स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के रूप में जाने जाते हैं) ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर गंभीर आरोप लगाए हैं। यह विवाद हाल ही में माघ मेले में हुई कुछ घटनाओं, विधानसभा में योगी के बयान (“हर कोई शंकराचार्य नहीं हो सकता”) और इससे जुड़े तनाव के बाद तेज हुआ है।
शंकराचार्य ने कहा है कि योगी आदित्यनाथ जब मुख्यमंत्री बने, तब उनके ऊपर 40 से ज्यादा मुकदमे थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने सभी केस हटवा लिए। उन्होंने इसे कानून के समान लागू होने पर सवाल उठाते हुए कहा कि “किस संविधान में लिखा है कि कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बन जाएगा तो उसके केस वापस ले लिए जाएंगे?” और “ये कैसा कानून का पालन है?” उन्होंने योगी पर “गुंडे की भाषा” बोलने और नाथ पंथ के विचारों को कलंकित करने का भी आरोप लगाया।
यह बयान मुख्य रूप से वाराणसी में दिया गया और कई मीडिया रिपोर्ट्स (जैसे ABP Live, UPTak आदि) में कवर किया गया है। कुछ रिपोर्ट्स में बीबीसी का हवाला देते हुए यह दावा दोहराया गया है।
यह आरोप योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक करियर से जुड़े पुराने विवादों को दोहराता है। योगी पर 2000 के दशक में विभिन्न मामलों (जैसे दंगा भड़काने, भड़काऊ भाषण आदि से संबंधित) में कई FIR दर्ज हुई थीं, जिनकी संख्या 40+ बताई जाती रही है। 2017 में CM बनने के बाद कई केस कोर्ट में खारिज हुए, वापस लिए गए या सरकार की ओर से समाप्ति की प्रक्रिया हुई। हालांकि, यह कहना कि “उन्होंने खुद हटवा लिए” एक राजनीतिक आरोप है, क्योंकि कानूनी रूप से केस वापसी या खारिजगी कोर्ट के आदेश से होती है, न कि व्यक्तिगत फैसले से। यह पूरा विवाद अब राजनीतिक और धार्मिक स्तर पर गहरा गया है, जिसमें शंकराचार्य ने पहले भी योगी को गौ-रक्षा और अन्य मुद्दों पर 40 दिन का अल्टीमेटम दिया था। दोनों पक्षों के बीच तीखी बयानबाजी जारी है।








