प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है पंजाब केसरी ग्रुप पर भगवत मान सरकार द्वारा की जा रही छापेमारी!
चरण सिंह
जिस केजरीवाल टीम को मीडिया ने फर्श से अर्श तक पहुंचाया। जो केजरीवाल संघर्ष के दिनों में मीडिया का सहारा लेते रहे हैं। उन केजरीवाल को अब मीडिया में कमियां नजर आने लगी हैं। कमियां भी ऐसी कि छापेमारी करा रहे हैं। मीडिया समूह भी ऐसा कि जिसका इतिहास देशभक्ति से जुड़ा रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़चढ़ हिस्सा लेने वाले और आपात काल का जमकर विरोध करने वाले और जनता की आवाज बनने वाले मीडिया हाउस पर। जी हां जिस तरह से पंजाब में पंजाब केसरी समूह पर लगातार छापेमारी की गई। वह प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है। यह भी अपने आप में दिलचप्स है कि दूसरे मीडिया इस मामले में चुप हैं। केजरीवाल को यह समझ लेना चाहिए कि आप और आपकी टीम तो भ्र्ष्टाचार के आरोप में जेल गए थे पर पंजाब केसरी के मालिक चौपड़ा परिवार देश और समाज के लिए जेल गया है। देश और समाज के लिए अख़बार निकाले हैं। पंजाब केसरी की छवि भी देशभक्ति की रही है।
केजरीवाल एंड टीम को यह समझ लेना चाहिए कि पंजाब केसरी के मालिकों का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा है। देशभक्ति के कीर्तिमान बनाने का रहा है। जब महात्मा गांधी ने 1920 के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए युवाओं का आह्वान किया, तब इस समूह के संस्थापक जगत नारायण सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। उस समय वजह 21 वर्ष के थे। विधि (लॉ) की पढ़ाई छोड़कर वह लाहौर कांग्रेस में शामिल हो गए थे।
इस परिवार की सदस्य सीमा आनंद चोपड़ा अपने ब्लॉग timelesstrails.in में नारायण के पिता लाला लक्ष्मी दास चोपड़ा के बारे में लिखा है कि “वह लायलपुर (अब पाकिस्तान में) के कलेक्टर थे। उनका सामना एक ब्रिटिश इंस्पेक्टर से हुआ, जिसने उन्हें घोड़े से उतरकर उसे सम्मान देने का आदेश दिया। उन्होंने ब्रिटिश अधिकारी का यह अपमानजनक आदेश मानने से इनकार कर दिया और उसी क्षण नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया। उन्होंने कसम खाई कि उनकी आने वाली पीढ़ियां कभी भी साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार की नौकरी नहीं करेंगी और उन्होंने लायलपुर के एक नामी वकील के यहां मुंशी की नौकरी कर ली।
उन्होंने लिखा है कि लाहौर जेल में नारायण की मुलाकात लाला लाजपत राय से हुई। दोनों असहयोग आंदोलन के दौरान जेल में थे। इस दौरान नारायण ने पहले उनके निजी सचिव के रूप में काम किया और फिर उनकी सलाह पर भाई परमानंद के हिंदी साप्ताहिक आकाशवाणी के संपादक भी बने। इस तरह उन्होंने समाचार पत्रों की दुनिया में कदम रखा। वे (1930 के दशक के) सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) समेत अलग-अलग अवसरों पर कुल मिलाकर नौ साल जेल में रहे।
जानकारी के अनुसार 1929 में लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित लोक सेवक मंडल ने पंजाब केसरी नामक साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। पुरुषोत्तम दास टंडन इसके प्रकाशक और भीम सेन विद्यालंकार संपादक थे। लाला लाजपत राय की आत्मकथा सबसे पहले यहीं छपी थी और पंडित नेहरू ने इसमें हिंदी में लेख लिखे थे। लाहौर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान यह दैनिक रूप से प्रकाशित होने लगा। अखबार में कांग्रेस के अंदर की खबरें छपा करती थीं। बाद में यह बंद हो गया। 1960 के दशक में एक प्रकाशन समूह ने इसी नाम से फिर एक अखबार शुरू किया (वैदिक 2002), लेकिन इस नई शुरुआत से बहुत पहले देश का विभाजन हो गया, जिसके बाद जगत नारायण भारत आ गए।
उन्होंने अपने बेटों रोमेश चंद्र चोपड़ा और विजय चोपड़ा के साथ 1949 में एक उर्दू दैनिक हिंद समाचार का प्रकाशन शुरू किया। प्रेस इन इंडिया: एनुअल रिपोर्ट ऑफ रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स फॉर इंडिया (1958) किताब के अनुसार, इसका पंजीकरण 1948 में किया गया. “रोमेश चंदर” इसके मुद्रक और प्रकाशक थे, और नौहरिया राम दर्द संपादक।
उस समय, सभी राज्यों में सबसे अधिक (144) उर्दू प्रकाशन पंजाब में निकलते थे। पंजाबी के अखबार 102 थे जबकि हिंदी के केवल 62, उर्दू की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लाला लाजपत राय की स्मृति में पंजाब केसरी नाम का हिंदी अखबार 17 साल बाद छपना शुरू हुआ। जैसा कि निनान ने अपनी किताब में लिखा है, “जब समझा जाने लगा कि पंजाब में हिंदी पढ़ने वालों की तादाद इतनी है कि यह प्रयास सार्थक हो सके। .
1967 की प्रेस इन इंडिया पुस्तक के अनुसार, “1966 में सबसे अधिक बिकने वाला अखबार जालंधर शहर से छपनेवाला (उर्दू दैनिक) हिंद समाचार था। गौरतलब है कि राज्य में सबसे अधिक बिकने वाले सारे अखबार जालंधर से छपते थे। 1978 में समूह ने एक पंजाबी समाचार पत्र, जगबाणी भी प्रकाशित करना शुरू किया।
1929 में लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित लोक सेवक मंडल ने पंजाब केसरी नामक साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। पुरुषोत्तम दास टंडन इसके प्रकाशक और भीम सेन विद्यालंकार संपादक थे। लाला लाजपत राय की आत्मकथा सबसे पहले यहीं छपी थी और पंडित नेहरू ने इसमें हिंदी में लेख लिखे थे। लाहौर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान यह दैनिक रूप से प्रकाशित होने लगा।
प्रेस इन इंडिया के अनुसार 1986 तक पंजाब केसरी का प्रकाशन जालंधर के अलावा अंबाला और दिल्ली से भी होने लगा था। इसकी हर दिन 4,60,000 प्रतियां बिकती थीं और यह भारत में सबसे अधिक बिकने वाला हिंदी अखबार था। 1990 के दशक के अंत तक यह उत्तर भारत में सबसे अधिक बिकने वाला हिंदी दैनिक बना रहा।
आपातकाल के समय भी इस ग्रुप में सरकार के खिलाफ जमकर मोर्चा खोला था। यह अखबार था जिसमें चरमपंथी नेता संत जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके अनुयायियों की मांगों की आलोचना हुआ करती थी। 1981 में नारायण की हत्या कर दी गई। बीस दिन बाद इंडिया टुडे में एक रिपोर्ट आई, जिसमें रोमेश ने बताया था कि उनके पिता ने अप्रैल 1978 में 200 चरमपंथी सिखों द्वारा एक निरंकारी सभा पर किए गए सशस्त्र हमले की जांच कर रहे एक विशेष आयोग के सामने गवाही दी थी, तभी से उनका नाम ‘हेट लिस्ट’ में था।