चरण सिंह
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 5000 सरकारी स्कूल बंद करने का योगी सरकार का फैसला महंगा साबित हो सकता है. इसकी बड़ी वजह ये है कि इससे गरीब बच्चे प्रभावित होंगे. प्रभावित बच्चों के अभिभावक बीजेपी के खिलाफ जा सकते हैं. ये सब वो लोग हैं जो कानून व्यवस्था और हिंदुत्व के मुद्दे पर बीजेपी को वोट दे रहे हैं. वैसे भी अगर किसी स्कूल में 50 से कम बच्चे आ रहे हैं तो ये भी सरकार की गलत नीति है. कौन नहीं जानता कि आज की तारीख में प्राइवेट स्कूलों में खूब ठगी हो रही है. आम आदमी अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं पढ़ा पाएगा, ऐसे में ये बच्चे अपराध की तरफ रुख करेंगे. सरकारी स्कूल नहीं रहेंगे और गरीब बच्चे प्राइवेट स्कूलों में नहीं पढ़ पाएंगे. फिर ये बच्चे अपराध की तरफ भागेंगे. सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार द्वारा 5000 से ज्यादा सरकारी स्कूलों को बंद करने या उनका विलय करने की खबरें हैं. इस फैसले का लक्ष्य कम नामांकन वाले (50 से कम छात्र) स्कूल हैं, जिसके तहत इन स्कूलों को पास के बड़े स्कूलों में मर्ज किया जाएगा। सरकार का तर्क है कि इससे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर स्कूलों में 50 से कम बच्चे हैं, तो भी सरकार दोषी है। सरकार के इस कदम का शिक्षक संगठनों, कांग्रेस और सपा जैसी विपक्षी पार्टियों और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विरोध किया है। उनका कहना है कि इससे ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की पहुंच कम होगी, गरीब और दलित बच्चों का भविष्य प्रभावित होगा और शिक्षक भर्ती पर भी संकट गहराएगा। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे शिक्षा विरोधी कदम बताया है। दूसरी ओर सरकार ने ‘प्रोजेक्ट अलंकार’ और ‘मुख्यमंत्री समग्र विद्यालय’ जैसी योजनाओं के तहत 39 जिलों में स्कूलों के आधुनिकीकरण और नए स्कूलों के निर्माण की बात कही है।








