बुजुर्गों की बचत पर टिका आम आदमी का तामझाम, घातक साबित हो सकती है गरीब और अमीर के बीच बढ़ती दूरी 

चरण सिंह 
देश में जो चमक-धमक और तामझाम दिखाई दे रहा है। यह नेताओं ब्यूरोक्रेट्स और पूंजीपतियों के बच्चों का दिखावा है। छोटे – छोटे बाज़ारों की चमक महंगे बाज़ारों और विभिन्न मॉल ने ले ली है। आम आदमी तो बेचारा मन मार कर रह जा रहा है। कभी कभी बच्चों की जिद पूरी करने के लिए बाजार में जाता है। या फिर तनाव में नशे की गिरफ्त में चला जा रहा है। किस्तों पर खरीदारी और ऑनलाइन शॉपिंग ने नौकरीपेशा लोगों का चैन छीन लिया है। नई पीढ़ी के लिए आने वाला समय कोई खास अच्छा नहीं दिखाई दे रहा है।
बेरोजगारी का असर सड़कों, ऑफिसों और घरों में साफ़ दिखाई दे जाता है। देश के 60 फीसद युवा 10-15 हजार तक की नौकरी करने को मजबूर है। प्राइवेट कंपनियों में तो पेंशन नाम मात्र की ही है और सरकारी नौकरियों की पेंशन खत्म कर दी गई है। मतलब नई पीढ़ी में से अधिकतर लोग अपने परिवार का गुजारा सही ढंग से नहीं कर पाएंगे। साथ ही बुढ़ापा बिगड़ेगा वह अलग से। ऐसे माहौल की आशंका दिखाई दे रही है। घर में कमाने वाला जब कमाना छोड़ देता है तो समझा जा सकता है कि परिवार में उसे कितना अपमानित होना पड़ता है। बच्चे भी पहले जैसे संस्कारी कम ही है, जिसका असर मां पिता की जिंदगी पर पड़ रहा है। मतलब ये जो हम जाति और धर्म की राजनीति में उलझे हैं। गलत होते देख रहे हैं। इसका दुष्प्रभाव देश और समाज पर पड़ रहा है। कल्पना कीजिये कि हमारे बच्चों और फिर उनके बच्चों की स्थिति क्या होने वाली है?
सरकार जब सेना में भी बचत करने की सोचने लगे तो समझ जाइये देश कहां जा रहा है ? पीएम मोदी के विदेशी दौरे के लिए देश में पैसा है पर जवानों के स्थाई नौकरी और पेंशन के लिए पैसा नहीं है। अग्निवीर के नाम युवाओं को रोजगार देने की बात की जा रही है। चार साल में रिटायर भी कर दिया जा रहा है।
सरकार कुछ भी बोलती रहे पर पाकिस्तान से सीजफायर करने की असली वजह विदेश नीति की विफलता और सेना की उपेक्षा बताई जा रही है। जानकारी मिल रही है कि जब भूखे नंगे पाकिस्तान के साथ कई देश खुलकर सामने आ गए। चीन पाकिस्तान की ओर से लड़ने लगा। भारत के साथ खुलकर देश खड़े होने में हिचकने लगे तो सेना ने युद्ध के लंबा खिंचने की आशंका जताते हुए ज्यादा दिनों तक न लड़ पाने में असमर्थता जताई। वैसे भी मोदी कार्यकाल में सेना में भर्ती नाम मात्र की हुई है।
अग्निवीर योजना जवानों को स्थाई नौकरी और पेंशन से बचने के लिए लाई गई। पीएम मोदी खुद 75 साल में भी रिटायर नहीं होंगे पर किसान मजदूर का बेटा सेना में भर्ती होकर चार साल की सेवा के बाद ही रिटायर हो जाएगा। मतलब 22 साल में। 4 साल में रिटायर होने वाले जवान से कौन करेगा अपनी बेटी की शादी। वैसे भी अग्निवीर को पेंशन भी नहीं मिलेगी। ऐसे में प्रश्न उठता है कि मोदी सरकार को सेना के बजट में कमी करने की जरूरत तो पड़ गई पर नेता कई कई पेंशन ले रहा वह सरकार को दिखाई नहीं दे रहा है। खुद उप राष्ट्रपति रहे जगदीप धनखड़ ने हाल ही में कांग्रेस से विधायक रहने की पेंशन सरकार से मांगी है। मतलब सेना के जवान को पेंशन यही देंगे पर नेता कई कई पेंशन लेंगे। लोग यह समझने को तैयार नहीं।
