कांग्रेस वंदे मातरम के दो ही छंद क्यों गाएगी? जानें 1937 का सच और पटेल तक इतिहास

‘वंदे मातरम’ को लेकर इन दिनों देशभर में एक नई बहस छिड़ी हुई है। कांग्रेस पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत के सिर्फ पहले दो छंद ही गाएगी। बीजेपी इसे ‘वंदे मातरम का अपमान’ बता रही है, तो कांग्रेस कह रही है कि वह 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) में लिए गए उसी फैसले पर चल रही है, जिसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी माना था. तो क्या था CWC का फैसला, 15 अगस्त 1947 की आधी रात को कितने छंद गाए गए और टैगोर, गांधी, पटेल जैसे महानायक कितने छंद गाते थे।

‘वंदे मातरम’ के कुल कितने छंद हैं?

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम’ की रचना 1875 में की थी. उन्होंने इसे अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में शामिल किया. मूल रूप से यह गीत संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण में लिखा गया है. ‘वंदे मातरम’ में कुल छह छंद हैं। पहले दो छंद मातृभूमि की सुंदरता, नदियों, फलों, हरी-भरी फसलों और ठंडी हवाओं का वर्णन करते हैं. बाकी के चार छंदों में देवी-देवताओं और धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख है।

1950 में जब ‘वंदे मातरम’ को भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया, तब सिर्फ पहले दो छंदों को ही आधिकारिक रूप से मान्यता दी गई.

कांग्रेस ने 1937 में क्या फैसला लिया था?

द नेहरू आर्काइव में रिकॉर्ड के मुताबिक, अक्टूबर 1937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने वंदे मातरम् पर बैठक हुई। इसमें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे दिग्गज नेता मौजूद थे।

इस बैठक में यह फैसला लिया गया कि राष्ट्रीय और सार्वजनिक सभाओं में ‘वंदे मातरम’ के केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे। दरअसल, बाकी के चार छंदों में धार्मिक चित्रण था। इससे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती थीं. कांग्रेस ने देश के सांप्रदायिक सौहार्द और सभी धर्मों के लोगों को साथ लेकर चलने के लिए यह फैसला किया।

यह फैसला करीब 80 सालों से कांग्रेस की परंपरा रही है। यानी कांग्रेस ने यह नहीं कहा था कि वंदे मातरम् खराब गीत है, न यह कहा था कि इसे राष्ट्रीय आंदोलन से हटा दिया जाए।

15 अगस्त 1947 की आधी रात को कितने छंद गाए गए?

राज्यसभा के रिकॉर्ड के मुताबिक, 14 अगस्त 1947 की रात 11 बजे संविधान सभा का पांचवां सत्र संविधान हॉल, नई दिल्ली में शुरू हुआ। अध्यक्ष की कुर्सी पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे. देश आजादी की दहलीज पर था। इस सत्र का पहला एजेंडा कोई भाषण नहीं, बल्कि वंदे मातरम् का पहला छंद गाना था।

आधिकारिक कार्यवाही में अध्यक्ष के शब्द हैं, ‘पहला कार्यक्रम वंदे मातरम् के पहले छंद का गायन है और सभी लोग इसे खड़े होकर सुनेंगे.’ इसके बाद सुचेता कृपलानी ने पहला छंद गाया. वह पहला पद था।

वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्।
वन्दे मातरम्॥

इसका मतलब बिल्कुल साफ है कि आजादी की उस आधी रात को संविधान सभा में वंदे मातरम् के दो नहीं, सिर्फ एक छंद का गायन हुआ था. इसके बाद कार्यक्रम में ‘सारे जहां से अच्छा’ की शुरुआती पंक्तियां और ‘जन गण मन’ का पहला पद भी सुचेता कृपलानी ने गाया.

कई जगह यह लिखा मिलता है कि 15 अगस्त की आधी रात को पूरा ‘वंदे मातरम्’ गाया गया था, लेकिन संविधान सभा की आधिकारिक कार्यवाही इसका समर्थन नहीं करती. रिकॉर्ड में स्पष्ट शब्द हैं, ‘the first verse of VANDE MATARAM’.

टैगोर, गांधी और पटेल कितने छंद गाते थे?

राज्यसभा के डेटा के मुताबिक,

रवींद्रनाथ टैगोर: टैगोर ने 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार ‘वंदे मातरम’ गाया था। टैगोर ने महात्मा गांधी के साथ मिलकर सुझाव दिया था कि राष्ट्रीय गीत के सिर्फ पहले दो छंद ही अपनाए जाने चाहिए।
महात्मा गांधी: गांधीजी ने 1927 में ‘वंदे मातरम’ को ‘पूरे राष्ट्र का गीत’ कहा था. लेकिन उन्होंने धार्मिक आपत्तियों के कारण सिर्फ पहले दो छंदों का समर्थन किया. वे चाहते थे कि यह गीत सभी धर्मों के लोगों को एकजुट करे। सरदार वल्लभभाई पटेल: पटेल 1937 के CWC फैसले में शामिल थे. उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के उस प्रस्ताव का समर्थन किया था, जिसमें ‘वंदे मातरम’ के सिर्फ पहले दो छंदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाने की बात थी।
जवाहरलाल नेहरू: पंडित नेहरू ने भी गांधीजी और टैगोर के साथ मिलकर सिर्फ दो छंदों के पक्ष में रुख अपनाया.
यानी, ये सभी महानायक ‘वंदे मातरम’ के सिर्फ पहले दो छंद ही गाते थे.

तो फिर अब विवाद क्या है?

19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने फिर से 1937 के फैसले को दोहराते हुए साफ किया कि कांग्रेस सिर्फ दो छंद ही गाएगी. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, ‘मैंने वही ‘वंदे मातरम’ गाया, जो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अटल बिहारी वाजपेयी ने गाया. अगर यह अपराध है, तो गांधीजी, नेहरू और पटेल के खिलाफ मामला दर्ज करें।

बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने कांग्रेस के इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि पार्टी का यह रुख वंदे मातरम् का अपमान है. नितिन ने इसे वोट की राजनीति से जोड़ते हुए कांग्रेस की तुलना ‘नई मुस्लिम लीग’ से की।

एक तरफ यह बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की मूल छह-छंद वाली रचना है. दूसरी तरफ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसके शुरुआती दो छंदों ने अलग राष्ट्रीय पहचान हासिल की. 1937 में कांग्रेस ने राष्ट्रीय सभाओं के लिए इन्हीं दो छंदों को स्वीकार किया. 1947 की आजादी की आधी रात को संविधान सभा ने इससे भी छोटा, यानी सिर्फ पहला छंद आधिकारिक रूप से गाया. 1950 में वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के बराबर सम्मान देने की घोषणा हुई।

2026 में केंद्र सरकार ने आधिकारिक आयोजनों में पूरे छह छंदों वाले संस्करण के इस्तेमाल का नया प्रोटोकॉल लागू किया, जबकि कांग्रेस ने अपने पार्टी कार्यक्रमों के लिए दो छंद वाली 1937 की परंपरा को फिर दोहराया. यानी ‘वंदे मातरम् के दो छंद’ कोई 2026 में बनाया गया राजनीतिक तर्क नहीं है. इसकी जड़ 1937 में है, लेकिन ’15 अगस्त 1947 की आधी रात को दो छंद गाए गए थे’ कहना भी सही नहीं है. उस ऐतिहासिक रात के संविधान सभा रिकॉर्ड में सिर्फ एक छंद दर्ज है।

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