बिहार की राजनीति में इन दिनों भ्रष्टाचार के आरोपों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। जन सुराज पार्टी (जेएसपी) के संस्थापक प्रशांत किशोर (पीके) ने हाल के दिनों में एनडीए (बीजेपी-जेडीयू) के कई बड़े नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे सत्ताधारी गठबंधन में खलबली मच गई है। एक तरफ विपक्ष ‘जंगलराज’ का राग अलाप रहा है, वहीं पीके जैसे नए खिलाड़ी ‘विकास’ के नाम पर भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रहे हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ये आरोप बीजेपी-जेडीयू के लिए सिरदर्द बन चुके हैं। आइए, इस पूरे विवाद को समझते हैं।
पीके के आरोप: दस्तावेजों के साथ हमला
प्रशांत किशोर ने 19 सितंबर 2025 को पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एनडीए के चार प्रमुख नेताओं—उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय, ग्रामीण विकास मंत्री अशोक चौधरी और बीजेपी सांसद संजय जायसवाल—पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि ये नेता ‘लालू प्रसाद से भी ज्यादा भ्रष्ट’ हैं। मुख्य आरोप इस प्रकार हैं:
नेता का नाममुख्य आरोपअशोक चौधरी (जेडीयू)पिछले दो सालों में ₹200 करोड़ की जमीन खरीदी, जिसमें पत्नी, बेटी शंबवी चौधरी (समस्तीपुर से सांसद) और भाभी अनीता कुणाल का नाम शामिल। ‘मनव वैभव विकास ट्रस्ट’ के नाम पर अवैध खरीदारी का दावा। 2019 में 23 कठ्ठा जमीन ₹34 लाख में खरीदी, लेकिन केवल ₹10 लाख का भुगतान—बाद में आयकर नोटिस के बाद बाकी राशि चुकाई।सम्राट चौधरी (बीजेपी)नाम बदलने और दस्तावेजों में हेराफेरी का आरोप। डी-लिट डिग्री का दावा, लेकिन कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा तक पास न करने का इल्जाम।मंगल पांडेय (बीजेपी)स्वास्थ्य विभाग में अनियमितताएं, जैसे 1,200 एम्बुलेंस ₹28 लाख प्रत्येक में खरीदी (ओडिशा-यूपी से दोगुनी कीमत)। पूर्व बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल के साथ ‘क्विड प्रो क्वो’।संजय जायसवाल (बीजेपी)संपत्ति लेन-देन में अनियमितताएं और हत्या के पुराने आरोपों का जिक्र।
पीके ने कहा, “नीतीश कुमार ईमानदार हो सकते हैं, लेकिन उनके मंत्री और अधिकारी राज्य को लूट रहे हैं।” ये आरोप उनकी ‘बिहार बदलाव यात्रा’ का हिस्सा हैं, जो 2025 चुनाव में जेएसपी को मजबूत बनाने का प्रयास है।
सत्ताधारी दलों का जवाब: खारिज और कानूनी कार्रवाई
जेडीयू का रुख: पार्टी ने सीएम नीतीश कुमार को विवाद से दूर रखा। प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा, “नीतीश जी की साफ-सुथरी छवि बिहार की राजनीति का आधार है।” लेकिन अशोक चौधरी ने 23 सितंबर को पीके को ₹100 करोड़ का मानहानि नोटिस भेजा, जिसमें सात दिनों में सबूत मांगे या सार्वजनिक माफी। चौधरी ने दावा किया कि वे ‘मनव वैभव विकास ट्रस्ट’ से कोई लेना-देना नहीं रखते और आरोप ‘झूठे व प्रेरित’ हैं।
बीजेपी का काउंटर-अटैक: पार्टी ने पीके के आरोपों को ‘फ्रिवोलस’ बताया और सबूत मांगे। साथ ही, उल्टा आरोप लगाया कि पीके ने ‘शेल कंपनियों’ के जरिए सैकड़ों करोड़ जुटाए। प्रदेश प्रवक्ता नीरज कुमार ने जेएसपी को ‘फ्रॉड पर आधारित पॉलिटिकल स्टार्टअप’ कहा। स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने कहा, “पीके की आदत बन गई है बिना सबूत के आरोप लगाने की।”
ये प्रतिक्रियाएं दिखाती हैं कि एनडीए डैमेज कंट्रोल में जुटा है, लेकिन चुनाव से पहले ये मुद्दा उनकी एकजुटता को चुनौती दे रहा है।
जंगलराज vs विकास: राजनीतिक संदर्भ
जंगलराज का नैरेटिव: विपक्ष (आरजेडी-कांग्रेस) लालू-राबड़ी काल के ‘जंगलराज’ को भूलने नहीं देता, लेकिन पीके ने इसे पलट दिया। उन्होंने कहा, “आरजेडी के राज में अपहरण बिहार का सबसे बड़ा उद्योग था, जो लालू परिवार नियंत्रित करता था।” तेजस्वी यादव पर तंज कसते हुए बोले, “अगर नीतीश क्राइम-करप्शन के भीष्म पितामह हैं, तो तेजस्वी दुर्योधन।” पीके का दावा है कि एनडीए के नेता लालू से भी बदतर हैं।
विकास का एंगल: पीके विकास को भ्रष्टाचार-मुक्त शासन से जोड़ रहे हैं। उन्होंने वादा किया कि जेएसपी की सरकार बनेगी तो भ्रष्ट नेताओं-अधिकारियों पर ‘जीरो टॉलरेंस’ होगा। उनकी यात्रा में हजारों लोग जुड़ रहे हैं, खासकर युवा जो 2020 में तेजस्वी के ’10 लाख नौकरियां’ वादे से निराश हैं। एक्स पर भी #JanSuraaj ट्रेंड कर रहा है, जहां यूजर्स बीजेपी-जेडीयू की ‘कराह’ का मजाक उड़ा रहे हैं।
चुनावी प्रभाव: बीजेपी-जेडीयू की बढ़ती टेंशन
2025 बिहार चुनाव (नवंबर में संभावित) में ये आरोप गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं। जेएसपी का वोट शेयर 5-10% तक पहुंच सकता है, जो जेडीयू (2020 में 15.7%) और आरजेडी (23.1%) को नुकसान पहुंचाएगा। एनडीए की सीटें घाट सकती हैं, क्योंकि पीके ने केंद्रीय मुद्दों जैसे रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर फोकस किया है। बीजेपी ने पीके को ‘बिग ब्रदर’ कहा, लेकिन उनका काउंटर कमजोर लग रहा है। जेडीयू में आंतरिक असंतोष भी बढ़ा है, क्योंकि नीतीश की ‘साफ छवि’ पर सवाल उठ रहे हैं। कुल मिलाकर, ये विवाद बिहार को ‘जंगलराज’ से ‘विकासराज’ की बहस में धकेल रहा है। पीके की रणनीति साफ है—भ्रष्टाचार को हथियार बनाकर नई राजनीति की कोशिश। लेकिन क्या ये आरोप अदालत में टिकेंगे? या चुनावी ड्रामा साबित होंगे? आने वाले दिनों में और खुलासे होंगे, जो बिहार की सियासत को और गरमा देंगे।








