हाहा, गजब की बात है भाई! पाकिस्तानी मीडिया, व्यापार संगठन (जैसे Karachi Chamber of Commerce – KCCI) और कुछ सोशल एक्टिविस्ट्स अब शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम मुनीर को नोबेल शांति पुरस्कार देने की मांग कर रहे हैं। वजह? अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का अस्थायी सीजफायर (temporary ceasefire) में पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता।
क्या हुआ असल में?
ट्रंप ने खुद ट्वीट/पोस्ट में कहा कि शहबाज शरीफ और असीम मुनीर से बातचीत के बाद उन्होंने ईरान पर हमले दो हफ्ते के लिए टाल दिए। पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में आगे की बातचीत होस्ट करने की पेशकश भी की है। पाकिस्तानी पक्ष इसे बड़ा डिप्लोमैटिक विन बताकर सेलिब्रेट कर रहा है। कुछ ने तो इसे “World War 3 रोकने” वाला कमाल बता दिया।
लेकिन हकीकत थोड़ी अलग लगती है:
सीजफायर अधूरा और temporary (मात्र 2 हफ्ते) है। पूरा युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ।
ईरान-इजराइल-USA के बीच तनाव लंबे समय से चल रहा है। चीन जैसी बड़ी ताकतों की भी भूमिका बताई जा रही है। पाकिस्तान की “मध्यस्थता” कितनी निर्णायक थी, ये अभी साफ नहीं — ज्यादातर पाकिस्तानी नैरेटिव पर आधारित लग रहा है। पहले भी पाकिस्तान ट्रंप को ही नोबेल देने की सिफारिश कर चुका था (India-Pakistan तनाव के समय), फिर उल्टा भी हो गया था। अब अपनी लीडरशिप को नोबेल? क्लासिक पैटर्न।
क्यों लग रहा है “आधा-अधूरा” और ओवर-हाइप?
नोबेल शांति पुरस्कार आमतौर पर लंबे समय तक चलने वाले शांति समझौतों, बड़े संघर्षों को खत्म करने या मानवाधिकारों के लिए दिया जाता है (जैसे ओस्लो समझौता, कुछ पर्यावरण/अभियान वाले भी मिले हैं)। यहां:
सिर्फ 2 हफ्तों का ब्रेक।
अभी कोई स्थायी शांति नहीं, कोई बड़ा ट्रीटी नहीं। पाकिस्तान खुद क्षेत्रीय तनावों (खासकर भारत के साथ) में घिरा रहता है, और उसका रिकॉर्ड शांति का चैंपियन वाला नहीं रहा।
फिर भी, घरेलू ऑडियंस के लिए ये नैरेटिव अच्छा है — “हमने दुनिया बचा ली!” टाइप। कुछ पूर्व इटालियन PM Paolo Gentiloni ने भी पाकिस्तान की तारीफ की, जिसे पाक मीडिया ने बड़ा बना दिया।
मजेदार बात: पाकिस्तान पहले ट्रंप को नोबेल देना चाहता था, अब खुद को। शायद अगली बार कोई और टेम्पररी सीजफायर पर पूरा नोबेल कमिटी पाकिस्तान शिफ्ट कर दे!