जो लोग इस बात पर खुश हैं कि भारत दुनिया में तीसरी अर्थव्यवस्था बन चुका है। वे समझ लें कि गरीब और अमीर की दूरी और बढ़ी है। पैसा गिने चुने लोगों के पास आया है। सरकार ने बेरोजगारी से ध्यान बांटने के लिए लोगों को हिन्दू-मुस्लिम में उलझा रखा है। लोग यह समझने को तैयार नहीं कि नेताओं, ब्यूरोक्रेट्स और पूंजीपतियों के बच्चे जाति धर्म से ऊपर उठकर अपना करियर बना रहे हैं। नोट कमा रहे हैं। आम लोगों को आपस में उलझा दिया है। ऐसा नहीं है कि विपक्ष के नेता भी कोई बहुत बड़ा काम कर रहे हों। ये लोग भी बिल्ली के भाग से छींका टूटने का इंतजार कर रहे हैं। जनहित के किसी मुद्दे पर विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ खड़ा नहीं हो पाया।
यदि देश में रोजगार पर काम नहीं किया गया तो कहीं आने वाले समय नई पीढ़ी मानसिक रोगी बनकर न रह जाए ? क्या आज़ादी की लड़ाई में जाति धर्म के आधार पर लड़ी गई थी ? क्या जेपी क्रांति में जाति धर्म की कोई गुंजाइश थी ? क्या अन्ना आंदोलन में जाति धर्म कहीं दिखाई दे रहा था ? मतलब जब लोग जाति धर्म से ऊपर उठकर बड़ा प्रयास करते हैं तो तभी सफलता मिलती है। तो फिर लोग इस बात को क्यों नहीं समझते ? राजनीतिक दल जाति धर्म के नाम पर समाज को क्यों बांटने में लगे हैं?  लोग हक़ न मांगे इसके लिए आपस में उलझा दिया है।
देश में सबसे घटिया रोल मीडिया का देखा जा रहा है। जनहित की खबरों से किसी कोई मतलब नहीं। मीडिया और एक पत्रकार की क्या जिम्मेदारी और जवाबदेही है, इससे कोई मतलब नहीं। हां सत्ता की चाटुकारिता के लिए घोड़े खोल देंगे। पीएम मोदी के जन्मदिन पर जिस तरह से देश का मीडिया मोदी मय हो गया। ऐसा लगा कि जैसे मीडिया न होकर देश में विज्ञापन एजेंसियां मीडिया हाउस के रूप में खड़ी हो रही हैं। विज्ञापन भी एक बार समझ में आ रहे हैं पर पीएम मोदी की शान में जिस तरह से कसीदे पढ़े गए कि उससे यह लग रहा था कि मीडिया में पीएम मोदी के जन्मदिन के अलावा कुछ है ही नहीं। मीडिया को लेकर इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि जनता तक सच्चाई नहीं पहुंच पा रही है तो इसका बड़ा जिम्मेदार देश का मीडिया ही माना जा रहा है।
मीडिया के सत्ता की चाटुकारिता करने का देश के एक नहीं बल्कि कई नुकसान उठाने पड़ रहे हैं। लोग भ्रमित तो हो ही रहे हैं साथ ही सरकार की निरंकुशता भी बढ़ रही है। नेता और ब्यूरोक्रेट्स और पूंजीपति देश के संसाधनों के मजे मार रहे हैं और जनता है कि बेचारी बेबसी की जिंदगी जीने को मजबूर है। खुद पीएम मोदी भी सीना ठोक कर कहते हैं कि वह 80 करोड़ लोगों को फ्री में राशन दे रहे हैं। मतलब 140 करोड़ में 80 करोड़ लोग ऐसे हैं जो अपने परिवार का पालन पोषण नहीं कर सकते हैं। आज़ादी की लड़ाई में हमारे पूर्वज बलिदान न देते तो देश आज आज़ाद न होता। ऐसे ही आज भी देश और समाज के लिए लोगों को बलिदान के लिए तैयार रहना होगा। यदि यही चलता रहा तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ़ नहीं करेगी।
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