प्रोफेसर राजकुमार जैन
हिंदुस्तान पाकिस्तान के बंटवारे पर आधारित किताब,’बंटवारे’ पढ़ने का मौका मिला। सैकड़ो साल की बरतानिया हुकूमत की गुलामी से हिंदुस्तान को मिली आजादी में भारत-पाक बंटवारे की भयंकर त्रासदी, जिससे मजहब के नाम पर लाखों लोगों की अदला बदली में अनगिनत लोगों के कत्ल, अपने घर से दरबदर, बर्बादी के इतिहास पर अनेक किताबें, पत्रिकाएं, साक्षात्कार, टिप्पणियां छप चुकी है। इस विषय पर पत्रकार तथा दिल्ली के इतिहासकार विवेक शुक्ला की नई किताब ‘बंटवारे’अलग तरह की रोशनी बिखेरती लग रही है।
सवाल यह है कि जब पहले से ही इस मौजू पर बड़े पैमाने पर प्रकाशन हो चुका है तो इस किताब की अहमियत क्या है? पत्रकार लेखक विवेक शुक्ल जिनको दिल्ली का एनसाइक्लोपीडिया भी कहा जाता है की किताब अखबारों, किताबों की कतरन या जो बातें तथ्य पहले ही छप चुके हैं उससे अलग हटकर एक भुक्त भोगी परिवार में जन्म लेने तथा एक संजीदा पत्रकार होने कारण एक नए दृष्टिकोण से उन्होंने इस किताब की रचना की है। बंटवारे के बारे में अधिकतर छपी किताबों में उस दौर के नरसंहार, क्रूरता,बर्बादी, बलात्कार तथा इंसानी जीवन की लाचारी बेबसी का वर्णन किया गया है। विवेक शुक्ला ने उस त्रासदी के जिक्र के साथ-साथ उससे पैदा हुए हालात, उसमें बड़े से बड़े हिंदू मुस्लिम नेताओं की भूमिका को भी दर्ज किया है। नए बने राष्ट्र भारत और पाकिस्तान के बाद के रिश्तों के संदर्भ में भी लिखा है। बंटवारे से जो अर्श से फर्श पर आ गए थे हिंदुस्तान के गांव शहरों में बसे यह बेघरबार शरणार्थी कैसे अपने हौसले जी तोड़ मेहनत के बल पर हिंदुस्तान के नामवर बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों के मालिक बन गए उसका भी रोचक वर्णन किया है। किताब में जहां एक और दर्द, चीख पुकार, जुल्म ज्यादतियों का जिक्र है वही ‘कोटला में नूरजहां का आशिक’, ‘इमरान, जालंधर, जामा मस्जिद’, ‘डीयू में पाक पीएम की पत्नी’, ‘उसने दिया बटर चिकन’, ‘राजघाट पर कांपते मुशर्रफ’, ‘जिन्ना Daw और दरयागंज’, ‘दिलीप साहब का मजहब’, जैसे अध्यायों में रोचक किस्से को लिखकर अवसाद में डूबे पाठक को कुछ राहत दी है। आजादी के बाद भी पाकिस्तान के बड़े नेताओं के क्या स्वार्थ हिंदुस्तान के साथ जुड़े हुए थे उसको भी लेखक ने ‘भुट्टो क्यों 1958 तक रहे भारतीय’ ‘कौन-कौन आया भारत’, ‘भारत क्यों आया पाक का हिंदू मंत्री’मैं स्पष्ट किया है। किताब में इतिहास के कई अनछुए पहलुओ जैसे ‘आजादी 15 अगस्त 1947 को ही क्यों’, ‘वह पहला तिरंगा कहां गया’, ‘गढ़वाल ढाका चटगांव के शरणार्थी ‘जैसे अध्यायों में रोशनी में लाने का प्रयास किया। किताब में सबसे ज्यादा मार्मिक वर्णन आजादी के बाद हिंदुस्तान आए हुए शरणार्थी जो रेलों से स्टेशनों पर आए थे, भूखे प्यासे, लुटे पिटे, सहमें बेघरबार अनजान बस्ती में आए इन लोगों की करुण गाथा को ‘दिल्ली जंक्शन पर कौन उतरा’, में लिखा सिर्फ 16 साल की उम्र में उड़न सिख मिल्खा सिंह अकेले अनाथ दिल्ली जंक्शन पर उतरे थे। मिल्खा सिंह के परिवार के कई सदस्यों का कत्ल कर दिया गया था।
मिल्खा सिंह सीधे सरहद के उस पार से दिल्ली नहीं आए थे। वह पहले पश्चिमी पंजाब के अपने शहर कोट अददू से मुल्तान शहर रेल से पहुंचे थे। वहां से वे ट्रक पर फिरोजपुर आए थे। बंटवारे को लेकर उनकी यादें बेहद दिल दहलाने वाली थी। उनके पिता का दंगाइयों ने कत्ल कर दिया था। उन्होंने मरते वक्त कहा था ‘भाग मिल्खा भाग'( इसी को लेकर फिल्म भी बनी) फिरोजपुर से वह दिल्ली आए थे। दरअसल वे अपने गांव से जान बचाकर भागने के दौरान अपनी बहन से बिछड़ गए थे। शरीर सुन्न होने लगता था जब मिल्खा सिंह उस दौर के किस्से बयां करते थे। दिल्ली में शरणार्थियों के जत्थे आ रहे थे। सब तरफ अफरा तफरी का आलम था। मिल्खा सिंह अपनी बिछड़ गई बहन हुंडी को खोजने दिल्ली आए थे और सफल भी रहे।
