बदलाव में रोड़ा बन रहा विपक्ष का कमजोर होना और मीडिया का सत्ता प्रवक्ता बनना!

हर मोर्चे पर विफल साबित हो रही मोदी सरकार

चरण सिंह 

आज जिस नाजुक मोड़ से देश गुजर रहा है ऐसे में समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया के दो नारे याद आ रहे हैं। लोहिया ने कहा था कि जब सड़कें सुनसान हो जाती हैं तो संसद आवारा हो जाती है। जिंदा कौमे पांच साल तक इन्तजार नहीं करती। आज की तारीख में सड़कें सुनसान हैं तो संसद आवारा हो चुकी है। लोगों में देश और समाज के लिए लड़ने का जज्बा कम देखा जा रहा है और विपक्ष कमजोर साबित हो रहा है। जब देशभर में विपक्ष के दलों को सड़कों पर उतर जाना चाहिए था तब अधिकतर नेता पोस्ट और बयानबाजी तक सिमटे हुए हैं। दरअसल किस भी बदलाव में मीडिया और विपक्ष मुख्य भूमिका निभाता है पर मोदी सरकार के सामने विपक्ष और मीडिया दोनों ही अपने कर्तव्य से भटके नजर आ रहे हैं। कांग्रेस तो कुछ मोर्चे पर लड़ती हुई दिखाई दे रही है पर क्षेत्रीय दल तो जातीय आंकड़ों में ही उलझे हुए हैं। जमीनी हकीकत यह है कि मोदी सरकार देश और विदेश दोनों जगह विफल साबित हुई है। देश में तो लोगों को न तो शुद्ध हवा उपलब्ध करा पा रही और न ही शुद्ध पानी। न ही महंगाई पर अंकुश लगा पा रही है और न ही बेरोजगारी कम कर पा रही है। किसानों और मजदूरों को बर्बाद करने के लिए अमेरिका से ट्रेड डील में भारत का कृषि बाजार अलग से खोल दिया गया।

इजरायल अमेरिका के चक्कर में रूस और ईरान दोनों दोस्तों को नाराज कर दिया है। युद्ध नहीं बुद्ध की बात करने वाले देश को मोदी ने एक  तरह से इजरायल के साथ खड़ा कर दिया है।  भारत के सामने भी एलपीजी की भारी किल्लत पैदा करा दी है। रूस से तेल खरीदने के लिए अमेरिका से अनुमति लेनी पड़ रही है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद जब पाकिस्तान के आतंकी शिविरों पर हमला किया तो अमेरिका के दबाव में सीज फायर करा दिया था। जबकि उस समय पीओके को लेने के लिए वह अच्छा अवसर हमारे पास था। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह उठता है कि यदि इतनी समस्याएं हैं तो फिर देश में बदलाव क्यों नहीं हो रहा है ?
दरअसल बदलाव में मीडिया और विपक्ष दोनों ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं पर मौजूदा देश में विपक्ष कमजोर साबित हो रहा है तो मीडिया सरकार की खामियां गिनाने के बजाय सरकार के लिए काम कर रहा है। ऐसे में यदि विपक्ष खुलकर सड़कों पर नहीं आता है तो यह माना जाए कि वह बिल्ली के भाग से छींका टूटने का इन्तजार कर रहा है। ऐसे में मीडिया यदि सत्ता के लिए काम करना नहीं छोड़ता है तो फिर सत्ता के लिए काम करने वाले मीडिया के खिलाफ भी मोर्चा खोला जाए। अब देश को बचाने के लिए हर किसी को सड़कों पर उतरना पड़ेगा नहीं तो एक एक कर हर किसी के लिए खतरा पैदा होने वाला है।
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