नीतीश के मन में क्या है?

 सरकारी कार्यक्रमों से बीजेपी कोटे के दोनों डिप्टी सीएम की दूरी क्यों?, बिहार में फिर सत्ता परिवर्तन की आहट!

दीपक कुमार तिवारी

नई दिल्ली/पटना। एक बार फिर से बिहार की एनडीए सरकार में सब कुछ सामान्‍य नजर नहीं आ रहा है! मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बीजेपी के नेताओं के बीच एक बार फिर से दूरी नजर आ रही है। सरकारी बैठकों से भाजपा कोटे के मंत्री नदारद दिखते हैं। वहीं, जिस कार्यक्रम में जेडीयू कोटे के मंत्री शामिल होते हैं, उससे बीजेपी के नेता दूरी बना लेते हैं। ऐसे में बीजेपी और जेडीयू के नेताओं की महत्‍वपूर्ण कार्यक्रमों से दूरी सवालों के घेरे में है। इस तरह की सिचुएशन कई बार देखने को मिली है। ऊपर से नीतीश कुमार ने पीएम मोदी को खत लिखकर कई डिमांड रख दी है।
यूं तो गठबंधन के बाद बीजेपी और जदयू के नेताओं बीच ऐसी नजदीकी देखी गई है कि लगभग सभी कार्यक्रमों में बिहार के दोनों डिप्टी सीएम तकरीबन हर जगह पर एक साथ मौजूद रहे। मगर, इन दिनों ये दूरी साफ नजर आ रही है। जो बिहार सरकार की अस्थिरता के संकेत माने जा रहे हैं। नेताओं के व्‍यवहार में ये बदलाव सत्‍ता परिर्वतन की ओर इशारा तो नहीं कर रहा? सियासी गलियारे में इस बात की चर्चा जोर पकड़ रही है कि सरकार विधानसभा चुनाव तक चलेगी या…?
बड़ी बात ये है कि अभी विधानसभा चुनाव में भी लगभग 1 साल का वक्त है। मगर, अभी से ही बीजेपी और जदयू के बीच आई ये कथित दूरी कई तरह के सवाल खड़े कर रही है। सवाल ये भी कि क्‍या बिहार विधानसभा के चुनाव समय से पहले होंगे? या केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अस्थिर होने वाली है? ऐसे में बिहार की सियासत में ये सवाल एक बार फिर से उठ रहा है कि क्या सब कुछ ठीक-ठाक है?
बिहार में बीजेपी और जदयू के बीच गठबंधन है। इसी गठबंधन की वजह से बीजेपी को जेडीयू का केंद्र सरकार को समर्थन है। आइए, अब कुछ कार्यक्रमों की चर्चा करते हैं। जिनमें जेडीयू से बीजेपी के नेताओं ने दूरी बनाई। माना जा रहा है यह दूरी दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है और मौजूदा विपक्ष इसका लाभ उठा सकता है।
पटना के बापू सभागार में 19 सितंबर को कचरा प्रबंधन को लेकर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। ये कार्यक्रम टोटल सेग्रीगेशन अभियान का था। इस कार्यक्रम में राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर मौजूद रहे। ये एक सरकारी कार्यक्रम था। उन्होंने ही इस कार्यक्रम की शुरुआत की। मौके पर विधानसभा अध्यक्ष नंदकिशोर यादव, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और दूसरे उपमुख्यमंत्री विजय सिन्‍हा मौजूद रहे। नगर विकास मंत्री नितिन नवीन और पूर्व केंद्रीय मंत्री और लोकसभा सांसद रविशंकर प्रसाद भी मौजूद थे। मगर इस कार्यक्रम में जीडीयू के एक भी नेता नजर नहीं आए। कायदे से इस कार्यक्रम में मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार की मौजूदगी होनी चाहिए थी। मगर ऐसा नहीं हुआ।
इससे पहले एक कार्यक्रम बिहटा एयरपोर्ट का भी हुआ। यहां भी नीतीश कुमार अकेले ही नजर आए। बिहटा में एयरपोर्ट बनाने को लेकर केंद्र सरकार की ओर से हरी झंडी दे दी गई। लेकिन बीजेपी और जदयू के नेता अलग-अलग इस एयरपोर्ट के निर्माण का क्रेडिट लेने की कोशिश करते नजर आए। यह एक ऐसा मौका था, जहां दोनों बीजेपी और जेडीयू का गठबंधन एक साथ आकर बिहटा के अंतरराष्‍ट्रीय एयरपोर्ट निर्माण का क्रेडिट ले सकते थे। मगर, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की तरफ से प्रेस रिलीज जारी कर इसका क्रेडिट लिया गया। वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अकेले कार्य स्थल का दौरा कर बिहटा एयरपोर्ट निर्माण का क्रेडिट लेते नजर आए।
