कॉर्पोरेट जगत में इन दिों एक नया पद चुपचाप अपनी जगह बना रहा है- चीफ पर्पस ऑफिसर (CPO). यह नाम शायद थोड़ा अजीब लगे, लेकिन दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां इसे सीरियस ले रही हैं. यूबीसॉफ्ट, वर्जिन अटलांटिक, सिस्को, सेफोरा और KPMG जैसी कंपनियां पहले ही इस तरह की पोजीशन बना चुकी हैं. यह पद है क्या, क्या वाकई कंपनियों को इसकी जरूरत है और आप कैसे बनेंगे CPO .
यह ‘चीफ पर्पस ऑफिसर’ है क्या?
बहुत सी कंपनियां बड़े-बड़े नारे लगाती हैं- ‘हम दुनिया बदलेंगे’, ‘हमारा मकसद सिर्फ पैसा कमाना नहीं है’ या ‘हम समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं’. लेकिन असल जिंदगी में इन नारों का क्या होता है? एम्प्लॉयज को ये सारी बातें अक्सर बहुत ऊपरी और झूठी लगती हैं. दफ्तर में रोजाना का काम तो वैसे ही चलता है- टारगेट, प्रॉफिट और क्वार्टरली रिजल्ट्स.
यहीं पर चीफ पर्पस ऑफिसर काम आता है. इस पद का काम थ्योरी में बहुत आसान है, लेकिन प्रैक्टिस में बेहद मुश्किल. CPO कंपनी के बड़े-बड़े वादे और उसके असली फैसलों को एक-दूसरे से बराबर रखने का काम करता है. वह यह देखता है कि कंपनी सिर्फ मुनाफा कमाने के चक्कर में अपने बताए गए मकसद को तो नहीं भूल रही।
लीडरशिप मीटिंग्स में मुश्किल सवाल पूछना: जब बड़े बॉस बैठकर कोई फैसला ले रहे हों, तो CPO वहां खड़ा होकर पूछता है, ‘क्या यह फैसला वाकई हमारे लंबे समय के मकसद से मेल खाता है, क्या हम मुनाफे के चक्कर में अपने वैल्यूज को तोड़ तो नहीं रहे या क्या हम समाज के लिए वाकई कोई वैल्यू क्रिएट कर रहे हैं।
जॉइनिंग और रिवॉर्ड्स पैटर्न बदलना: कुछ CPO हायरिंग और सैलरी-बोनस के सिस्टम को इस तरह बदलते हैं कि कर्मचारियों को सिर्फ टारगेट पूरा करने पर ही नहीं, बल्कि कंपनी के मकसद के मुताबिक काम करने पर भी इनाम मिले।
नारों को हकीकत में बदलना: कंपनी बड़े-बड़े भाषण देती है कि वह समाज के लिए कुछ करना चाहती है, लेकिन CPO यह देखता है कि ये बातें दफ्तर के रोजाना के काम का हिस्सा बनें या नहीं। आखिर कंपनियों को CPO की जरूरत क्यों पड़ी?
पुराने जमाने में कंपनियों का सबसे बड़ा ध्यान शेयरहोल्डर्स को खुश करने पर होता था, लेकिन अब दुनिया बदल गई है. AI, इकोनॉमिक चेंजेस और लगातार बदलते सिनेरियो के इस दौर में लोग कंपनियों से सिर्फ मुनाफा नहीं, बल्कि कुछ और भी उम्मीद करने लगे हैं। 2019 में अमेरिका की बिजनेस राउंडटेबल ने एक बड़ा बयान दिया कि कंपनियों का मकसद सिर्फ शेयरहोल्डर्स के लिए नहीं, बल्कि सभी स्टेकहोल्डर्स के लिए होना चाहिए. इसके बाद से कंपनियों पर ‘पर्पस’ यानी मकसद की बात करने का दबाव बढ़ गया।
भारत में कैसा है CPO का हाल?
भारत में CPO की कहानी काफी दिलचस्प है. अक्टूबर 2017 में रोश फार्मा इंडिया ने लारा युमी त्सुजी बेजेरा को भारत की पहली चीफ पर्पस ऑफिसर नियुक्त किया. यह पहली बार था जब भारत में किसी कंपनी ने यह पद बनाया. कंपनी की बड़ी समस्या थी अलग-अलग विभागों में बंटे मैनेजमेंट प्रोसेस. हर विभाग सिर्फ अपने KPI की परवाह करता था, किसी और की नहीं. लारा को जब कंपनी में लाया गया, तो उन्होंने सबसे पहले पूछा, ‘मुझे पहला काम क्या करना चाहिए?’ जवाब मिला- ‘एक नया शेयर्ड एस्पिरेशन बनाओ।
CPO बनने के लिए क्या पढ़ाई और एक्सपीरियंस चाहिए?
किसी भी सब्जेक्ट में ग्रेजुएशन होना जरूरी है. लेकिन बिजनेस, मैनेजमेंट, सोशल साइंसेज, पब्लिक पॉलिसी या सस्टेनेबिलिटी जैसे सब्जेक्ट्स ज्यादा काम आते हैं।
मास्टर्स डिग्री MBA, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, सस्टेनेबिलिटी या सोशल इनोवेशन में मास्टर्स को प्रायोरिटी दी जाती है।
कम से कम 5 साल का लीडरशिप अनुभव जरूरी है. चाहे वह नॉन-प्रॉफिट हो, फॉर-प्रॉफिट हो, सरकारी हो या फिलैंथ्रॉपी ग्रोथ, बिजनेस डेवलपमेंट,
स्ट्रैटेजिक प्लानिंग या फंडरेजिंग में एक्सपीरियंस जरूरी है। CPO की नौकरी सीधे ऑनलाइन पोस्ट नहीं होती है, इसलिए इसे पाने का रास्ता थोड़ा अलग है।
एग्जीक्यूटिव सर्च फर्म्स (हेडहंटर्स): बड़ी कंपनियां CPO ढूंढने के लिए खास हेडहंटिंग एजेंसियों को लगाती हैं.
लिंक्डइन पर नेटवर्किंग: टॉप लीडरशिप पोजीशंस के लिए लिंक्डइन सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है.
कंपनी के अंदर से प्रमोशन: जैसे रोश इंडिया में लारा पहले मैनेजिंग डायरेक्टर थीं, फिर उन्हें CPO बनाया गया।
CEO और बोर्ड की मंजूरी: CPO को सीधे CEO को रिपोर्ट करना चाहिए और स्ट्रैटेजिक मीटिंग्स में शामिल होना चाहिए, तभी वह असल में कुछ कर सकता है.
CPO को कितनी सैलरी मिलती है?
अमेरिका की वेबसाइट जिपरिक्रूटर के मुताबिक, जून 2026 तक अमेरिका में एक चीफ पर्पस ऑफिसर की औसत सालाना सैलरी 166,511 डॉलर (करीब 1.4 करोड़ रुपये) है. हालांकि, यह आंकड़ा कंपनी और एक्सपीरियंस के हिसाब से ऊपर-नीचे हो सकता है.
वैसे, CPO एक काफी नया पद है, इसलिए इसकी सैलरी को लेकर अभी बहुत ज्यादा डेटा उपलब्ध नहीं है. लेकिन C-सुइट (CEO, CFO, COO जैसे टॉप पदों) में यह एक अहम जगह है, इसलिए सैलरी भी उसी हिसाब से मिलती है.







