चरण सिंह
इमरजेंसी के बारे में हर साल बड़े-बड़े लेख लिखे जाते हैं। कांग्रेस को छोड़कर लगभग सभी पार्टियां इमरजेंसी की आलोचना करते हुए बड़ी-बड़ी बातें करती हैं। तमाम नेता तरह तरह की बातें करते हैं। मतलब सब कुछ होता है पर इमरजेंसी के खिलाफ खड़े हुए क्रांतिकारियों के संघर्ष से कोई सबक लेने को टी तैयार नहीं। यह समझने को तैयार नहीं कि हर बदलाव बड़ा संघर्ष मानता है। आज की तारीख में मोदी सरकार पर विपक्ष अघोषित आपातकाल लगाने का आरोप लगाता है पर कोई नेता आपातकाल वाला संघर्ष करने को तैयार नहीं। जो लोग इस समय इमरजेंसी की बात करते हुए बदलाव की बात कर रहे हैं वे यह भलीभांति समझ लें कि 1975 में जब देश में आपातकाल लगा तो लगभग 1 लाख से अधिक लोग बिना मुकदमे के जेल में डाले गए थे। इनमें जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, चौधरी चरण सिंह, लालकृष्ण आडवाणी जैसे प्रमुख विपक्षी नेताओं के अलावा बड़े स्तर पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र और आम नागरिक शामिल थे।
विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए पुलिस ने क्रूरता का सहारा लिया था। कई कार्यकर्ताओं को जेलों में यातनाएं दी गईं, गिरफ्तार लोगों के परिवारों को भी परेशान किया गया था। जेलों में बंद लोगों को अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। फिर भी लोग लड़े। आज की तरह लाठी डंडे और जेल जाने से डरे नहीं थे। इमरजेंसी के विरोध में उस समय अख़बारों ने सम्पादकीय का कॉलम खाली छोड़ दिया गया था। मतलब बड़े संघर्ष के बाद बदलाव हुआ था। जनता पार्टी की सरकार बनी थी। मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने की बात करने वाले लोग बताएं कि कितने नेता आंदोलन के नाम पर जेल में बंद है ? कितने नेता सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं ? पत्रकार, साहित्यकार, वकील छात्र सत्ता के जनविरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं। आज की तारीख में कितने पत्रकार, साहित्यकार, वकील और छात्र सत्ता के गलत का विरोध कर रहे हैं ? जिन लोगों पर सत्ता के नकेल कसने की जिम्मेदारी थी वे सत्ता के दबाव में हैं।
आज फिर से बदलाव की बात की जा रही है। बिना एक डंडा खाए, बिना जेल जाए और सत्ता के पक्ष में संपादकीय लिखकर, मतलब विपक्ष के साथ ही तमाम पत्रकार, साहित्यकार अपने जिम्मेदारी से भटककर सत्ता के प्रवक्ता बने हुए हैं। मीडिया तो जैसे सत्ता के लिए ही काम कर रहा हो। छात्र तो जैसे राजनीतिक दलों के इस्तेमाल हो रहे हों। फिर भी लोग बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं। ऐसे में बड़ा प्रश्न उठता है कि फिर बदलाव होगा कैसे ? जितने भी बदलाव हुए हैं। उस दौर के लोगों के संघर्ष से सीख लेते हुए संघर्ष का रास्ता अपनाना होगा। आरामतलबी छोड़कर सत्ता के नकेल कसने के लिए सड़कों पर आना होगा। स्वार्थ छोड़कर देश और समाज के लिए लड़ना होगा। लोगों की समझौतावादी सोच अराजक लोगों का मन बढ़ा रही है। सत्ता बेलगाम होती जा रही है। लोग जाति और धर्म के नाम पर बंट चुके हैं। आपातकाल के दौरान मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (MISA) और डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स (DIR) के तहत बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं। कुछ स्रोतों में यह भी उल्लेख है कि जेलों में जगह की कमी के कारण अस्थाई जेलें बनाई गई थीं।