‘लोधी कॉलोनी रेलवे स्टेशन पर’ लेखक ने लिखा “फूटे सपनों के साथ नई जिंदगी तलाश में जुटे थे। (इसी के साथ-साथ एक अध्याय में उन मुसलमानों की कहानी भी है जो पाकिस्तान की राह पकड़ रहे थे।) इसमें उनकी आशंकाएं , उलझने और अंतिम विदाई के क्षणों का लेखा-जोखा है। ये स्टेशन मात्र यात्रा के ठिकाने नहीं थे। ये आशा और निराशा, मिलन और बिछोह, जीवन और मृत्यु के जीवंत गवाह थे। इन्हें लिखते वक्त मेरी आंखें कई बार नम हुई। उन प्लेटफार्मों पर आज भी वह दर्द महसूस होता है जो लाखों लोगों ने वहां सहा था। किताब का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी देखने में आया कि सारे हिंदू मुस्लिम फसाद के बावजूद लेखक ने उन मुसलमानों को विशेष रूप से याद किया है जिन्होंने पाकिस्तान के विचार को ठुकराया और भारत को अपना अभिन्न अंग बनाया। उनकी आंतरिक दुविधा, अदम्य साहस और इस देश के प्रति अटूट निष्ठा इस किताब का एक अहम हिस्सा है। दिलीप कुमार पर समर्पित अध्याय इसी भावनाओं को आगे बढ़ाता है। उनके परिवार में विभाजन को लेकर जो भावनात्मक द्वंद चला उसको भी लेखक ने विस्तार से उकेरा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विभाजन की लकीर सिर्फ भौगोलिक सीमाओं पर नहीं बल्कि परिवारों के दिलों और रिश्तों पर भी खींची थी।
किताब का सबसे महत्वपूर्ण पहलू गांधी के संदर्भ में उभरता है। लेखक विवेक शुक्ला के लेखन पर गांधी की छाया हमेशा पीछा करते हुए प्रतीत होती है। ‘दो गांधी कहां’, ’27 जनवरी 1947 को कहां गए थे गांधी जी’, ‘बांग्लादेश को मिले गांधी’, ‘नोआखली में कहां से आएंगे गांधी’, ‘मरने से तीन दिन पहले कहां गए थे गांधीजी’
‘ दो गांधी कहां’ मे वे लिखते हैं, लाहौर और कराची जैसे शहरों में कांग्रेस का प्रभाव था जिसके कारण वहां कांग्रेस के अधिवेशन हुए। इन शहरों में रहने वाले कांग्रेसी 1947 के बाद वहां ही रह गए। उनके बीच गांधी जी के सत्य, अहिंसा और सर्वोदय जैसे सिद्धांतों को लेकर प्रतिबद्धता बनी रही। यकीन कीजिए कि पाकिस्तान में कांग्रेस और गांधी की विचारधारा से जुड़े लोग अब भी हैं। कराची तथा रावलपिंडी में गांधी जी के नाम पर पार्क भी थे। हालांकि हुकूमत ने संकीर्ण सोच के कारण उनके नाम तो बदल दिए लेकिन गांधी के विचार बने हुए हैं। वहां का शिक्षित और उदारवादी तबका आज भी गांधी और उनके विचारों को आदर के भाव से देखता है।
एक बात और पाकिस्तान सरकार भले ही गांधी से डरती हो या उन्हें नापसंद करती हो पर वहां भी सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलने वाले बहुत से लोग अपने नाम के साथ गांधी का नाम जोड़ते हैं।
27 जनवरी 1947 को कहां गए थे गांधीजी, का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि महात्मा गांधी 9 सितंबर 1947 को नोआखली और कोलकाता में दंगों को शांत करवा कर आए थे। वे शाहदरा रेलवे स्टेशन पर उतरे थे। तब दिल्ली में सरहद पार से हिंदू- सिख शरणार्थी आ रहे थे, यहां से बहुत से मुसलमान पाकिस्तान जा रहे थे। करोल बाग, पहाड़गंज, दरियागंज, महरौली में मार काट मची हुई थी। वह दंगाग्रस्त क्षेत्र का बार-बार दौरा कर रहे थे। पर बात नहीं बन रही थी। इस बीच कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के बाहरी हिस्से को भी दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई। इस घटना से बापू दुखी थे। उन्हें 12 जनवरी 1948 को खबर मिली थी कि कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के बाहरी हिस्से को दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई है। ये सुनने के बाद उन्होंने अगले दिन से उपवास पर जाने का निर्णय लिया।
