अपनी कला के जरिये संस्कृति को बचाने की कोशिश में लगे मास्टर छोटूराम

(हरियाणा शिक्षा विभाग में प्राथमिक शिक्षक मास्टर छोटूराम आज किसी परिचय के मोहताज़ नहीं है। देश-विदेश में हज़ारों स्टेज कार्यक्रम दे चुके मास्टर छोटूराम देश के वीर-शहीदों शहीद भगतसिंह, सुभाष चद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, शहीद उद्यम सिंह के साथ-साथ अन्य सपूतों की जीवनी को जब अपने गीतों और किस्सों के माध्यम से स्टेज पर प्रस्तुत करते है तो देशभक्ति की रसधार बहने लगती है। लोगों को आज के अश्लील दौर में एक सभ्य और जीवन मूल्यों से भरे गीतों को सुनंने का सुनहरा अवसर मिलता है। भिवानी जिले के कस्बे सिवानी के गाँव बड़वा की माटी में जन्मे मास्टर छोटूराम का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। इनके पिता स्वर्गीय रिछपाल गैदर एक किसान थे जिनसे इनको संघर्ष करने और धैर्य रख आगे बढ़ने की सीख मिली।)

डॉ. सत्यवान सौरभ

प्राचीन समय से ही इंसान का विभिन्न कलाओं के प्रति अटूट रिश्ता रहा है। कभी कलाकारों के फ़न ने तो कभी कलाओं के मुरीद लोगों ने इस ज़माने में नए-नए रंग बिखेरे है। ये माना जाता है कि आत्मा की तरह कला अजर-अमर है, ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती है और नया रूप लेती है। आज कला के रूप बदरंग हो गए है।

कलाकार अपने उद्देश्यों से भटक गए है और पैसों के पीछे दौड़ पड़े है जो एक तरह कला को बेचने जैसा है। आज कला के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता समाज को लील रही है। मगर इन सबके बीच आज भी देश में कुछ ऐसे कलाकार है जो भारत की प्राचीन सभ्यता को नए रंग देकर उन आदर्श और मूल्यों को बचाने की कोशिश में लगे है। जी हाँ, उनमे से एक है हरियाणा के भिवानी जिले के कस्बे सिवानी के गाँव बड़वा की माटी में जन्मे मास्टर छोटूराम। किसान परिवार में जन्मे मास्टर छोटूराम का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। इनके पिता स्वर्गीय रिछपाल गैदर एक किसान थे जिनसे इनको संघर्ष करने और धैर्य रख आगे बढ़ने की सीख मिली। छोटी उम्र में पिता का साया उठने के बाद भी ये अपनी पढाई को जारी रखते हुए शिक्षा और कला के क्षेत्र में आगे बढ़ते गए। पिछले चार-पांच दशकों से मास्टर छोटूराम अपने लिखे गीतों के जरिये समाज को भारत की प्राचीन संस्कृति से जोड़ने का अतुल्य प्रयास कर रहे है। पेशे से सरकारी अध्यापक मास्टर छोटूराम एक आशु कवि और हरियाणवी-हिंदी के जाने माने गायक है। देश भर में हज़ारों स्टेज कार्यक्रम दे चुके मास्टर छोटूराम हमारे देश के वीर-शहीदों; शहीद भगतसिंह, सुभाष चद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, शहीद उद्यम सिंह के साथ-साथ अन्य सपूतों की जीवनी को जब अपने गीतों और किस्सों के माध्यम से स्टेज पर प्रस्तुत करते है तो देशभक्ति की रसधार बहने लगती है। लोगों को आज के अश्लील दौर में एक सभ्य और जीवन मूल्यों से भरे गीतों को सुनंने का सुनहरा अवसर मिलता है।

