‌ क्या से क्या हो गया?

राजकुमार जैन

हर कोई इस बात से वाकिफ है कि दुःख और सुख‌ इंसानी जीवन ‌ की हकीकत है,‌ और इसमें ‌ घर परिवार, संगी साथियों,‌ यारों दोस्तों, ‌ रिश्तेदारों, पड़ोसियों, सहकर्मियों की शिरकत ‌ लाजमी और अहमियत रखती है। बचपन में देखता था मोहल्ले की ‌ लड़की की शादी में ‌ हर कोई किसी न किसी रूप में शामिल रहता था। मौत के‌ वक्त पड़ोसी के यहां चूल्हा नहीं जलता था।‌ ‌अर्थी जाते वक्त ‌ पूरा मोहल्ला शामिल रहता था।
पर अजीब मंजर अब देखने को मिल रहा है, ‌ सुख के समय लगता है कि उत्सव मनाने वाले इंसान का दायरा कितना बड़ा है, ‌ शादी विवाह, ‌ जन्मदिवस, शादी की सालगिरह‌ वगैरा पर इतना बड़ा जमावड़ा‌, शान शौकत देखने को मिलती है, लगता है की बड़ा ही रसूक‌,‌ वाला आदमी है। पर उसी इंसान के‌ घर पर अगर कोई दुःख तकलीफ‌,‌ गमी‌ का कोई हादसा हो जाए ‌ तो गिनती के लोग वहां पर दिखाई देते हैं। रात्रि ‌को घर में‌ किसी का इंतकाल हो जाए तो रात भर शव के साथ‌ सिर्फ परिवार के चंद लोग ही वहां बैठे नजर आते हैं। मुर्द घाट का आलम यह है कि वहां पहुंचे हुए इंसान मोबाइल पर‌ अपने कारोबार की बात करते हुए इशारतन पूछते रहते हैं‌ क्रिया में और कितनी देर लगेगी। कई बार ‌ टेलीफोन आया की तीसरी मंजिल पर शव है,‌ उसको ऊपर से नीचे लाना है, ‌ कफन का बंदोबस्त कैसे होगा। लंबी बीमारी के वक्त‌ एकआघ के बाद‌ घर और अस्पताल में कोई पूछने आने वाला भी नहीं होता। जीते जी बूढ़े मां-बाप की देखभाल खिदमत, ‌ संगत ‌ से अलग होकर मौत के बाद ‌ सफेद लिबास ‌ तथा भंडारे का आयोजन ऐसे होता है मानो इनसे ज्यादा‌ अपने मां-बाप से प्यार करने वाला शायद कोई हो। यह सब विकृतिया ‌ मध्य वर्ग में ज्यादा पनपी है। गरीब तपके मे अभी भी सामाजिकता देखने को मिलती है। हर तरह का दिखावा भोंडापन, ‌एक दिन मां का,‌ एक दिन पिता‌ का,‌ एक दिन प्रेम का ‌ चलन जारी है। यार दोस्त ‌ भी हिसाब किताब से बदलते रहते हैं। हर दूसरे आदमी को अपना दोस्त यार बताने वाले, बड़े-से बड़े महफिल बाज से पूछा जाए‌ कि तुम्हारे कितने ऐसे अंतरंग दोस्त हैं जिनसे तुम‌‌ पर्दे ‌ के पीछे की बात ‌ सांझा कर सकते हो,‌‌‌‌ मुसीबत के वक्त यकीनन वह साथ खड़ा रहेगा‌ यकीन करते हो तो वह सिर्फ खुजलाने लगता है। और हो भी क्यों ना, ‌ जब मैं किसी दूसरे के दुःख में शामिल होने से कतराऊंगा‌‌ तो ‌ मेरी मुसीबत में दूसरे क्यों शामिल होंगे। ‌‌
मुझे आज भी इस बात का‌ फख्र,‌ संतोष है की पचास- साठ साल पहले बने संबंधों में ‌नजदीकीपन, ‌ संगत और मिलने की मिठास बढ़ती ही जा रही है।

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