कोरोना के साथ ही लड़ना होगा जैविक हथियारों की होड़ से भी !

चरण सिंह राजपूत

दुनिया कोरोना के नये नए वैरिएंट का सामना करने को मजबूर है पर अभी तक कोरोना वायरस की उत्पत्ति के बारे में कोई ठोस जानकारी लोगों तक नहीं पहुंच पाई है। अमेरिका ने यह तो बोला है कि कोरोना वायरस चीन की लैब से आया है पर प्रमाणित वह भी नहीं कर पाया है। यह तो लगभग साफ़ हो चूका है कि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि एक जैविक हथियार है। अमेरिका के साथ ही रूस ने भी गत दिनों एक तरह से इसके जैविक हथियार होने पर अपनी मुहर लगा दी थी।

जब दुनिया को इस त्रासदी से सबक लेते हुए कोरोना से निपटने के साथ ही दूसरे जैविक हथियारों के खतरों के हल निकालने के प्रयास में लगना चाहिए था, ऐसे में ये देश जैविक हथियारों के प्रदर्शन में लग गये हैं। वैसे भी दुनिया में प्रकृति से खिलवाड़ की अब पराकाष्ठा हो गई है। अब समय आ गया है कि कोरोना की इस लड़ाई के बीच में प्रकृति को बचाने के साथ ही जैविक हथियारों को निष्क्रिय करने की ओर कदम बढ़ाना ही होगा। अब समय विनाशक की ओर जाने का नहीं बल्कि मावनता की ओर लौटन के समय है।

कोरोना की इस लड़ाई के बीच में ही चीन के साथ ही उत्तर कोरिया, अमेरिका और रूस ने भी जैविक हथियारों की होड़ को और बढ़ावा दिया है। निश्चित रूप से आज की तारीख में चीन को सबक सिखाने की जरूरत है पर उसी की तरह जैविक हथियारों के बल पर नहीं बल्कि सामाजिक बहिष्कार करके। आज कोरोना कहर का जिम्मेदार ठहराकर दुनिया के सभी देश चीन निर्मित सामानों का बहिष्कार करें। इस ओर भारत को ज्यादा मजबूती से काम करना होगा, क्योंकि भारत का तो अधिकतर बाजार ही चीन पर निर्भर हो गया है।

भले ही कारोना कहर ने तीसरे विश्व युद्ध की भूमिका बना दी हो पर आज की तारीख में जरूरत दुनिया के तानाशाहों को उनकी भूल का एहसास कराने की है। ऐसा नहीं है कि इस माहौल के लिए बस चीन ही जिम्मेदार है। चाहे चीन का शासक शी जिनपिंग हो, अमेरिका का शासक  जो बाइडन हो, रूस का शासक ब्लादिमीर पुतिन हो या फिर उत्तर कोरिया का किम जोंग ये सभी अपनी महत्वाकांशक्षा के चलते मानवता के दुश्मन बनकर रह गये हैं। आज की तारीख में हमारा देश भी इन्हीं तानशाहों के पदचिह्नों पर चल पड़ा है। कोरोना के कहर के बीच में जनमानस को यह समझ लेना चाहिए कि आज की तारीख में जितनी भी इन तानाशाहों की मनमानी बढ़ेगी उतना ही मानवता को खतरा है।

आज जरूरत इस बात की है कि दुनिया को भ्रमित कर रहे इन तानाशाहों को शांति के रास्ते पर कैसे लाया जाए ? कैसे दुनिया में ये जो जैविक हथियारों की होड़ मची हुई है, यह बंद हो। जो शासक कोरोना का ही जैविक हथियार मानकर अपनी कर्त्तव्य की इतिश्री कर ले रहे हैं, उन्हें उनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही का एहसास कैसे कराया जाए ? ऐसे में प्रश्न उठता है कि दुनिया में ये जो परमाणु हथियार हंै, क्या ये जैविक हथियार नहीं हैं? क्या भविष्य में इनका साइड इफेक्ट नहीं हो सकता है ? या फिर कोई देश इनका इस्तेमाल नहीं कर सकता है ?

