अर्पणा और शिवपाल के माध्यम से अखिलेश को टारगेट करने की रणनीति बना रही बीजेपी! 

चरण सिंह राजपूत

नई दिल्ली। सपा के संस्थापक बड़े भाई मुलायम सिंह यादव की हर बात मानने वाले शिवपाल यादव भले ही उनके कहने पर गत विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के साथ आ गये हों, भले ही वह मात्र एक सीट पर चुनाव लड़ने के लिए सहमत हो गये हों पर जब विधायकों की बैठक में अखिलेश यादव ने उन्हें नहीं बुलाया तो वह इतने नाराज हो गये कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुंच गये। शिवपाल यादव के दिल्ली में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से भी मिलने की बात सामने आ रही है।
शिवपाल को राज्य सभा में भेजकर अर्पणा यादव को आजमगढ़ से उप चुनाव लड़ा सकती है बीजेपी : यदि विश्वसनीय सूत्रों की माने तो भाजपा शिवपाल यादव को राज्यसभा भेजकर अर्पना यादव को आजमगढ़ सेे लड़ाने की रणनीति बना रही है। दरअसल भाजपा मुलायम परिवार को आपस में ही भिड़ाकर सपा को कमजोर करना चाहती है। शिवपाल यादव को राज्यसभा में भेजने के पीछे भाजपा की रणनीति यह है कि शिवपाल यादव मजबूत होकर ही समाजवादी पार्टी में फूट डाल सकते हैं। भले ही शिवपाल यादव के भाजपा की सदस्यता लेने की बात की जा रही हो पर भाजपा और शिवपाल यादव दोनों ही चाहेंगे कि प्रगतिशील समाजवादी पार्टी में रहकर ही सपा को कमजोर किया जाए। दरअसल उत्तर प्रदेश में जो समीकरण आज की तारीख में हैं उनके अनुसार भाजपा को आने वाले समय में सपा से ही खतरा है। बसपा लगभग खत्म हो चुकी है कांग्रेस के मजबूत होने की संभावना काफी कम हैं। रालोद के अलावा दूसरे छोटे-छोटे दलों का कोई ज्यादा महत्व उत्तर प्रदेश की राजनीति में नहीं रह गया है। ऐसे में अखिलेश यादव से नाराज हुए शिवपाल यादव के माध्यम से भाजपा सपा को कमजोर करना चाहती है। योगी आदित्यनाथ गत कार्यकाल में भी पूर्व प्रधानमंत्री मायावती से बंगला खाली कराकर शिवपाल यादव को दे दिया था।
शिवपाल काफी सपा नेताओं पर आज भी है प्रभाव : दरअसल आज की तारीख में शिवपाल यादव का समाजवादी पार्टी के काफी नेताओं पर काफी प्रभाव है। वैसे भी जिस तरह से शिवपाल याादव पूरी तरह से समर्पण करते हुए अखिलेश यादव के साथ रहे। जसवंत नगर एक सीट पर ही चुनाव लड़ने के लिए मान गये वह सपा के सिंबल पर तो इससे शिवपाल यादव के प्रति समाजवादी पार्टी में भी सहानुभूति बढ़ गई थी। जिस तरह से अखिलेश यादव के शिवपाल यादव को विपक्ष का नेता बनाने की चर्चा राजनीतिक गलियों में चली और उसके बाद अखिलेश यादव आजमगढ़ लोकसभा से इस्तीफा देकर खुद विपक्ष के नेता बन गये और शिवपाल यादव को विधायकों की बैठक में भी नहीं बुलाया। ऐसे में शिवपाल बहुत नाराज हुए और उन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के साथ ही सपा के उनके संपर्क के नेताओं के साथ बैठक करने की बात तक कह डाली।रामगोपाल यादव को बताया जा रहा शिवपाल यादव के साथ खेल कराने का जिम्मेदार : दरअसल शिवपाल यादव के साथ हुई राजनीति के पीछे सपा के मुख्य महासचिव रामगोपाल यादव का नाम बताया जा रहा है। शिवपाल यादव को उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष बनाने की मांग समाजवादी पार्टी में उठने लगी थी। अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव दोनों के ही सपा में शिवपाल यादव से असुरक्षा पालने की बात लगातार सामने आती रही है। इसके पीछे वजह यह है कि किसी समय शिवपाल यादव सपा के संगठन का सारा काम देखते थे। सपा के संगठन पर शिवपाल यादव की गहरी पकड़ बतायी जाती थी। वह बात दूसरी है कि चाचा भतीजे के विवाद में शिवपाल यादव को दरकिनार कर दिया गया। बेटे आदित्य यादव को जसवंत नगर से चुनाव लड़ाना चाहते हैं शिवपाल : शिवपाल यादव की रणनीति है कि जसवंतनगर की खाली कर अपने बेटे आदित्य यादव को वहां से चुनाव लड़ाया जाये, शिवपाल सिंह यादव विधानसभा चुनाव में बेटे को चुनाव लड़ाना चाहते थे पर अखिलेश ने इसके लिए इनकार कर दिया था। भाजपा उनकी यह मंशा पूरी कर उनका भरोशा जीतने की रणनीति बना रही है।
छह महीने में कराना होगा उप चुनाव : दरअसल अखिलेश यादव के आजमगढ़ की सीट से इस्तीफा देने के बाद अब छह महीने के उपचुनाव करना होगा। भाजपा 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए आजमगढ़ लोकसभा सीट सपा से छीनना चाहेगी। ऐसे में आज की तारीख में भाजपा के लिए शिवपाल यादव की बजाय अर्पणा यादव ज्यादा मजबूत प्रत्याशी साबित हो रही है।
आधा घंटा हुई है शिवपाल और योगी आदित्यनाथ की बातचीत : दरअसल शिवपाल सिंह यादव की बुधवार रात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सरकारी आवास पांच कालिदास मार्ग पर आधा घंटा बात हुई है। शिवपाल के वहां से जाने के बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह भी वहां पहुंच गए थे। देखने की बात यह है कि शिवपाल यादव मुलायम सिंह के कहने पर विधानसभा चुनाव में अखिलेश के साथ आए थे पर उचित सम्मान न मिलने की कसक उनके मन में रही। किसी समय सपा में मुलायम के बाद शिवपाल यादव दूसरे नंबर की हैसियत के नेता रहे हैं। सपा की कमान अखिलेश के हाथ में क्या आई कि शिवपाल यादव का न केवल सम्म्मान कम हुआ बल्कि अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच की दूरियां भी बढ़ती गई।

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