बांग्लादेश की सियासत एक बार फिर नए मोड़ पर है. नई सरकार शपथ लेने जा रही है। कल यानि 17 फरवरी को तारिक रहमान सरकार का गठन होने जा रहा है, लेकिन इसी बीच एक पुराना सवाल फिर चर्चा में है कि आखिर 1971 में आजादी के बाद से वहां हिंदुओं की आबादी बढ़ी या घटी? आधी सदी से ज्यादा का आंकड़ा क्या कहता है? क्या यह सिर्फ प्रतिशत का खेल है या इसके पीछे बड़े सामाजिक और राजनीतिक कारण छिपे हैं? आइए 50 साल का पूरा गणित सरल भाषा में समझते हैं।
आजादी के समय क्या थी स्थिति?
1971 में जब बांग्लादेश बना, उस समय वहां हिंदुओं की आबादी कुल जनसंख्या का करीब 20 से 22 प्रतिशत मानी जाती है। संख्या के लिहाज से यह लगभग 1 करोड़ से 1.5 करोड़ के बीच थी। आजादी के बाद 1974 में पहली जनगणना हुई। उस समय हिंदुओं की हिस्सेदारी 13.5 प्रतिशत दर्ज की गई थी। यानी कुछ ही वर्षों में प्रतिशत में गिरावट दिखने लगी थी।
50 साल का जनगणना रिकॉर्ड क्या कहता है?
आधिकारिक जनगणना के आंकड़े एक स्पष्ट ट्रेंड दिखाते हैं। 1981 में हिंदू आबादी 12.1 प्रतिशत रही। 1991 में यह घटकर 10.5 प्रतिशत हो गई। 2001 में 9.3 प्रतिशत और 2011 में 8.5 प्रतिशत दर्ज की गई। 2022 की जनगणना के मुताबिक बांग्लादेश की कुल आबादी करीब 17 करोड़ थी। इसमें हिंदुओं की संख्या लगभग 1 करोड़ 30 लाख के आसपास बताई गई, जो कुल आबादी का करीब 7.5 से 8 प्रतिशत बैठती है। अगर 1971 के 22 प्रतिशत के आंकड़े से तुलना करें, तो हिस्सेदारी में करीब 14 प्रतिशत की गिरावट साफ दिखती है।
क्या संख्या घटी या सिर्फ प्रतिशत?
यहां एक अहम बात समझना जरूरी है कि प्रतिशत कम हुआ है, लेकिन कुल संख्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. 1971 के बाद कुल आबादी तेजी से बढ़ी है। मुस्लिम आबादी का प्रतिशत 1974 में 85.4 था, जो 2011 में 91.5 प्रतिशत तक पहुंच गया। अगर वैश्विक औसत जनसंख्या वृद्धि दर 1.1 प्रतिशत के हिसाब से 1971 से 2025 तक हिंदू आबादी बढ़ती, तो अनुमान है कि संख्या 2.17 करोड़ तक हो सकती थी, लेकिन वास्तविक संख्या करीब 1.3 से 1.5 करोड़ के बीच मानी जाती है। यानी वृद्धि की रफ्तार अन्य समुदायों की तुलना में काफी धीमी रही।
पलायन बना बड़ा कारण
रिपोर्ट्स बताती हैं कि माइग्रेशन इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण है। 1947 के विभाजन के बाद से ही हिंदुओं का पलायन जारी रहा। 1964 से 2001 के बीच अनुमानित 8.1 मिलियन हिंदू भारत आए। Pew Research Center की रिपोर्ट की मानें तो बांग्लादेश में जन्मे लगभग 16 लाख हिंदू आज भारत में रह रहे हैं. इनमें कई वे लोग हैं जो विभाजन या बाद की परिस्थितियों में भारत आए। सीमा से लगे राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और असम में पारिवारिक रिश्ते और सांस्कृतिक समानता भी पलायन को आसान बनाते हैं।
सामाजिक और राजनीतिक असुरक्षा
1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना ने हिंदुओं को खास तौर पर निशाना बनाया था. आजादी के बाद भी अलग-अलग समय पर हिंसा की घटनाएं सामने आती रही हैं। 1990 के दंगे, 2001 के चुनाव के बाद हिंसा और हाल के राजनीतिक तनाव के दौर में मंदिरों और घरों पर हमलों की खबरें आईं। ऐसे हालात में असुरक्षा की भावना पलायन को बढ़ावा देती है।
जन्मदर और जनसांख्यिकीय बदलाव
2014 के आंकड़ों के अनुसार हिंदुओं की प्रजनन दर लगभग 2.1 थी, जबकि मुस्लिम समुदाय में यह 2.3 थी। यह अंतर छोटा दिखता है, लेकिन लंबे समय में आबादी के अनुपात पर असर डालता है। 1989 से 2016 के बीच की एक स्टडी में भी पाया गया कि हिंदुओं की आबादी की वृद्धि दर अन्य समुदायों से कम रही।
आज की तस्वीर क्या कहती है?
2025 के अनुमान के मुताबिक हिंदुओं की आबादी 1.3 से 1.5 करोड़ के बीच हो सकती है, जो कुल आबादी का लगभग 8 प्रतिशत है। यानी 50 से ज्यादा साल में प्रतिशत के लिहाज से हिस्सेदारी घटी है, लेकिन संख्या पूरी तरह कम नहीं हुई है। यह बदलाव जन्म दर, पलायन और सामाजिक परिस्थितियों के संयुक्त असर का नतीजा है।