जहां एक कार्यक्रम 19 सितंबर को टोटल एग्रीगेशन अभियान के शुरुआत का था। यहां जेडीयू के नेताओं ने इस कार्यक्रम से दूरी बनाई वहीं, इसी दिन एक कार्यक्रम और था, ये कार्यक्रम जेडीयू का था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में प्रस्तावित और निर्माणाधीन 4 एक्सप्रेस वे को लेकर हाई लेवल बैठक बुलाई। जिसमें इस योजना की पूरी जानकारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दी जानी थी। मगर गौर करने वाली बात ये रही कि इस समीक्षा बैठक में विभाग के मंत्री और उपमुख्यमंत्री विजय सिन्‍हा ही शामिल नहीं हुए।
बिहार में एक साल पहले से ही विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो गई है। नीतीश कुमार जल्‍द से जल्‍द उन कामों को पूरा कराना चाहते हैं, जो निर्माणाधीन है। ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में इसका राजनीतिक माइलेज लिया जा सके। राज्य में प्रस्तावित और निर्माणाधीन 4 एक्सप्रेस-वे निर्माण को लेकर बुलाई गई बैठक इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अधिकारियों को एक्सप्रेस-वे के लिए भूमि अधिग्रहण का काम जल्द से जल्द पूरा करने का निर्देश दे रहे थे। मगर, इस विभाग के मंत्री नितिन नवीन की गैर मौजूदगी में। ये अपने आप में सवालों के घेरे में है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्या बिहार में गठबंधन की दोनों पार्टियां अलग-अलग तरीके से सरकार चलाने की कोशिश कर रही है?
अब दो दिन पहले की घटना ले लेते हैं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कानून-व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई। ये बैठक नवादा में हुए अग्निकांड के बाद थी। मगर, गौर करने वाली बात ये रही कि इस बैठक में एडीजी, डीजीपी और मुख्य सचिव के अलावा बीजेपी कोटे से दोनों डिप्टी सीएम भी मौजूद नहीं रहे। गौर करने वाली बात ये है कि आमतौर पर ऐसी बैठकों में मुख्यमंत्री के साथ उपमुख्यमंत्री की मौजूदगी रहती है लेकिन इस बैठक के दौरान ना तो सम्राट चौधरी नजर आए और ना ही विजय सिन्‍हा।
21 सितंबर को एक और कार्यक्रम था। ये सरकारी कार्यक्रम था। जिसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पर्यटन विभाग की योजनाओं की समीक्षा बैठक की। मगर, चौंकाने वाली बात ये रही कि इस समीक्षा बैठक में भी बिहार सरकार के मंत्री और भाजपा नेता नीतीश मिश्रा गायब रहे। वो अपने ही विभाग की समीक्षा बैठक में मुख्‍यमंत्री के सामने नहीं बैठे।
वहीं, 23 सितंबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जहानाबाद में रहे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जहानाबाद जिले में कई योजनाओं का किया उद्घाटन और शिलान्यास किया। पटना-गया-डोभी (एनएच- 83) मार्ग पर अवस्थित जहानाबाद में निर्माणाधीन आरओबी का निरीक्षण किया। तेजी से निर्माण कार्य पूर्ण करने का निर्देश दिया। विभिन्न विभागों के अंतर्गत 57 करोड़ 14 लाख 59 हजार रुपए की योजनाओं का उ‌द्घाटन और 65 करोड़ 62 लाख 4 हजार रुपए की योजनाओं का शिलान्यास किया गया। मगर, इस कार्यक्रम में दोनों डिप्टी सीएम नहीं दिखे। आमतौर पर पटना से बाहर के कार्यक्रम में सीएम नीतीश के साथ सम्राट चौधरी दिखते हैं। जहानाबाद में सम्राट चौधरी नहीं थे, वहीं, दूसरे डिप्टी सीएम विजय सिन्हा लखीसराय में किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं रहे।
ऐसे में बिहार की राजनीतिक स्थिरता पर सवाल उठना लाजमी है। देखने वाली बात ये होगी कि क्‍या इस बार दोनों दलों में आई ये दूरी सत्‍ता परिर्वतन का कारण बनती है? या समय रहते इस दूरी और दरार को पाट लिया जाता है!
बीजेपी और जेडीयू के बीच आई इस ‘दूरी’ से आरजेडी भी अंजान नहीं है। गौर करने वाली बात ये है कि जहां तेजस्‍वी यादव नीतीश कुमार पर सवाल उठा रहे हैं। वहीं, आरजेडी प्रवक्‍ता शक्ति यादव ने भी पाला बदलने का संकेत देना शुरू कर दिया। उन्‍होंने पुल का स्‍पैन गिरने की घटना पर बयान देते हुए इस भ्रष्‍टाचार के लिए बीजेपी का जिम्‍मेदार ठहराया। उन्‍होंने कहा कि नीतीश कुमार बेमेल गठबंधन में हैं। ऐसे में बिहार की राजनीति पर निगाह रखने वालों का मानना है कि बिहार में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल फिर से बनने लगा है।

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