दलितों की मुक्ति में संघर्ष की भूमिका पर डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर के विचार

एस आर दारापुरी 

डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर (1891–1956) आधुनिक भारत के उन महानतम विचारकों में हैं जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन दलितों, वंचितों और शोषित वर्गों की मुक्ति के लिए समर्पित किया। वे केवल भारतीय संविधान के शिल्पकार ही नहीं थे, बल्कि एक समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता, मानवाधिकार चिंतक और सामाजिक क्रान्तिकारी भी थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि सदियों से शोषित समाज की मुक्ति केवल दया, परोपकार या ऊँची जातियों की सद्भावना से सम्भव नहीं है। मुक्ति का मार्ग संघर्ष, संगठन, शिक्षा, राजनीतिक शक्ति और सामाजिक चेतना से होकर गुजरता है।

डॉ. अम्बेडकर ने जाति-व्यवस्था को केवल एक सामाजिक बुराई नहीं माना, बल्कि उसे भारतीय समाज की सबसे बड़ी संरचनात्मक समस्या बताया। उनके अनुसार जाति-व्यवस्था मनुष्य की स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व का निषेध करती है तथा दलितों को स्थायी रूप से अधीन बनाए रखने का कार्य करती है। इसलिए उन्होंने दलितों की मुक्ति के लिए एक व्यापक संघर्ष का आह्वान किया, जो सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और वैचारिक—सभी स्तरों पर लड़ा जाना चाहिए।

उनका प्रसिद्ध मंत्र—”शिक्षित हो, संघर्ष करो, संगठित हो “—केवल एक नारा नहीं, बल्कि दलित मुक्ति का समग्र दर्शन है। शिक्षा चेतना उत्पन्न करती है, संगठन शक्ति प्रदान करता है और संघर्ष परिवर्तन का माध्यम बनता है।

जाति-व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष की आवश्यकता

डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि दलितों की समस्या केवल गरीबी की समस्या नहीं है, बल्कि सामाजिक दासता की समस्या है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति जाति का विनाश (Annihilation of Caste) में स्पष्ट किया कि जाति-व्यवस्था “क्रमबद्ध असमानता” (Graded Inequality) पर आधारित है। प्रत्येक जाति अपने से नीचे की जाति को हीन समझती है और अपने से ऊपर की जाति के सामने स्वयं को हीन मानती है। परिणामस्वरूप शोषित वर्गों में भी एकता विकसित नहीं हो पाती।

अम्बेडकर के अनुसार, यही व्यवस्था भारतीय समाज को विभाजित रखती है और दलितों की मुक्ति में सबसे बड़ी बाधा बनती है। इसलिए संघर्ष का उद्देश्य केवल अस्पृश्यता का अंत नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जाति-व्यवस्था का उन्मूलन होना चाहिए।

अधिकार संघर्ष से प्राप्त होते हैं, दया से नहीं

डॉ. अम्बेडकर का स्पष्ट मत था कि इतिहास में किसी भी शोषित समुदाय को उसके अधिकार स्वेच्छा से नहीं दिए गए। अधिकार सदैव संघर्ष द्वारा प्राप्त किए गए हैं। उन्होंने दलितों को चेतावनी दी कि वे किसी भी प्रकार की दया या परोपकार पर निर्भर न रहें।

उनका विश्वास था कि दया मनुष्य को आश्रित बनाती है, जबकि अधिकार उसे सम्मान और स्वाभिमान प्रदान करते हैं। इसलिए उन्होंने दलित समाज से आत्मनिर्भर बनने, अपने अधिकारों के लिए संगठित होने और लोकतांत्रिक तरीकों से संघर्ष करने का आह्वान किया।

शिक्षा : मुक्ति का प्रथम साधन

अम्बेडकर ने शिक्षा को दलित मुक्ति का प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण साधन माना। उनका प्रसिद्ध कथन था कि “मनुष्य के जीवन का अंतिम लक्ष्य उसके मस्तिष्क का विकास होना चाहिए।”

उनके अनुसार शिक्षा— अज्ञान और अंधविश्वास को समाप्त करती है, आत्मसम्मान का विकास करती है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न करती है, राजनीतिक चेतना का निर्माण करती है तथा आर्थिक अवसरों का विस्तार करती है।

