16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने भारत के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने भारतीय जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने हथियार डाले, और 93,000 पाकिस्तानी सैनिक कैदी बन गए। इससे पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बन गया। इस करारी हार की जांच के लिए पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने 1972 में चीफ जस्टिस हमूदुर रहमान की अगुवाई में एक कमीशन गठित किया। यह कमीशन 1972 से 1974 तक चली जांच के बाद 1974 में अपनी मुख्य रिपोर्ट सौंपा। रिपोर्ट के ‘नैतिक पहलू’ वाले अध्याय ने सबसे ज्यादा विवाद खड़ा किया, जिसमें हार का मुख्य कारण पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारियों का नैतिक पतन बताया गया। कमीशन ने पाया कि शराब, सेक्स और भ्रष्टाचार में डूबे होने से अधिकारियों की नेतृत्व क्षमता और लड़ने की इच्छाशक्ति खत्म हो गई थी। मार्शल लॉ के दौर से शुरू हुई यह गिरावट जनरल याह्या खान के शासन में चरम पर पहुंच गई।
जनरल याह्या खान पर आरोप
याह्या खान 1969 में सत्ता में आए तानाशाह थे, जो शराब पीने और रंगीन पार्टियों के शौकीन माने जाते थे।
कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक, याह्या और उनके करीबी अधिकारियों ने सत्ता के शीर्ष पर नशे और अनैतिकता का ऐसा माहौल बनाया कि युद्ध के दौरान भी वे ‘व्यस्त’ बने रहे। ढाका से हार की खबरें आ रही थीं, लेकिन कमांडर-इन-चीफ पार्टियों में मग्न थे।
उनकी सबसे करीबी ‘जनरल रानी’ नाम से मशहूर अकलीम अख्तर थीं, जो प्रमोशन और सरकारी ठेकों को नियंत्रित करती थीं। मशहूर गायिका नूरजहां भी याह्या के घर आती-जाती रहीं।
गवाहों के बयानों से पता चला कि आत्मसमर्पण के ठीक समय याह्या हैंगओवर से जूझ रहे थे, और उनकी एक करीबी कुछ घंटे पहले उनके घर से निकली थी। कमीशन ने सीधे नाम तो नहीं लिए, लेकिन इन महिलाओं को हार का प्रतीक माना गया।
कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक, याह्या और उनके करीबी अधिकारियों ने सत्ता के शीर्ष पर नशे और अनैतिकता का ऐसा माहौल बनाया कि युद्ध के दौरान भी वे ‘व्यस्त’ बने रहे। ढाका से हार की खबरें आ रही थीं, लेकिन कमांडर-इन-चीफ पार्टियों में मग्न थे।
उनकी सबसे करीबी ‘जनरल रानी’ नाम से मशहूर अकलीम अख्तर थीं, जो प्रमोशन और सरकारी ठेकों को नियंत्रित करती थीं। मशहूर गायिका नूरजहां भी याह्या के घर आती-जाती रहीं।
गवाहों के बयानों से पता चला कि आत्मसमर्पण के ठीक समय याह्या हैंगओवर से जूझ रहे थे, और उनकी एक करीबी कुछ घंटे पहले उनके घर से निकली थी। कमीशन ने सीधे नाम तो नहीं लिए, लेकिन इन महिलाओं को हार का प्रतीक माना गया।
लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी पर सबसे सख्त टिप्पणियां
पूर्वी पाकिस्तान के कमांडर नियाजी पर कमीशन ने सबसे कड़े आरोप लगाए। उन्हें अनैतिकता, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी का दोषी ठहराया।
लाहौर के एक वेश्यालय से उनके रिश्ते, पूर्वी पाकिस्तान से पान मसाला की तस्करी, और सैनिकों से रिश्वत लेने के सबूत मिले।
सैनिकों के बीच मशहूर था वाक्य: जब कमांडर खुद ऐसा है, तो हम क्यों रुकें?” इससे सेना में अनुशासन पूरी तरह टूट गया, और लड़ाकू इच्छा समाप्त हो गई।
कमीशन ने नियाजी को कोर्ट मार्शल की सिफारिश की, लेकिन कभी अमल नहीं हुआ।
लाहौर के एक वेश्यालय से उनके रिश्ते, पूर्वी पाकिस्तान से पान मसाला की तस्करी, और सैनिकों से रिश्वत लेने के सबूत मिले।
सैनिकों के बीच मशहूर था वाक्य: जब कमांडर खुद ऐसा है, तो हम क्यों रुकें?” इससे सेना में अनुशासन पूरी तरह टूट गया, और लड़ाकू इच्छा समाप्त हो गई।
कमीशन ने नियाजी को कोर्ट मार्शल की सिफारिश की, लेकिन कभी अमल नहीं हुआ।
अन्य निष्कर्ष और प्रभाव
कमीशन ने पाया कि ये बड़े अधिकारी शराब, औरतों और भ्रष्टाचार में इतना डूबे थे कि उनकी निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो गई। नैतिक पतन ने सेना को अंदर से कमजोर कर दिया, जो सैन्य गलतियों से कहीं ज्यादा घातक साबित हुआ।
रिपोर्ट में कई अन्य अधिकारियों पर भी आरोप लगे, और सभी बड़े अफसरों की कोर्ट मार्शल की सिफारिश की गई। हालांकि, राजनीतिक दबाव में ये सिफारिशें कभी लागू नहीं हुईं।
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि असली कारण बंगालियों पर अत्याचार, 1970 के चुनाव न मानना और अलगाववाद थे, लेकिन कमीशन के सबूत नैतिक गिरावट को हार का प्रमुख कारक बताते हैं। रिपोर्ट दशकों तक गोपनीय रही। याह्या खान की 1980 में मौत हो गई, जबकि नियाजी 2004 तक जिए लेकिन कभी मुकदमे का सामना नहीं किया।
रिपोर्ट में कई अन्य अधिकारियों पर भी आरोप लगे, और सभी बड़े अफसरों की कोर्ट मार्शल की सिफारिश की गई। हालांकि, राजनीतिक दबाव में ये सिफारिशें कभी लागू नहीं हुईं।
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि असली कारण बंगालियों पर अत्याचार, 1970 के चुनाव न मानना और अलगाववाद थे, लेकिन कमीशन के सबूत नैतिक गिरावट को हार का प्रमुख कारक बताते हैं। रिपोर्ट दशकों तक गोपनीय रही। याह्या खान की 1980 में मौत हो गई, जबकि नियाजी 2004 तक जिए लेकिन कभी मुकदमे का सामना नहीं किया।








