
ऊषा शुक्ला
आज का युग अधिकारों का युग कहा जाता है। हर मंच, हर बहस, हर आंदोलन में “मेरा अधिकार”, “हमारा हक़” जैसे शब्द पूरे आत्मविश्वास के साथ गूंजते हैं। संविधान से लेकर सोशल मीडिया तक, घर से लेकर अदालत तक—अधिकारों की भाषा सबसे प्रबल बन चुकी है। लेकिन इसी शोर में एक शब्द धीरे-धीरे हाशिये पर चला गया है—*कर्तव्य*।
प्रश्न यह नहीं है कि अधिकार जानना गलत है। प्रश्न यह है कि *क्या अधिकार कर्तव्यों से अलग होकर टिक सकते हैं?* क्या केवल अधिकारों की मांग से कोई समाज सशक्त, संतुलित और सभ्य बन सकता है? यही मूल प्रश्न है—“हम अधिकार जानते हैं, कर्तव्य क्यों भूल जाते हैं?” अधिकार और कर्तव्य: एक ही सिक्के के दो पहलू*अधिकार और कर्तव्य को अलग-अलग देखने की प्रवृत्ति ही आज की सबसे बड़ी सामाजिक भूल है। वास्तव में ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जहाँ *अधिकार हमें लेने की शक्ति देते हैं,* वहीं कर्तव्य हमें देने की जिम्मेदारी सिखाते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने अधिकारों की बात करता है, तो उसी क्षण उससे जुड़े कर्तव्यों की बात भी स्वतः जुड़ जाती है। उदाहरण के लिए—बोलने का अधिकार है, तो सुनने और मर्यादा बनाए रखने का कर्तव्य भी है। शिक्षा का अधिकार है, तो पढ़ने, सीखने और समाज के प्रति जिम्मेदार बनने का कर्तव्य भी है।मतदान का अधिकार है, तो सोच-समझकर, निष्पक्ष होकर मतदान करने का कर्तव्य भी है। जब हम अधिकार को अलग और कर्तव्य को अलग खांचे में डाल देते हैं, वहीं से असंतुलन शुरू होता है। अधिकारों का बढ़ता शोर, कर्तव्यों की घटती आवाज़**आज समाज में अधिकारों की बातें इतनी प्रबल हैं कि कर्तव्यों की आवाज़ दबती जा रही है।हर वर्ग अपने अधिकारों के लिए मुखर है -कर्मचारी अपने अधिकारों की बात करता है विद्यार्थी अपने अधिकारों की, नागरिक अपने अधिकारों की, पति-पत्नी, माता-पिता, बच्चे—हर कोई अपने-अपने अधिकारों को लेकर सजग है।
लेकिन जब बात कर्तव्य निभाने की आती है, तो वही लोग अक्सर चुप हो जाते हैं।क्यों?
क्योंकि अधिकार *तत्काल लाभ* देते हैं, जबकि कर्तव्य *दीर्घकालिक अनुशासन* मांगते हैं।
अधिकार लेने में सुख है, कर्तव्य निभाने में संयम चाहिए। सुविधा की संस्कृति और कर्तव्य से दूरी**
आधुनिक जीवन शैली ने हमें सुविधा-प्रधान बना दिया है। हम वह करना चाहते हैं जिसमें कम प्रयास ह कम त्याग हो, और अधिक सुविधा मिले।
कर्तव्य अक्सर असुविधाजनक होते हैं। वे हमें रोकते हैं, टोकते हैं, सीमाएँ तय करते हैं। इसलिए हम अनजाने में कर्तव्यों से दूरी बनाने लगते हैं। उदाहरण के तौर पर—स्वच्छ वातावरण का अधिकार तो चाहिए, लेकिन कचरा खुद न फैलाने का कर्तव्य भूल जाते हैं। सम्मान चाहिए, लेकिन दूसरों का सम्मान करने में चूक जाते हैं। न्याय चाहते हैं, लेकिन स्वयं ईमानदार रहने में समझौता कर लेते हैं। शिक्षा में अधिकार, संस्कार में कर्तव्य** आज की शिक्षा प्रणाली अधिकारों की जानकारी तो देती है, लेकिन कर्तव्यों की भावना उतनी गहराई से नहीं सिखा पाती।
बच्चों को बताया जाता है— तुम्हारे अधिकार क्या हैं,”
लेकिन कम ही बताया जाता है— तुम्हारी जिम्मेदारियाँ क्या हैं।” परिणामस्वरूप एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जो सवाल करना जानती है, लेकिन उत्तरदायित्व निभाने से कतराती है। जो मांग करना जानती है, लेकिन योगदान देना भूल जाती है।
संस्कारों का अर्थ केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि *कर्तव्य-बोध* भी है— माता-पिता के प्रति,
गुरु के प्रति, समाज और राष्ट्र के प्रति।
