आत्मसमर्पण के बाद एनकाउंटर विधि सम्मत राज्य व्यवस्था को तिलांजलि देने जैसा : अजय खरे

संवेदनहीन व्यवस्था में न्याय नहीं, एनकाउंटर होता है

 

रीवा। समता सम्पर्क अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि आत्मसमर्पण के बाद किसी भी व्यक्ति या अपराधी का एनकाउंटर विधि सम्मत राज्य व्यवस्था को तिलांजलि देना है। इस बात को सभी को नोट कर लेना चाहिए कि जब कानून का दुरुपयोग होगा तो देर सबेर इसकी चपेट में हर कोई आएगा। यदि पुलिस विधि सम्मत तरीके से कार्यवाही नहीं करेगी तो उसका दुरुपयोग उसी तरह होगा जैसा अभी हाल में बिहार में भरत तिवारी के साथ हुआ है। आमतौर पर एनकाउंटर से होने वाली मौतों को हम सही नहीं कह सकते हैं। ऐसी मौतें हमेंशा संदेह के दायरे में बनी रहती हैं क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया का इसमें पालन नहीं होता है। कुल मिलाकर एनकाउंटर और बुलडोजर बदला लेने वाली कार्रवाई है, इसे न्यायसंगत नहीं कह सकते हैं।

लोकतंत्र सेनानी श्री खरे ने कहा कि बिहार राज्य के एक युवक भरत भूषण तिवारी का एनकाउंटर 17 जून 2026 को भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत बिलौटी गांव में हुआ। आत्मसमर्पण करने के बाद पुलिस ने उसे गोली मारी और इलाज के दौरान उसकी मौत की खानापूर्ति कर दी। बताया जा रहा है कि गांव की समस्याओं को लेकर लोगों का काम कराने में होने वाली लेट लतीफी और भ्रष्टाचार को लेकर कभी कभी प्रशासनिक अधिकारियों से उसकी नोक झोंक हो जाती थी।‌‌ एक तरह की बातों को लेकर जब पुलिस उसके घर दवाब बनाने पहुंची तब उसने रिवाल्वर तानकर आक्रोश व्यक्त किया था। निश्चित रूप से उसकी यह हरकत गैर कानूनी और गलत थी। यदि इस मामले में पुलिस वाले उसे गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर जेल भेज देते तो कुछ गलत नहीं होता लेकिन यहां पुलिस ने भरत तिवारी को आत्मसमर्पण कराके संबंधित न्यायालय ले जाने के बजाय उसी गांव में एनकाउंटर के नाम पर मार डाला। सुनने में यह भी आया कि पुलिस ने अपने बचाव में उसे मानसिक रूप से विक्षिप्त बताया है। ऐसी स्थिति में भरत तिवारी पूरी तरह सहानुभूति का पात्र होना चाहिए। इस संबंध में उसके मानसिक इलाज के लिए पहल होना चाहिए थी। पुलिस प्रशासन के द्वारा उसका मेडिकल चेकअप कराकर डॉक्टर अभिमत पर उसका इलाज होना चाहिए था, ना कि उसे पागल हाथी की तरह मार डालने की अप्रिय घटना को अंजाम देना चाहिए था। यह बात बहुत आपत्तिजनक और मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाना है।

श्री खरे ने कहा कि एनकाउंटर मामले में लोगों की संवेदनाएं खत्म नहीं होना चाहिए। किसी मामले में लोगों का आक्रोश उमड़ता है तो दूसरे मामले में धर्म और जाति के आधार पर उसे अनदेखा किया जाता है। गलत को गलत कहने का साहस होना चाहिए। संवेदनहीन व्यवस्था में न्याय नहीं, एनकाउंटर होता है।

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