लोकतंत्र से खिलवाड़

रामलखन गुर्जर 
हाल ही में संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में चार राज्यों में भाजपा को बड़ी जीत हासिल हुई है। जबकि बहुत से पत्रकारों और राजनैतिक विश्लेषकों का अनुमान था कि इस बार भाजपा के खिलाफ माहौल बन गया है। खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में किसान आंदोलन, लखीमपुर खीरी कांड और हाथरस, उन्नाव जैसे मामलों में योगी सरकार की जो किरकिरी हुई थी, उससे भाजपा की हार तय नजर आ रही थी। इसके बावजूद भाजपा जीत गई, हालांकि उसकी सीटें पहले से कम हुई हैं। लेकिन बहुमत भाजपा को ही हासिल हुआ है।

2022 के विधानसभा चुनावों से पहले भी भाजपा लोकसभा के साथ-साथ कई विधानसभाओं और नगर निगमों के चुनाव जीतते आ रही है। मोदी-शाह की जोड़ी को भारत की चुनावी राजनीति में हराना नामुमकिन दिखने लगा है। जनता के बीच यही संदेश जा रहा है कि भाजपा सुशासन और विकास के सहारे चुनाव जीतती है। लेकिन अब एक ऐसा खुलासा हुआ है, जिसमें आरोप लगे हैं कि भाजपा को जिताने के पीछे देश के उद्योग घराने और सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म्स की मिलीभगत है। एक पूरा गठजोड़ तैयार किया गया है, जो बड़े सधे हुए तरीकों से कानून की खामियों का फायदा उठाते हुए भाजपा के पक्ष में माहौल बनाता है और इसके साथ ही कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों के बारे में गलत सूचनाएं जनता तक पहुंचाता है, ताकि विपक्षी नेताओं का नाम खराब हो।

भारत के एक गैर-लाभकारी मीडिया संगठन ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ (टीआरसी) और सोशल मीडिया पर राजनीतिक विज्ञापनों का अध्ययन करने वाले ‘एड वॉच’ ने एक खुलासे में बताया है कि सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म फ़ेसबुक पर भाजपा के लिए गलत तरीकों से विज्ञापन कर पार्टी के पक्ष में माहौल बनाया गया है, ताकि उसे चुनाव में फायदा मिल सके। वहीं कांग्रेस की बदनामी के लिए भी गलत ख़बरें को प्रसारित की गईं। टीआरसी और एड वॉच ने फेसबुक पर फ़रवरी, 2019 से नवंबर, 2020 तक राजनीतिक विज्ञापनों पर 5,00,000 रुपये (6,529 डॉलर) ख़र्च करने वाले सभी विज्ञापनदाताओं की पड़ताल की है।
\22 महीने और 10 चुनावों के दौरान दिए गए विज्ञापनों के विश्लेषणों से पता चला है कि फ़ेसबुक ने बड़ी संख्या में गुमनाम (घोस्ट) और सरोगेट विज्ञापनदाताओं को गुप्त तरीके से भाजपा के चुनाव अभियानों पर पैसे ख़र्च करने और भारत के सत्ताधारी दल को और अधिक दृश्यता बढ़ाने की इजाजत दी। यह पड़ताल एड लाइब्रेरी एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (एपीआई) के जरिए की गई है। अपनी जांच में द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने पाया कि भाजपा और इसके उम्मीदवारों ने आधिकारिक तौर पर 26,291 विज्ञापन दिए, जिसके लिए कम से कम 10.4 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
इन विज्ञापनों को फेसबुक पर 1.36 अरब व्यूज़ मिले। जबकि 23 गुमनाम और सरोगेट विज्ञापनदाताओं ने भी फेसबुक पर 34,884 विज्ञापन दिए, जिसके लिए उन्होंने फेसबुक को 5. 83 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान किया और इन विज्ञापनों को 1.31 अरब से ज्यादा व्यूज़ मिले। यानी जितने व्यूज़ सही तरीके से विज्ञापन देने पर मिले, लगभग उतने ही व्यूज़ सरोगेट विज्ञापनों से भी मिले। ख़ास बात ये है कि सरोगेट विज्ञापनदाताओं ने अपनी असली पहचान या भाजपा के साथ अपने संबंधों को छिपाए रखा।
गौरतलब है कि भारतीय कानून, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सरोगेट विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाते हैं। इन कानूनों का मकसद चुनावों में पारदर्शिता बनाए रखना है, ताकि उम्मीदवारों द्वारा किया जाने वाला चुनावी खर्च तयशुदा कानूनी सीमा के भीतर रहे। लेकिन निर्वाचन आयोग ने इन कानूनों के दायरे में सोशल मीडिया को नहीं रखा, जिसका लाभ भाजपा ने उठाया है। इस पड़ताल में ये भी पता चला है कि फेसबुक ने किसी न्यूज़ रिपोर्ट की शक्ल में झूठा दावा करते हुए विज्ञापन चलाया। जैसे 2019 के आम चुनाव में भाजपा ने आतंकवाद की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाया और फेसबुक में इसके बाद एक विज्ञापन, ख़बर की शक्ल में आया, जिसके शीर्षक में बताया गया कि प्रज्ञा ठाकुर को मालेगांव कांड में विस्फोटक रखने के लिए अपनी मोटरसाइकिल देने के आरोप से ‘बरी’ कर दिया गया है। जबकि ये सरासर झूठ है। मगर इस विज्ञापन का फायदा मिला और प्रज्ञा ठाकुर जीत गईं।