उन्होंने दलित समाज से आग्रह किया कि वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने बच्चों को शिक्षा दिलाएँ। शिक्षा ही वह शक्ति है जो शोषित समाज को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाती है और उसे संघर्ष के लिए तैयार करती है।

संघर्ष : अन्याय के विरुद्ध लोकतांत्रिक प्रतिरोध

अम्बेडकर के लिए संघर्ष का अर्थ हिंसा नहीं था। वे लोकतांत्रिक और संवैधानिक संघर्ष के समर्थक थे। उनके अनुसार अन्याय को चुपचाप सहना अन्याय को स्थायी बनाना है।

उन्होंने सत्याग्रह, जनसभाओं, आंदोलनों, याचिकाओं, विधिक कार्रवाई, सार्वजनिक विमर्श और राजनीतिक आंदोलनों को संघर्ष के वैध साधन माना।

उन्होंने कहा था,” खोए हुए अधिकार कभी भी हड़पने वालों की अंतरात्मा को अपील से वापस नहीं मिलते, बल्कि अथक संघर्ष से मिलते हो।“

महाड़ सत्याग्रह

1927 का महाड़ सत्याग्रह केवल सार्वजनिक जलस्रोत से पानी लेने का आंदोलन नहीं था। यह दलितों के नागरिक अधिकारों, मानवीय गरिमा और समानता का ऐतिहासिक संघर्ष था। इस आंदोलन ने पूरे देश को यह संदेश दिया कि दलित अब अपमानजनक सामाजिक व्यवस्था को स्वीकार नहीं करेंगे।

मनुस्मृति दहन

महाड़ आंदोलन के दौरान मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन केवल एक पुस्तक का विरोध नहीं था, बल्कि उस वैचारिक व्यवस्था का प्रतिरोध था जिसने जाति और अस्पृश्यता को धार्मिक वैधता प्रदान की थी।

कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन

नासिक का कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन भी सामाजिक समानता का प्रतीक था। यद्यपि बाद में अम्बेडकर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मंदिर प्रवेश मात्र से दलितों की वास्तविक मुक्ति नहीं होगी, फिर भी इस आंदोलन ने हिन्दू समाज की अंतर्विरोधपूर्ण संरचना को उजागर किया।

संगठन : संघर्ष की वास्तविक शक्ति

अम्बेडकर का विश्वास था कि शिक्षित व्यक्ति भी यदि अकेला है तो वह सामाजिक परिवर्तन नहीं ला सकता। इसलिए उन्होंने संगठन को संघर्ष की आधारशिला माना।

उन्होंने बहिष्कृत हितकारिणी सभा, इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी, शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन जैसी संस्थाओं की स्थापना की। उन्होंने अनेक समाचार-पत्रों का प्रकाशन भी किया ताकि दलित समाज में वैचारिक जागृति उत्पन्न हो सके।

उनके अनुसार संगठन— सामूहिक नेतृत्व विकसित करता है, राजनीतिक शक्ति का निर्माण करता है, समाज को आत्मविश्वास प्रदान करता है तथा लोकतांत्रिक संघर्ष को प्रभावी बनाता है।

राजनीतिक शक्ति का महत्व

अम्बेडकर का प्रसिद्ध कथन था कि “राजनीतिक शक्ति ही सामाजिक प्रगति की कुंजी है।”

वे मानते थे कि केवल सामाजिक सुधार पर्याप्त नहीं है। यदि दलितों के पास राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता में भागीदारी नहीं होगी तो उनके अधिकार सुरक्षित नहीं रह सकते।

इसी कारण उन्होंने पृथक निर्वाचिका की मांग की तथा बाद में आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संवैधानिक प्रावधानों के लिए संघर्ष किया। उनका उद्देश्य दलितों को निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी दिलाना था।

संवैधानिक संघर्ष की अवधारणा

स्वतंत्र भारत के संविधान-निर्माता के रूप में अम्बेडकर ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। परन्तु उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान तभी सफल होगा जब नागरिक उसके मूल्यों की रक्षा के लिए निरन्तर संघर्ष करेंगे।

उन्होंने संविधान सभा में चेतावनी दी थी कि यदि सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ बनी रहीं तो राजनीतिक लोकतंत्र भी संकट में पड़ जाएगा।