इस आपाधापी के दौर में लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि हमें कितनी भी आतंकवाद की परिभाषा समझाई जा रही हो पर लंबे समय से चली आ रही हथियारों की होड़ ने भी एक तरह के आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। इन हथियारों का प्रदर्शन दुनिया को भयभीत करने के लिए ही तो किया जाता है। यदि अब युद्ध स्तर पर इन हथियारों को निष्क्रिय करने का अभियान न चला तो कोरोना जैसी महामारी झेलना लोगों की नियति बन जाएगा। कुछ लोग जो अथाह संपत्ति के साथ ही तमाम संसाधन जोड़कर इतरा रहे हैं, ये सब धरे के धरे रह जाएंगे। आने वाली पीढ़ी अपंग बनकर रह जाएगी। अभी तो बड़ी चुनौती कोरोना के साइड इफेक्ट से निपटना ही है।

लगभग सभी देश कोरोना की इस लड़ाई में इस बात पर तो ध्यान दे रहे हैं कि किसी तरह से इस वायरस पर काबू पाकर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जाए पर इस पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है कि ऐसा क्या किया जाए कि भविष्य में कोरोना जैसे वायरस का कहर लोगों को न झेलना पड़े। एक बार यह बात मान भी ली जाए कि इस व्यवस्था में हम कोरोना से जीत भी गये तो इसकी क्या गारंटी है कि फिर से यह वायरस लोगों को अपनी चपेट में नहीं लेगा या फिर दूसरे जैविक हथियार इस महामारी की तरह दूसरी महामारी नहीं फैलाएंगे ? मतलब यदि इस ओर ध्यान न दिया गया तो ये जितने भी हमारे प्रयास अर्थव्यवस्था को सुधारने के हो रहे हैं सब धरे के धरे रह जाएंगे। इस समव सबसे ज्यादा जरूरत मानवता को बचाने की है। मानवता तब बचेगी जब दुनिया हथियारों की होड़ का रास्ता छोड़ शांति का रास्ता अपनाए। हिटलर, स्टालिन के पदचिह्नों न चलकर महात्मा बुद्ध, महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और डॉ. राम मनोहर लोहिया का रास्ता अपनाए।

ये जितना भी हम प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे हैं, सब मानवता के विरुद्ध ही तो है। चाहे वनों का काटना हो, पहाड़ों पर खनन हो या फिर खेत-खलिहान का कबाड़ा, ये सब प्रकृति का तहस-नहस ही हो रहा है। प्रकृति लोगों को आपस में जोड़ती है और ये आपाधापी लोगों को लोगों से अलग कर रही है। अब कोरोना के कहर परही आ जाइये। इस महामारी ने आदमी को आदमी से दूर कर दिया है। इस आपाधापी में हम कहां पहुंच गये हैं, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां दुनिया में लोगों के एक-दूसरे से मिलने-जुलने की अपील की जाती थी वहीं इस महामारी में लोगों के एक-दूसरे से अलग होने के लिए कहा जा रहा है।

जैविक हथियारों का भय ऐसा होता है कि लोग अपनों से ही दूर भाग रहे हैं। अब दुनिया को यह समझना होगा कि अपनों से दूर भागना है या फिर अपनों को गले लगाना है। यदि इसी आपाधापी और जैविक हथियारों की होड़ में उलझे रहे तो आदमी आदमी से दूर होता चला जाएगा। भावनात्मक रिश्तों की तो बात ही छोड़ दीजिए। जिस मनुष्य को भगवान ने सबसे अधिक दिमाग दिया है वही सब कुछ निगल जा रहा है। पश, पक्षी तो छोड़ दीजिए आदमी, आदमी को ही खा जा रहा है। ऐसे में तो यदि जैविक हथियारों को एक तरह से कंट्रोल कर भी लिया तो प्रकृति अपना रोद्र रूप दिखाएगी। वैसे भी विभिन्न आपदाओं और मौसम के अनिश्चितता से गुजरने के रूप में प्रकृति ने जनमानस को अपने आक्रमण का संदेश देना भी शुरू कर दिया है।

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