“Rajya Sabha elections” बीजेपी ने बिगाड़ा सपा का खेल !

उतर प्रदेश कि राजनीति इस समय एक अलग रूप ले रही है। राज्यसभा चुनाव में किसकी जीत होगी और किसकी हार होगी यह कहना तो अभी मुश्किल है
लेकिन जिस हिसाब से बीजेपी ने अपना अंकगणित सेट कर लिया है। उसको देखते हुए समाजवादी पार्टी को दिक्कत होने के पूरे पूरे आसार दिख रहे है। बीते सोमवार की शाम डिनर डिप्लोमेसी के जरिए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राज्यसभा का राजनीतिक गणित सेट करने की योजना तैयार की,थी लेकिन उस से कोई खास फर्क नज़र नहीं आया जिसमे संजय सेठ अंकगणित को अपने पक्ष में करने में कामयाब होते दिख रहे हैं। बात करे तो बीते सोमवार की शाम सबकी नज़र समाजवादी के डिनर में शामिल हो रहे विधयाक पर थी पर बड़ा खेला तो तब हो गया जब समाजवादी पार्टी के डिनर से 8 विधायक नदारद रहे। दावे तो सबके एकजुट रहने के किए जा रहे हैं। लेकिन, गौरीगंज विधायक राकेश प्रताप सिंह ने एनडीए उम्मीदवार संजय सेठ को वोट देने का ऐलान कर राजनीतिक पारा गरमा दिया है। ऐसे में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने स्थिति विकट कर दी है। यूपी विधानसभा के तिलक हॉल में वोटिंग की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इस बीच ऐसा लग रहा है कि की जैसे स्तिथि अभी भी ठीक नहीं है दरअसल, 10 राज्यसभा सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। वर्ष 2018 में हुए राज्यसभा चुनाव में 10 सीटों में से 9 पर भाजपा और एक पर सपा उम्मीदवार की जीत हुई थी। विधानसभा चुनाव 2022 के बाद हो रहे इस चुनाव में माना जा रहा था कि भाजपा 7 और सपा 3 सीटों पर आसानी से जीत दर्ज कर लेगी। लेकिन, चुनाव के ऐन पहले जयंत चौधरी ने पाला बदल लिया। वे भाजपा के साथ हो लिए। इसके अलावा ओम प्रकाश राजभर भी भाजपा के साथ हो गए हैं। ऐसी स्थिति में समाजवादी पार्टी की दिक्कत और भी बड़ सकती है। क्योंकी बीजेपी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में उस स्तर पर प्रदर्शन न करने के बाद भी आठवें उम्मीदवार को चुनावी मैदान में उतार दिया। संख्या बल न होने के बाद भी भाजपा के इस उम्मीदवार को उतारे जाने के पीछे सपा में संभावित बिखराव को आधार माना गया। संजय सेठ के चुनावी मैदान में उतरते ही राजनीति गरमाई हुई है। और बात की जाए संजय सेठ कि तो उनका नाता समाजवादी पार्टी से काफी पुराना रहा है। वो पहले भी समाजवादी पार्टी के टिकट पर पहले राज्यसभा जा चुके हैं। ऐसे में पार्टी में उनके चाहने वाले भी मौजूद हैं। पाला बदल कर भाजपा में आए। इसके बाद भी उनके कनेक्शन नेताओं से बने रहे हैं। ऐसे में संजय सेठ के चुनावी मैदान में उतरते ही सपा विधायक और अपना दल कमेरावादी नेता पल्लवी पटेल का पहला बयान सामने आया था। उन्होंने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर आलोक रंजन और जया बच्चन को चुनावी मैदान में उतारने को लेकर निशाना साधा। उन्होंने रंजन- बच्चन के फेर में सपा की पीडीए पॉलिटिक्स को हाशिए पर ले जाए जाने की बात कही। बात हो रही है तो यह भी जान लीजिए राष्ट्रीय लोक दल और जनसत्ता दल का समर्थन मिलने के बाद भाजपा के पास कुल 287 वोट हो गए हैं। सुभासपा के विधायक अब्बास अंसारी जेल में हैं। मतदान की अनुमति न मिलने के चलते एनडीए के 286 ही वोट डाले जा सकेंगे। भाजपा के आठवें उम्मीदवार के पास इस प्रकार 27 वोट अभी हैं। सपा गठबंधन के पास 110 वोट हैं। हालांकि, सपा विधायक रमाकांत यादव और इरफान सोलंकी के जेल में हैं। इस कारण 108 वोट ही डाले जा सकेंगे। तीसरे उम्मीदवार के कोटे में प्रथम वरीयता के 34 वोट इस स्थिति में बचेंगे। समाजवादी पार्टी में जिस प्रकार से बिखराव जैसी स्थिति बनी है, उससे तय है कि 34 वोट एकमुश्त आलोक रंजन को नहीं जा पाएगा। और बात करे तो तो पहले भी समाजवादी पार्टी को पहले भी संकेत मिले थे सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर से पार्टी के प्रदेश कार्यालय पर आयोजित डिनर में विधायक मनोज पांडेय, राकेश सिंह, अभय सिंह, राकेश पांडेय, पूजा पाल, विनोद चतुर्वेदी, महाराजी प्रजापति और पल्लवी पटेल नहीं पहुंची थीं। इन विधायकों के गायब रहने से सपा उम्मीदवार की चिंता बढ़ गई है। पल्लवी पटेल ने पहले ही बगावती रुख दिखाया था। मनोज पांडेय अनुपस्थिति का कारण गिनाते दिखे। वहीं, सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का दावा है कि बैठक को छोड़िए, वोटिंग में सपा विधायक एकजुट दिखेंगे। सपा की कोशिश सुभासपा के दो और आरएलडी के एक विधायक के समर्थन हासिल करने की है। वहीं, सपा के आठवें उम्मीदवार को जिताने के लिए भाजपा की नजर सपा में सेंध पर है। सूत्रों के अनुसार, कुछ विधायकों ने समर्थन का वादा किया है। राज्यसभा चुनाव में दूसरे दल के प्रत्याशी को वोट देने से सदस्यता पर फर्क नहीं पड़ता है। हालांकि, व्हिप के खिलाफ जाने पर पार्टी जरूर एक्शन ले सकती है। अनुपस्थिति से अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। सपा विधायक अगर अनुपस्थित हो जाते हैं तो भी भाजपा उम्मीदवार को फायदा होगा। भाजपा गठबंधन के पास सपा- कांग्रेस के मुकाबले ढाई गुना अधिक विधायक हैं। ऐसे में दूसरी वरीयता के वोटों में भाजपा के आठवें उम्मीदवार को जिताने में कामयाबी मिल सकती है।

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