संघ का ‘देशभक्त’ संगठन होने का दावा बेबुनियाद : सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने पिछले माह अपने 100 वर्ष पूरे होने का जोर-शोर से जश्न मनाया और इस अवसर पर अपनी देशभक्ति से लेकर देश में अपने योगदान को लेकर बड़े-बड़े दावे किए। सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने संघ द्वारा स्वयं को “देशभक्त संगठन” बताने और उसके योगदान के किसी भी दावे को पूरी तरह निराधार और ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत बताया है।

पार्टी ने कहा है कि देश की आज़ादी की लड़ाई में संघ की कोई भूमिका नहीं रही। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान संघ ने न तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में भाग लिया, न ही किसी राष्ट्रीय आंदोलन या आंदोलनकारी का समर्थन किया। इसके विपरीत, उस समय संघ के नेतृत्व ने स्वतंत्रता संग्राम से दूरी बनाए रखी और अपने संगठन के एजेंडे को राष्ट्रीय आंदोलन से अलग रखा।

सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने कहा कि यह ऐतिहासिक रूप से सिद्ध है कि सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे स्वतंत्रता सेनानी — जिनको आज संघ अपना बताने की भरपूर कोशिश करता है — वास्तव में संघ की विचारधारा और उसकी राजनीति के विरोधी थे। इन महान नेताओं ने हमेशा धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक समानता और राष्ट्रीय एकता की बात की, जो संघ की संकीर्ण और विभाजनकारी सोच के ठीक विपरीत थी।

पार्टी ने कहा कि जो संगठन आज़ादी की लड़ाई में मौन या अनुपस्थित रहा, उसे अपने को देशभक्ति का प्रतीक बताने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। आज़ादी के असली वाहक वे लोग और संगठन हैं जिन्होंने अपनी जान और आज़ादी देश के लिए कुर्बान की — जिनमें समाजवादी, गांधीवादी, और क्रांतिकारी धारा के तमाम कार्यकर्ता शामिल थे।

पार्टी ने यह भी कहा कि संघ ने संगठनों के लिए निर्धारित देश के क़ानूनों की अवहेलना करते हुए सदैव एक छद्म संगठन (pseudo-organisation) के रूप में काम किया है। उसकी संरचना और गतिविधियाँ कभी पारदर्शी नहीं रहीं और उसने बार-बार ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे देश की सामाजिक एकता और राजनीतिक स्थिरता को नुकसान पहुँचा है। बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पीछे संघ परिवार का हाथ होने से भारत में आतंकवाद की समस्या को न्योता मिला, क्योंकि इससे पहले भारत में ऐसी घटनाएँ नहीं हुई थीं। पहला सीरियल बम धमाका 1993 की शुरुआत में, बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद हुआ था और उसके बाद भी कई धमाके हुए हैं, जिनमें दिल्ली में हुआ हालिया धमाका भी शामिल है। संघ ने अपने विचारों और कार्रवाइयों से समाज में विभाजन पैदा किया और देश को अस्थिर करने का ही काम किया है।

पार्टी ने कहा कि संघ का इतिहास और विचारधारा दोनों ही भारत के संविधान, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की भावना के विपरीत हैं। संघ को अपने सौ वर्ष पूरे होने पर आत्ममंथन करना चाहिए कि उसने इस अवधि में देश की एकता, बराबरी और भाईचारे को कितना मज़बूत किया या कमजोर किया।

सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने सवाल उठाया है कि संघ को यह बताना चाहिए कि उसने देश को आज़ाद कराने, उसकी एकता और अखंडता को मज़बूत करने में क्या ठोस योगदान दिया? उसे इन ज़रूरी सवालों का भी जवाब देना चाहिए कि देश की आज़ादी के बाद अपने मुख्यालय पर कई दशकों तक तिरंगा क्यों नहीं फहराया गया, क्या उसे भारत के संविधान में वास्तविक आस्था है या नहीं, और देश के अल्पसंख्यकों, दलितों एवं महिलाओं को समान नागरिक अधिकार देने के बारे में उसकी सोच क्या है?

 

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