इसलिए उन्होंने संवैधानिक उपायों—जैसे न्यायालय, चुनाव, विधायिका, शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जनमत और जनसंगठन—को लोकतांत्रिक संघर्ष के प्रमुख साधन माना।

आर्थिक न्याय के बिना मुक्ति अधूरी

अम्बेडकर ने स्पष्ट किया कि सामाजिक समानता आर्थिक समानता के बिना संभव नहीं है। भूमि-विहीनता, बेरोजगारी, श्रमिक शोषण, संसाधनों पर असमान अधिकार तथा गरीबी दलितों की दासता को और गहरा करते हैं।

इसीलिए उन्होंने— भूमि सुधार, श्रमिक अधिकार, जीविकोपार्जन योग्य मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, राज्य के कल्याणकारी हस्तक्षेप तथा  सार्वजनिक क्षेत्र के विकास का समर्थन किया। उनके अनुसार आर्थिक आत्मनिर्भरता सामाजिक सम्मान की आधारशिला है।

धर्म और संघर्ष

अम्बेडकर ने अंततः निष्कर्ष निकाला कि जाति-व्यवस्था को धार्मिक आधार प्राप्त है। इसलिए उन्होंने घोषणा की कि वे हिन्दू धर्म में जन्म ले सकते हैं, किन्तु हिन्दू धर्म में मरेंगे नहीं।

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उनका बौद्ध धर्म ग्रहण करना केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि सामाजिक क्रान्ति का उद्घोष था। उन्होंने नवयान बौद्ध धर्म के माध्यम से समानता, करुणा, तर्कशीलता और मानव गरिमा पर आधारित जीवन-दर्शन प्रस्तुत किया।

महिलाओं की भूमिका

डॉ. अम्बेडकर ने दलित मुक्ति के संघर्ष में महिलाओं की भागीदारी को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, संपत्ति के अधिकार, समान नागरिक अधिकार और सामाजिक सम्मान के लिए संघर्ष किया। उनके अनुसार कोई भी सामाजिक क्रान्ति महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना सफल नहीं हो सकती।

समकालीन प्रासंगिकता

यद्यपि भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी दी है, फिर भी जातिगत भेदभाव, अत्याचार, सामाजिक बहिष्कार, भूमिहीनता, शिक्षा और रोजगार में असमानता जैसी समस्याएँ आज भी बनी हुई हैं।

ऐसी परिस्थितियों में अम्बेडकर का संघर्ष-दर्शन पहले से अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उनका संदेश है कि लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है; लोकतंत्र तभी जीवित रहेगा जब नागरिक अन्याय के विरुद्ध संगठित होकर संवैधानिक और शांतिपूर्ण संघर्ष करेंगे।

आज दलित आंदोलन, महिला आंदोलन, श्रमिक आंदोलन, आदिवासी आंदोलन तथा मानवाधिकार आंदोलन—सभी अम्बेडकर की इसी विरासत से प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

उपसंहार

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने दलितों की मुक्ति के लिए संघर्ष को अपरिहार्य माना। उनके अनुसार कोई भी समाज दया, परोपकार या नैतिक उपदेशों से नहीं बदलता; वास्तविक परिवर्तन तब आता है जब शोषित समुदाय स्वयं शिक्षित होता है, संगठित होता है और लोकतांत्रिक तथा संवैधानिक तरीकों से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करता है।

उनका जीवन स्वयं इस सत्य का प्रमाण है। महाड़ सत्याग्रह से लेकर संविधान-निर्माण तक और बौद्ध धर्म ग्रहण करने तक उनका प्रत्येक कदम सामाजिक न्याय की एक व्यापक परियोजना का हिस्सा था। उन्होंने दलित समाज को आत्मसम्मान, संगठन और राजनीतिक शक्ति का मार्ग दिखाया।

आज भी उनका संदेश—”शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित हो “—केवल दलित समाज के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए लोकतंत्र, समानता और मानव गरिमा की रक्षा का शाश्वत मंत्र है। जब तक समाज में जातिगत भेदभाव, सामाजिक अन्याय और असमानता विद्यमान हैं, तब तक डॉ. अम्बेडकर का संघर्ष-दर्शन भारत के सामाजिक परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली मार्गदर्शक बना रहेगा।

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