जलवायु परिवर्तन के दौर में प्राकृतिक खेती काफी महत्वपूर्ण : राज्यपाल

दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला की हुई शुरुआत

सुभाषचंद्र कुमार
समस्तीपुर पूसा। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विवि में शनिवार को बदलते जलवायु परिदृश्य में प्राकृतिक खेती और उसके महत्त्व पर दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद महामहिम राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर ने कहा कि प्राकृतिक खेती पर दो दिनों तक चलने वाले इस विमर्श में निश्चित ही ठोस निर्णय निकल कर आयेगा।जिससे किसानों को फायदा होगा।

 

उन्होनें कहा कि जलवायु परिवर्तन के दौर में प्राकृतिक खेती काफी महत्वपूर्ण है। हमारी संस्कृति में प्राकृतिक खेती के विचार और पद्धति पहले से मौजूद है। जिसे लोगों ने भूला दिया। उन्होंने कहा कि वृक्ष के बेहतर स्वास्थ्य के लिए हमारे यहां वृक्ष आयुर्वेद की पद्धति भी है। जिसकी जानकारी आमलोगों को नही है। जिसे घर-घर तक पहुंचाना चाहिए। एवं छोटे-छोटे बच्चे के स्कूलो में भी वृक्ष आयुर्वेद और प्राकृतिक खेती के विषय में बताना चाहिए।

उन्होंने कहा कि देश के पास विश्व गुरु बनने की सभी शक्तियां है। हम सब को मिलकर उस ओर कार्य करने की जरूरत है। उन्होंने कुलपति डॉ. पाण्डेय का धन्यवाद दिया और कहा कि इस तरह की कार्यशाला समय समय पर होते रहना चाहिए। जिससे कृषि के भविष्य को बेहत्तर दिशा दी जा सके। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती लाभकारी है और इसके आर्थिकी पर भी चर्चा होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन पद्धति में वामन वृक्ष या बोनसाई की भी चर्चा है। उन्होंने कहा कि हमें स्व संस्कृति, स्व विचार और स्व पद्धति से जुड़ना चाहिए। जिसे हम लोगों ने पिछले कुछ वर्षों में भूला दिया है। कुलपति डॉ. पीएस पाण्डेय ने कहा कि भारत ऋषि और कृषि का देश है। उन्होंने कहा कि कृषि धन और ज्ञान प्रदान करती है।

पंचमहाभूत, मृदा, जल, अग्नि, आकाश और हवा इन्हीं पर कृषि की पारिस्थितिकि निर्भर करती है। प्राकृतिक खेती इन सभी महाभूतो के समन्वय और कृषि के पुरातन विचार से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि विवि ने प्राकृतिक खेती पर बीएससी (आनर्स) नेचुरल फार्मिंग पर कोर्स शुरू किया है। जिसका राज्यपाल के कर कमलो से औपचारिक शुरूआत हो रही है।

उन्होंने पूसा के इतिहास के संबंध में भी विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि पूसा का संबंध वेदकालीन पुषण देवता से है। जो पोषण, कृषि और पशुओं के देवता माने जाते हैं। इस अवसर पर प्राकृतिक खेती से संबंधित पुस्तका का विमोचन किया। भारतीय किसान संघ के संगठन मंत्री दिनेश दत्तात्रेय कुलकर्णी ने कहा कि प्रकृति के रहस्यो को समझते हुए खेती करने की आवश्यकता है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में प्राकृतिक खेती सबसे उपयुक्त है। यह सनातन नियमो पर आधारित है। केन्द्रीय कृषि विवि झांसी के कुलपति डॉ. अशोक कुमार सिंह ने कहा कि कृषि रसायनो के प्रयोग से मानव स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता कम हो रही है। इसलिए हमें प्राकृतिक खेती की ओर से मुड़ने की आवश्यकता है।

वाईएस परमार विवि, सोलन हिमाचल प्रदेश के कुलपति डॉ. राजेश्वर सिंह चंदेल ने कहा कि देश की 33 प्रतिशत भूमि रसायनिक खादों के कारण बंजर होने की स्थिति में है। मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। हमारे पुराने बीज लुप्त प्राय हो गये। ऐसे में प्राकृतिक खेती और देशी गाय पर किसानों को ध्यान देने की आवश्यकता है।

हमारे आसपास कीटनाशक पौधे मौजूद है। जिन्हें गाय व अन्य जानवर नहीं खाते हैं। उन्ही का सत्व बनाकर छिडकाव करने से कीटनाशक का कार्य करता है। संचालन वैज्ञानिक डा कुमारी अंजनी एवं डा रितंभरा ने की वहीं धन्यवाद डीन डॉ मयंक राय ने किया। इससे पूर्व राज्यपाल ने विवि के संविधान पार्क का उद्घाटन किया। साथ ही लीची मधू के छोटे शैशे पैकेट का लोकार्पण किया। यह पैकेट 10 रुपये के मूल्य पर विवि में उपलब्ध है।

मौके पर सूचना पदाधिकारी डा कुमार राज्यवर्धन सहित सभी अधिष्ठाता, निदेशक, वैज्ञानिक सहित प्राकृतिक खेती के यूजी छात्र छात्राएं मौजूद थे।

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