‘अब नोआखली में कहां से आएंगे गांधी’,- में दंगाग्रस्त क्षेत्रों मैं हो रहे नरसंहार की आग बुझाने के लिए गांधी जी अपनी जान को जोखिम में डालकर जुटे थे उस संदर्भ में किताब में लिखा है, बांग्लादेश में हिंदू कठमुल्लो के निशाने पर रहते हैं। यहां पर भी 1946 में महात्मा गांधी ने जाकर हिंदुओं के कत्लेआम को रोका था। नोआखली देश की आजादी के बाद पूरी पाकिस्तान का हिस्सा बना रहा। कांग्रेस के नेता डॉक्टर विधान चंद राय ने 18 अक्टूबर 1946 को बताया था की नोआखाली के हालात बिगड़ते जा रहे हैं, हिंदुओं का नरसंहार हो रहा है, हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा है, मोहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के बाद कोलकाता में भड़की हिंसा और कत्लेआम का असर नोआखाली में भी हुआ था गांधी जी ने स्थिति की गंभीरता को समझा और उन्होंने 19 अक्टूबर 1946 को नोआखाली जाने का फैसला किया।
-गांधी के साथ कौन गया नोआखाली—
गांधी जी 6 अक्टूबर 1946 को नोआखली के लिए रवाना हुए और अगले दिन वहां पहुंच गए। उनके साथ उनके निजी सचिव प्यारेलाल नैयर, डॉ राममनोहर लोहिया, गांधी जी की अनन्य सहयोगी आभा और मनु वगैरा भी थे। बापू 9 नवंबर को नंगे पैर नोआखली के दौरे पर निकले। उन्होंने अगले 7 हफ्तों में 116 मिल की दूरी तय की और 47 गांवों का दौरा किया। गांधी जी ने मुस्लिम लीग सरकार की तमाम अड़चनों के बाद भी 4 महीने गांव-गांव पैदल घूम कर पीड़ित हिंदुओं के आंसू पोंछने, हौसला और सांत्वना देने का काम किया। मुख्यमंत्री शाहिद हुसैन सुहरावर्दी ने गांधी जी से नोआखली को छोड़ने के लिए कहा था। पर जब तक हालात बेहतर नहीं हो गए तब तक गांधी जी वहां से हिले नहीं।
इतिहास गवाही देता है कि जिस नेता के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन, क्रांति हुई आजादी मिलने के बाद वही सत्ता के सिंहासन पर बैठा। चीन में माओ, रूस में लेनिन, वियतनाम में हो ची मीन्ह, दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला, बांग्लादेश में मुजीबुर रहमान, पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना जैसे अनेकों उदाहरण है इस संदर्भ में भी गांधी सबसे अलग है। विवेक शुक्ला अपनी किताब में प्रश्नचिन्ह लगाते हुए पूछते हैं कहां थे गांधीजी? फिर उसका जवाब देते हुए लिखते हैं, सत्ता का हस्तांतरण और स्वाधीनता से जुड़े अन्य जरूरी आयोजन दिल्ली में हो रहे थे तो ऐसे में समुचित देश की निगाहें दिल्ली पर टिकी थी। सभी नेता दिल्ली में थे लेकिन हमारे स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेता महात्मा गांधी यहां से दूर कलकत्ता अब (कोलकाता) में थे। वे उस दिन कोलकाता के बलिया घाट इलाके के हैदरी हाउस में थे। यह वही स्थान है जहां उन्होंने सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए आमरण अनशन किया था। वे 13 अगस्त 1947 को यहां आए थे तब शहर में 25 दिन दिनों तक रहे। आजादी के बाद जब कोलकाता और देशके विभिन्न स्थानों पर सांप्रदायिक दंगे भड़के उस वक्त गांधी जी ने 1 सितंबर को आमरण अनशन शुरू किया था। उनके अनशन करने के बाद हिंदू मुस्लिम समुदायों के दिग्गज नेताओं के ने यहां आकर गांधी जी के सामने माफी मांगी थी। 4 सितंबर को दंगे रुकने के बाद गांधी जी ने अपना। अनशन खत्म किया था और वह 7 सितंबर को यहां से चले गए थे। वे दिल्ली 9 सितंबर 1947 को पहुंचे थे। दिल्ली में आकर भी वे सांप्रदायिक दंगों को रुकवाने में लग गए थे। बंटवारे पर लिखी हुई इस किताब को किसी भी मानवीय करुणा से भरे इंसान को पढ़ना जहां एक तरफ अपने आंसुओं से तरबतर होना है, वही इतिहास के गर्भ में छुपे हुए अनेकों अनजान घटनाक्रमों से वाकिफ होना भी है।








