“कभी इंसानों को देखकर नमस्ते होती थी,
अब कुत्ते देखकर ‘बेबी’ कहा जाता है।”
यह पंक्ति अब मज़ाक नहीं, हमारी सामाजिक गिरावट का आईना है।
हमारे घरों में अब बुज़ुर्गों की चुप्पी और डॉग्स की सेल्फियाँ बराबर नहीं रहीं — डॉग्स को प्राथमिकता मिलने लगी है।
आज समाज एक अदृश्य बीमारी से ग्रस्त है — दिमागी रेबीज।
यह कोई वायरस नहीं, संवेदना का क्षय है।
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🧠 क्या है दिमागी रेबीज?
रेबीज शरीर को गला देता है,
पर दिमागी रेबीज आत्मा को सूखा देता है।
इंसान अब खून के रिश्तों से नहीं,
रील्स, पिक्स और पेट्स से जुड़ा है।
माँ-बाप अपने ही घर में मेहमान से भी बदतर हो गए हैं,
जबकि डॉग्स के लिए है:
•वातानुकूलित कमरे
•बर्थडे केक
•इंस्टाग्राम अकाउंट
•और “प्यारे बेटे” जैसा सम्मान।
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🧓🏼👶🏼 जब दादी उपेक्षित और डॉगी प्रिय हो जाए
कुछ सच्ची घटनाएँ:
1.दिल्ली के एक रिटायर्ड शिक्षक दंपत्ति ने पुलिस से शिकायत की — “बेटे ने घर से निकाल दिया, पर उसी बेटे ने अपने पेट डॉग के लिए नानी की चूड़ियाँ तक तुड़वा दीं, ताकि डॉग की बर्थडे पार्टी हो सके।”
2.मुंबई में एक वृद्ध महिला की लाश तीन दिन तक घर में पड़ी रही, बेटा विदेश में था, लेकिन उसी घर में डॉग के लिए रोज़ाना ऑनलाइन फूड डिलीवर हो रहा था।
3.एक नर्सिंग होम में बुज़ुर्ग माँ ने मोबाइल पर अपनी बेटी की शादी की तस्वीर देखी, बेटी खुद नहीं आई थी, पर अपने पालतू डॉग का एक विडियो संदेश जरूर भेजा था — “दादी को मिस कर रहे हैं।”
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🤖 तकनीक ने जोड़ा, भावनाओं ने तोड़ा
हम वीडियो कॉल से दुनिया के छोर पर बात कर सकते हैं,
पर घर में माँ की आँखों में झाँकने की हिम्मत नहीं बची।
हमने फॉलोअर्स की भीड़ बना ली है,
पर एक भी ऐसा इंसान नहीं बचा, जिससे दिल की बात कह सकें।
हम इंसानों से भागते हैं, जानवरों में अपनापन ढूंढते हैं — यही दिमागी रेबीज का असली लक्षण है।
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❗ कुत्ते पालना गुनाह नहीं, पर…
पालतू जानवरों से प्रेम एक सुंदर भावना है —
पर इंसानों की उपेक्षा अमानवीयता की पराकाष्ठा है।
कुत्ता वफ़ादार हो सकता है,
पर माँ-बाप की जगह नहीं ले सकता।
बुज़ुर्गों की कहानियाँ और बच्चों की किलकारियाँ किसी भी सभ्य समाज की असली धरोहर होती हैं।
उनकी जगह इंस्टा-डॉग्स और सिलेब्रिटी पपीज ले लें — ये एक अंधे युग की निशानी है।
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✊ इस पागलपन से लौटने की ज़रूरत है:
•बच्चों को ब्रांड नहीं, संवेदना सिखाइए
•रिश्तों में तकनीक लाइए, पर दिल में अपनापन भी रखिए
•माँ-बाप की हँसी और दादी की कहानियाँ फिर से सुनिए
•इंसानों की सुनिए, वरना एक दिन हर दिल अकेला भौंकता मिलेगा
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🧩 आख़िरी सवाल:
“अगर हम इंसानों से ज़्यादा कुत्तों पर भरोसा करने लगे हैं,
तो सवाल ये नहीं कि कुत्ते अच्छे हैं —
सवाल ये है कि हमने इंसानों को इतना घटिया क्यों बना दिया?”
संवेदना का पुनर्जागरण ही इस युग की सबसे बड़ी क्रांति होगी।