जब शिक्षा और संस्कार के बीच यह संतुलन टूटता है, तब अधिकार एक हथियार बन जाते हैं और कर्तव्य बोझ। परिवार से शुरू होती है कर्तव्यहीनता*
परिवार समाज की पहली पाठशाला है।
यहीं बच्चा सीखता है— कैसे बोलना है, कैसे व्यवहार करना है, और कैसे जिम्मेदारी उठानी है।
लेकिन जब परिवार में ही हर सदस्य अपने अधिकारों पर केंद्रित हो जाए— बच्चे माता-पिता से केवल अधिकार मांगें, माता-पिता बच्चों से केवल अपेक्षाएँ रखें, पति-पत्नी एक-दूसरे से केवल हक़ की बात करें—तो कर्तव्य की भावना कमजोर पड़ जाती है।
परिवार में यदि हर व्यक्ति पहले अपना कर्तव्य निभाए, तो अधिकार अपने आप सम्मान के साथ मिलते हैं। समाज में अधिकार बनाम कर्तव्य का टकराव- आज समाज में असंतोष, टकराव और अविश्वास बढ़ रहा है। इसका एक बड़ा कारण है—*अधिकारों की होड़ और कर्तव्यों की उपेक्षा।*
जब हर व्यक्ति केवल अपने अधिकार की बात करता है और दूसरे से कर्तव्य की अपेक्षा रखता है, तब टकराव स्वाभाविक है। नागरिक सरकार से अधिकार मांगता है, सरकार नागरिक से कर्तव्य निभाने की उम्मीद करती है, लेकिन दोनों ओर संतुलन नहीं बन पाता। अधिकार यदि बिना कर्तव्य के दिए जाएँ, तो वे अव्यवस्था को जन्म देते हैं। और कर्तव्य यदि बिना अधिकार के थोपे जाएँ, तो वे शोषण बन जाते हैं।
संविधान की भावना: अधिकारों के साथ कर्तव्य**
हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि जिस संविधान से हमें अधिकार मिलते हैं, वही संविधान हमें कर्तव्यों की याद भी दिलाता है। अधिकार हमें स्वतंत्र बनाते हैं,
कर्तव्य हमें जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं।
संविधान का उद्देश्य केवल अधिकारों की सूची देना नहीं, बल्कि एक *संतुलित, अनुशासित और जागरूक समाज* का निर्माण करना है। जब हम संविधान को केवल अधिकारों के दस्तावेज़ के रूप में देखते हैं और कर्तव्यों को नज़रअंदाज़ करते हैं, तब हम उसकी आत्मा को अधूरा समझते हैं।
कर्तव्य भूलने के दुष्परिणाम -कर्तव्यों की उपेक्षा समाज में कई गंभीर समस्याओं को जन्म देती है— अनुशासनहीनता, भ्रष्टाचार , असहिष्णुता , आपसी अविश्वास, और सामाजिक विघटन ।जब हर कोई लेने को तैयार हो, लेकिन देने को नहीं तो व्यवस्था चरमराने लगती है।अधिकारों की अधिकता बिना कर्तव्य के, समाज को स्वार्थी बना देती है। समाधान: अधिकार और कर्तव्य में संतुलन*इस समस्या का समाधान अधिकारों को कम करना नहीं, बल्कि कर्तव्यों को फिर से **सम्मानित स्थान* देना है। इसके लिए— शिक्षा में कर्तव्य-बोध** को प्राथमिकता दी जाए। परिवार में उदाहरण द्वारा शिक्षा** दी जाए—बड़े अपने कर्तव्य निभाएँ। सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी** को सामाजिक सम्मान मिले। मीडिया और साहित्य** में कर्तव्य को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाए। जब समाज कर्तव्य निभाने वालों को भी उतना ही सम्मान देगा जितना अधिकार मांगने वालों को देता है, तभी संतुलन बनेगा। अधिकार तभी सार्थक हैं, जब कर्तव्य जीवित हों** अधिकार हमें पहचान देते हैं, कर्तव्य हमें चरित्र देते हैं। अधिकार हमें बोलना सिखाते हैं, कर्तव्य हमें सही समय पर चुप रहना भी सिखाते हैं। यदि हम केवल अधिकारों की भाषा बोलते रहे और कर्तव्यों को भूलते गए, तो समाज खोखला हो जाएगा। लेकिन यदि हम कर्तव्य को अपने आचरण का आधार बना लें, तो अधिकार अपने आप सुरक्षित हो जाएंगे। अंततः यही सत्य है—*“अधिकार मांगने से मिलते हैं, लेकिन कर्तव्य निभाने से समाज बनता है।”और शायद अब समय आ गया है कि हम यह प्रश्न केवल पूछें नहीं, बल्कि अपने जीवन में उत्तर भी उतारें—“हम अधिकार जानते हैं, अब कर्तव्य निभाना भी सीखें।”