इन सबके अलावा मास्टर छोटूराम यू ट्यूब एवं सोशल मीडिया के जरिये भारत की प्राचीन संस्कृति से जुड़े किस्सों को वीडियो और ऑडियो रूप में फ्री में शेयर करते है, ताकि प्राचीन संस्कृति को बचाया जा सके। हरियाणवी संस्कृति के विभिन्न रंगों को इन्होने अपनी रागनियों और नाटकों में बखूबी पिरोया है और लोगों के मनों तक पहुँचाया है। देश भर में आकाशवाणी एवं टीवी पर समय-समय पर इनके ये कार्यक्रम देखे व् सुने जा सकते है। गायक कवि कलाकार मास्टर छोटूराम अपने सिद्धांतों और कला से किसी भी क़ीमत पर समझौता नहीं करते। आज जब नग्न संस्कृति गीतों और किस्सों में हावी है। तब भी इन्होने अपने मूल्यों को बनाये रखा और हमारे ऐतिहासिक और पौराणिक किस्सों को जेब से पैसे लगाकर रिलीज़ करवाया है। बेशक आज के तड़क भड़क वाले अश्लील वीडियो की तुलना में उनको कम शेयर किया गया है लेकिन वास्तव में उन्होंने हमारी धरोहर को सहेजने कि दिशा में अपना अमूल्य योगदान दिया है। पितृभक्त श्रवण कुमार-कुमार और फैशन की फटकार इनके पहले दो ऑडियो एल्बम है जिनको लोग आज बीस साल बाद भी सुन रहे है और सोशल मीडिया पर शेयर कर रहें है। ‘कड़े गए वह नाथू-सुरजा’ हरियाणा की बदलती संस्कृति पर फ़िल्माया गया उनका सुपर हिट गीत है जिसको बहुत पसंद और शेयर किया गया है। ऐसतिहासिक ‘नरसी का भात’ किस्सा दर्शकों को पूरी रात भर सुनने को मजबूर कर देता है। वास्तव में अपनी प्राचीन कला को बनाये रखना बहुत बड़ी बात है। आज के दौर में युवा पीढ़ी यू ट्यूब और अन्य सोशल प्लेटफार्म पर घटिया स्तर के वीडियोस और ऑडियो को पसंद करती नज़र आ रही है। ऐसे में मास्टर छोटूराम के सामाजिक गीतों के प्रयास बड़ी छाप छोड़ रहें है। मीडिया को ऐसे कलाकारों के प्रयासों को जोर-शोर से प्रचारित-प्रसारित करना चाहिए।ताकि हमारे प्राचीन मूल्यों को आज की इस शोषणकारी और अश्लील संस्कृति से दूर रखा जा सके।

जब मास्टर छोटूराम जैसे कलाकर पैसों के लिए अपनी कला से समझौता नहीं करते तो हम क्यों घर बैठे कर रहें है। अश्लील गीतों को समाज से बाहर करने के लिए हमें अच्छे गीतों और अच्छे कलाकरों को उचित मान-सम्मान देना ही होगा, तभी हम कला को वास्तविक रूप देकर एक रहने योग्य समाज आने वाली पीढ़ियों को देकर जा पाएंगे। लोक कलाएँ वास्तव में किसी भी समाज की नब्ज होती है। हमें अपने बच्चों को इन कलाओं से अवश्य रूबरू करवाना चाहिए। साथ ही ये भी ध्यान रखना चाहिए कि आज के इस इंटरनेट युग में हमारे बच्चे क्या देख रहें है क्या सुन रहें है। अच्छे कलाकार और उनकी कलाएँ समाज के सच्चे पथ प्रदर्शक है लेकिन उनको चुनना हमारी जिम्मेवारी है। प्रदेश एवं केंद्र सरकार को आज की बिगड़ती संस्कृति के लिए दोषी तड़क-भड़क के गानों को खासकर यू ट्यूब जैसे प्लेटफार्म पर बैन करना चाहिए। मास्टर छोटूराम जैसे कलाकारों को ढूँढकर उनके लिए-लिए एक सरकारी प्लेटफार्म एवं आर्थिक पैकेज की व्यस्था करने की ज़रूरत है ताकि वह हमारी संस्कृति को बचाने के लिए कर रहें प्रयासों को और आगे गति दे सके। हमारे वीर सपूतों की जीवनियों को मास्टर छोटूराम की तरह रागिनी, नाटक और किस्सों के जरिये अब बदलते दौर के डिजिटल उपकरणों के माध्यम से घर-घर तक पहुँचाने की ज़रूरत है ताकि आने वाली पीढ़ी हमारे वीरों के आदर्शों को अगली पीढ़ी तक सौंप सके और हम एक अच्छे अपने हिंदुस्तान को उनके हाथों में सौंप सके। जिसका सपना हमारे शहीदों ने अपनी जान देते वक़्त देखा था। इसलिए ज़रूरी है कि केंद्र सरकार ऐसे ज़मीन से जुड़े सच्चे कलाकरों के लिए अलग से कानून बनाकर हर राज्य सरकार को अपने क्षेत्र के हिसाब से लागू करवाए, तभी हमारी संस्कृति, संस्कार और धरोहर बच पाएंगे।

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