिमटती जा रही है। हरियाणा की राजनीति जबरदस्त दबदबा बनाने वाले चौटाला परिवार को बीजेपी ने ऐसा समेटा कि अजय चौटाला और अभय चौटाला अपने वजूद के लिए जूझ रहे हैं। हरियाणा से चौटाला परिवार के साथ ही बंसीलाल और भजनलाल के परिवार के वजूद को भी खत्म कर दिया। पहले मनोहर लाल खट्टर और अब नायब सिंह सैनी को बीजेपी का मुख्यमंत्री बनाया है। ऐसे ही बिहार से लालू परिवार के वजूद को इन विधानसभा चुनाव में पूरी तरह से सीमेंट दिया गया। भले ही लालू प्रसाद ने लम्बे समय तक बिहार पर राज किया हो पर उनके एक बेटे तेज प्रताप ने अलग पार्टी बना ली हो दूसरा तेजस्वी यादव पार्टी के वजूद को बचाने के लिए प्रयासरत है। चिराग पासवान, नीतीश जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति जिस दिन चाहेगी बीजेपी खत्म कर देगी। ऐसे ही चंद्रबाबू नायडू और एकनाथ शिंदे का हाल है।
देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में जहां बसपा प्रमुख मायावती की बोलती बंद कर रखी है वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव को खुलकर राजनीति करने का मौका बीजेपी नहीं दे रही है। मायावती ने अपने भतीजे आकाश को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी तो घोषित कर दिया पर उनको खुलकर बोलने का मौका भी नहीं दिया। जब लोकसभा चुनाव में आकाश आनंद सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी पर आक्रामक हुए तो मायावती ने आकाश को घर बैठा दिया। हालांकि फिर से आकाश को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया है पर वह कुछ कर नहीं पा रहे हैं। ऐसे ही अखिलेश यादव प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता हैं पर कहीं पर भी विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। चाहे किसानों का मामला हो या मजदूरों को या फिर युवाओं का किसी के पक्ष में अखिलेश यादव ने एक भी आंदोलन नहीं किया है।
\लोकसभा चुनाव में 37 सीटों को जीतकर फुले नहीं समाने वाले अखिलेश यादव यह भूल रहे हैं कि ये सीटें बीजेपी में योगी आदित्यनाथ और अमित शाह के विवाद के चलते आ गई थी। अखिलेश यादव तो समाजवाद को भूलकर पीडीए का राग अलापने में लगे हैं। यदि अखिलेश यादव ने कोई बड़ा आंदोलन उत्तर प्रदेश नहीं किया तो बीजेपी बीएसपी के साथ ही सपा को भी सीमेट दे कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
दरअसल इन परिवारवादी पार्टियों की हार का बड़ा कारण इनका जातीय आंकड़ों पर चुनाव लड़ना माना जा रहा है। इन पार्टियों में संघर्ष करने का बहुत बड़ा अभाव देखा जा रहा है। किसी प्रदेश में जनहित में किसी भी पार्टी द्वारा कोई बड़ा आंदोलन नहीं किया गया। मुंबई में भी उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने मिलकर चुनाव तो लड़ लिया पर महायुति सरकार की गलत नीतियों को लेकर मोर्चा नहीं खोला।








