वंशवादियों ने कब्जाई देश की राजनीति, जमीनी नेतृत्व का टोटा! 

कार्यकर्ताओं को समझा जाने लगा है गुलाम, विचारधारा पर हावी हो रहे दाम 

लोकतंत्र में पैदा किया जा राजतंत्र, 

देश को नहीं मिल पा रहा जमीनी और जुझारू नेतृत्व, विकल्प न होने की वजह से जनता का मज़बूरी बना नाकारा नेताओं को ढोना 

चरण सिंह 
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही दिखावे में कहा हो पर यदि देश की राजनीति को वंशवाद और परिवारवाद से परे 100000 युवा गए तो वंशवादियों के कब्जे से राजनीति को काफी हद तक छुड़ाया जा सकता है। ऐसे ही प्रख्यात पत्रकार रहे कुलदीप नैयर ने वंशवाद की राजनीति को देश के लिए घातक नहीं बताया था ? वंशवाद की राजनीति से देश में नेतृत्व का लगातार अभाव होता जा रहा है।
दरअसल वंशवाद पर टिकी राजनीति न केवल देश को जमीनी और जुझारू नेतृत्व मिलने में बाधक साबित हो रही बल्कि विकास भी प्रभावित हो रहा है। वंशवाद पर टिके दल प्राइवेट कंपनी बन कर रह गए हैं। कार्यकर्ता इन पार्टियों के मुखिया के लिए गुलाम जैसे हैं। ये दल अपने परिवार को ही आगे बढ़ा रहे हैं। अपना घर भर रहे हैं। इन नेताओं को न तो देश से मतलब है और न ही समाज से, बस किसी तरह से सत्ता मिल जाये और फिर फिर सत्ता की मलाई चाटने में मस्त हो जाते हैं। ऐसे नहीं है कि बीजेपी परिवारवाद और वंशवाद से बची हो। बीजेपी में भी जमकर वंशवाद और परिवारवाद हो रहा है। हां बीजेपी पर अभी तक पूरी तरह से किसी वंशवादी या फिर परिवारवादी नेता का कब्ज़ा नहीं हो पाया है। उसकी बड़ी वजह आरएसएस का हस्तक्षेप रहा है।
दरअसल ये वंशवादी और परिवारवादी देश में जमीनी नेतृत्व नहीं उभरने दे रहे हैं। उत्तर प्रदेश नगीना से सांसद चंद्रशेखर आज़ाद और बिहार पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव देश का सबसे बड़ा उदाहरण है। चंद्रशेखर आज़ाद को अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने एन मौके पर धोखा दे दिया। चंद्रशेखर आज़ाद ने अपनी पार्टी से चुनाव जीतकर अपने को साबित किया। आज़ाद समाज पार्टी से चंद्रशेखर का लड़ना एक  तरह से निर्दलीय ही माना गया है।
ऐसा ही पप्पू यादव के के साथ किया गया। लालू प्रसाद यादव ने पहले पप्पू यादव की पार्टी का विलय कॉंग्रेस में करा दिया और बाद में मीसा भारती को अपनी पार्टी से चुनावी मैदान में उतार दिया। अब दोनों नेता सांसद हैं तो वंशवादी नेता इन्हें पचा नहीं पा रहे हैं। कहना गलत न होगा कि देश की राजनीति को कुछ परिवारों ने कब्ज़ा रखा है। देश की राजनीति गिने चुने परिवारों इर्द-गिर्द घूम रही है। ये राजनीतिक परिवार सत्ता में आकर अपने परिवारों, रिस्तेदारों और कुछ खास धन कुबेरों तक ही सीमित रह जा रहे हैं। विकल्प न होने का फ़ायद इन परिवारों को हो रहा है।
ऐसे में यदि बात कांग्रेस की करें तो इस परिवार पर नेहरू परिवार को कब्ज़ा रहा है। पंडित जवाहर लाल नेहरू, उनके बाद इंदिरा गांधी, फिरोज गांधी, संजय गांधी फिर राजीव गांधी- सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी। राबर्ट वाड्रा लाइन में। मेनका गांधी और वरुण गांधी भाजपा में। ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी वंशवाद से बची हुई है। भारतीय जनता पार्टी में राजमाता, माधव राजे सिंधिया(कांग्रेस), विजयराजे सिंधिया, वसुंधरा राजे, दुष्यंत सिंह, यशोधरा राजे सिंधिया, ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजनाथ सिंह उनके पुत्र पंकज सिंह दूसरे पुत्र नीरज सिंह, प्रेम कुमार धूमल, उनके पुत्र अनुराग ठाकुर, लाल जी टंडन, आशुतोष टंडन अमित टंडन, यशवंत सिन्हा उनके पुत्र जयंत सिन्हा, कल्याण सिंह उनके पुत्र राजवीर सिंह राजू भैया, प्रेमलता, संदीप सिंह, ये सभी वंशवाद को आगे बढ़ा रहे हैं। कभी बीजेपी की सहयोगी पार्टी रही शिरोमणि अकाली दल में प्रकाश सिंह बादल, सुखबीर सिंह बादल, हरसिमरत कौर बादल, अधेश प्रताप सिंह बादल और मनप्रीत सिंह बादल। ऐसे ही  शिव सेना में बालासाहेब ठाकरे, उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे और राज ठाकरे। हालांकि अब दो पार्टी हो गई हैं। डीएमके में एम करुणानिधि, एम. के. स्टालिन, एम. के. अलागिरी, दयानिधि अझगिरी कनिमोई, मुरासोली मारन, दयानिधि मारन और कलानिधि मारन।
ऐसे ही नेशनल कांफ्रेंस में शेख अब्दुल्ला, बेगम अकबर जहां अब्दुल्ला, फारुख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और गुलाम मोहम्मद शाह। राष्ट्रीय लोक दल में चौधरी चरण सिंह, चौधरी अजीत सिंह, जयंत चौधरी, सरोज सिंह, ज्ञानवती,
और चारु चौधरी। बीजू जनता दल में बीजू पटनायक, नवीन पटनायक और गीता मेहता। ऐसे ही राष्ट्रीय जनता दल में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, मीसा भारती, रागनी आचार्य, साधु यादव और सुभाष यादव।
समाजवादी पार्टी में भी यही हाल है। मुलायम सिंह यादव, रामगोपाल यादव, शिवपाल यादव, रणवीर यादव, अखिलेश यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव, अदित्य यादव, अक्षय यादव, तेज प्रताप यादव, अनुराग यादव। अर्पणा यादव बीजेपी में। आज़म खां, तंजीम बेगम और अब्दुल्ला आज़म। मुन्नवर हसन, तबस्सुम हसन, नाहिद हसन और इकरा हसन।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शरद पवार, सुप्रिया सुले, और अजित पवार। अजित पवार अब अलग हो गए हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी में  ओमप्रकाश राजभर, उनका बेटा अनिल राजभर पार्टी का महामंत्री व 2024 में लोकसभा चुनाव लड़ा। आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन में अब्दुल वाहिद ओवैसी, सलाहुद्दीन ओवेशी, असदउद्दीन ओवैसी, अकबरुद्दीन ओवैसी। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी में हनुमान बेनीवाल और नारायण बेनीवाल` इंडियन नेशनल लोक दल में ताऊ देवीलाल, ओमप्रकाश चौटाला, रणजीत चौटाला, अजय चौटाला, अभय चौटाला, नैना चौटाला, दुष्यंत चौटाला, दिग्विजय चौटाला, कांता चौटाला, आदित्य चौटाला, करण चौटाला, अर्जुन चौटाला` अब दो पार्टी बन गई हैं।
निषाद राज पार्टी में संजय निषाद मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार, प्रवीण निषाद सांसद। अपना दल में अनुप्रिया पटेल मंत्री और आशीष पटेल। अपना दल कमेरावादी में कृष्णा पटेल और उनकी बेटी पल्लवी पटेल। जम्मू और कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) में मुफ़्ती मौहम्मद सईद और महबूबा मुफ्ती। बहुजन समाज पार्टी में मायावती, उनके भाई आनंद, भतीजे आकाश आनंद। तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि इन वंशवादियों ने लोकतंत्र में राजतन्त्र घुसेड़ दिया है।
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