इसी तरह अप्रैल 2019 में राहुल गांधी के खिलाफ इसी तरह का विज्ञापन समाचार की शक्ल में चलाया गया, जिसका शीर्षक था ‘जब राहुल ने मसूद अज़हर को जी बोला’। इसे चार दिन के अंदर करीब साढ़े छह लाख बार देखा गया। और राहुल गांधी की छवि खराब करने में मदद मिली। एड लाइब्रेरी अनुसार ये दोनों विज्ञापन न्यूज़ (एनईडब्ल्यूज़े) नाम के फ़ेसबुक पेज द्वारा दिए गए थे। न्यूज़ का शब्द विस्तार ‘न्यू इमर्जिंग वर्ल्ड ऑफ जर्नलिज्म लिमिटेड’ है, जो भारत के सबसे बड़े दूरसंचार और इंटरनेट समूह जियो प्राइवेट लिमिटेड की एक सहायक कंपनी है, जिसका स्वामित्व अरबपति मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह के पास है।

इस पूरी पड़ताल में और भी कई गंभीर खुलासे हुए हैं, जिनसे पता चलता है कि कैसे भाजपा को जिताने के लिए उद्योग जगत और सोशल मीडिया प्लेटफार्म का पूरा गठजोड़ काम कर रहा है। टीआरसी और एड वॉच के इस खुलासे से यह पता चलता है कि कैसे लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ हो रहा है। अब तक ईवीएम से छेड़छाड़ के मसले पर ही सरकार और निर्वाचन आयोग की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिले हैं। जिनसे हमेशा ये संदेह बना रहता है कि जीत के लिए सत्ताधारी दल ईवीएम में हेरफेर कर सकते हैं। अब ये दूसरा मसला लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की राह में खड़ा हो गया है । संसद में इस मामले को उठाते हुए सोनिया गांधी ने कहा है कि फ़ेसबुक द्वारा सत्ता की मिलीभगत से जिस तरह सामाजिक सौहार्द्र भंग किया जा रहा है, वह हमारे लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। वहीं माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने इसे हमारे लोकतंत्र की नींव का खुलेआम विनाश करार दिया। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि रिलायंस को यह बताना चाहिए कि वह फ़ेसबुक पर भाजपा के प्रचार पेज के जरिये फर्जी खबरों को वित्तपोषित क्यों कर रही है?

इस मामले के खुलासे से कई सवाल उठे हैं, जिनका जवाब देने की जिम्मेदारी भाजपा और निर्वाचन आयोग की है। लेकिन यह देखकर निराशा होती है कि सत्तारुढ़ भाजपा अपनी जवाबदेही से बार-बार बचती है। लोकतंत्र के साथ इस खिलवाड़ पर जनता को भी जागरुक होना पड़ेगा, आखिर लोकतंत्र उसी का है, उसी से है। Dr Ramlakhan gurjar

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