शिक्षा और सामाजिक न्याय की क्रांतिकारी प्रतीक सावित्रीबाई फुले

नीरज कुमार

भारतीय समाज के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने अपने साहस, विचार और कर्म से समय की धारा को मोड़ दिया। सावित्रीबाई फुले ऐसा ही एक नाम है। 10 मार्च उनकी पुण्यतिथि का दिन है—एक ऐसा अवसर जब हम उस स्त्री को याद करते हैं जिसने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का हथियार बनाया और अपने संघर्ष से भारतीय समाज में समानता की नई नींव रखी।
उन्नीसवीं सदी का भारत गहरे सामाजिक भेदभाव, जातिगत असमानता और स्त्री-विरोधी परंपराओं से जकड़ा हुआ था। महिलाओं की शिक्षा को पाप समझा जाता था और दलित तथा पिछड़े वर्गों को ज्ञान से दूर रखने की कोशिश की जाती थी। ऐसे कठिन समय में सावित्रीबाई ने न केवल पढ़ने का साहस किया बल्कि समाज के वंचित वर्गों को पढ़ाने का संकल्प भी लिया।
सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के नायगांव में हुआ था। बाल विवाह की परंपरा के अनुसार मात्र 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह महान समाज सुधारक ज्योतिबा फुले से हुआ। विवाह के बाद ज्योतिराव ने सावित्रीबाई की सीखने की जिज्ञासा को पहचाना और स्वयं उन्हें पढ़ाना शुरू किया। बाद में सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे में शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया और एक शिक्षिका के रूप में अपने जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय शुरू किया।

साल 1848 भारतीय शिक्षा इतिहास में एक ऐतिहासिक वर्ष था। इसी वर्ष ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले ने पुणे में लड़कियों के लिए पहला आधुनिक स्कूल शुरू किया। यह कदम उस दौर में एक सामाजिक क्रांति से कम नहीं था।
सावित्रीबाई जब पढ़ाने के लिए घर से निकलती थीं, तब समाज के कट्टरपंथी लोग उन्हें रोकने की कोशिश करते। उनके ऊपर पत्थर और गोबर फेंके जाते, अपमानित किया जाता और उन्हें डराने की कोशिश की जाती। लेकिन उन्होंने इन सबका साहस के साथ सामना किया। कहा जाता है कि वे अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं ताकि रास्ते में गंदगी फेंके जाने के बाद स्कूल पहुंचकर साड़ी बदल सकें और बच्चों को पढ़ा सकें।
यह संघर्ष केवल एक महिला का व्यक्तिगत साहस नहीं था, बल्कि जाति व्यवस्था और पितृसत्ता दोनों के खिलाफ एक ऐतिहासिक चुनौती थी। सावित्रीबाई फुले का कार्य केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों के खिलाफ भी निरंतर संघर्ष किया।
उन्होंने विधवा विवाह को बढ़ावा दिया और विधवाओं के लिए आश्रय स्थल बनाए। उस समय समाज में विधवाओं के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। कई बार सामाजिक दबाव के कारण अवांछित बच्चों की हत्या तक की घटनाएं होती थीं। इस अमानवीय स्थिति को रोकने के लिए सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने अनाथ बच्चों के लिए आश्रय गृह भी स्थापित किए।

सावित्रीबाई फुले केवल एक शिक्षिका या समाज सुधारक ही नहीं थीं, बल्कि वे गहरी मानवीय संवेदना से भरी हुई व्यक्तित्व थीं।
1876 और 1879 के भयंकर अकाल के समय उन्होंने गांव-देहात में सहायता शिविर चलाए और भूख से पीड़ित लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की।
1897 में जब प्लेग की महामारी फैली, तब भी उन्होंने अपनी सेवा जारी रखी। वे मरीजों को अस्पताल पहुंचाने और उनकी देखभाल करने में लगी रहीं। इसी दौरान एक संक्रमित बच्चे को अपने कंधे पर उठाकर अस्पताल ले जाते समय वे स्वयं प्लेग से संक्रमित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु भी मानव सेवा के लिए समर्पित जीवन का अंतिम अध्याय बन गई।

सावित्रीबाई फुले के लिए शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी। उनके शिक्षा दर्शन के केंद्र में समाज सुधार का विचार था। वे मानती थीं कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को तार्किक सोच दे, सामाजिक परिस्थितियों का विश्लेषण करना सिखाए और अन्याय के स्रोतों को पहचानकर बदलाव की राह खोजने की क्षमता पैदा करे। उन्होंने आर्थिक स्वतंत्रता के लिए व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया और मानसिक स्वतंत्रता के लिए ऐसी शिक्षा की वकालत की जो मनुष्य को स्वतंत्र और विवेकशील बनाए। साथ ही वे पुरुष और महिला के बीच बराबरी के संबंधों की समर्थक थीं।

आज जब हम शिक्षा के विस्तार, महिला अधिकार और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, तब सावित्रीबाई फुले का संघर्ष और विचार और भी प्रासंगिक लगते हैं। उन्होंने अपने जीवन से यह साबित किया कि शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह समाज को बदलने की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है। सावित्रीबाई फुले ने जीवन के अंतिम क्षण तक सहानुभूति, न्याय और प्रेम को नहीं छोड़ा। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि एक बेहतर समाज की कल्पना केवल विचारों से नहीं, बल्कि साहस और निरंतर संघर्ष से साकार होती है।

 

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