’15 साल साथ रहे, बच्चा भी है; अब यौन उत्पीड़न का आरोप क्यों?’ लिव-इन रिलेशनशिप पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप पर कई मौकों पर अहम टिप्पणियां की हैं, जिनमें लंबे समय तक साथ रहने के बाद शादी के झूठे वादे पर यौन उत्पीड़न या बलात्कार (rape under false promise of marriage) का आरोप लगाने को लेकर सख्त रुख अपनाया गया है।
आपके बताए शीर्षक (’15 साल साथ रहे, बच्चा भी है; अब यौन उत्पीड़न का आरोप क्यों?’) से सबसे करीब मामला मार्च 2025 का है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 16 साल की लंबी लिव-इन रिलेशनशिप वाले केस में महिला के आरोपों पर सवाल उठाए और पुरुष के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

 

कोर्ट ने क्या कहा?

 

कोर्ट की बेंच (जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता) ने कहा कि अगर दो वयस्क (educated और qualified) व्यक्ति लंबे समय तक (यहां 16 साल) आपसी सहमति से साथ रहते हैं, शारीरिक संबंध बनाते हैं, और एक बच्चा भी हो जाता है, तो बाद में “शादी का झांसा देकर संबंध बनाए” का आरोप लगाना विश्वसनीय नहीं होता।
इतने लंबे समय तक संबंध बनाए रखना खुद सहमति (consent) का सबूत माना जा सकता है। केवल शादी न करने या रिश्ता टूटने को बलात्कार या यौन उत्पीड़न नहीं बनाया जा सकता, जब तक शुरुआत से ही धोखे का इरादा साबित न हो।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि महिला शिक्षित थी, दोनों अलग-अलग शहरों में रहते हुए भी संबंध जारी रखे, और इतने सालों बाद आरोप लगाना संदिग्ध लगता है।

यह टिप्पणी लिव-इन रिलेशनशिप में सहमति और लंबे समय के व्यवहार को महत्व देने वाली है। कोर्ट का मानना है कि लंबे सह-निवास (cohabitation) से implied consent (अनुमानित सहमति) मानी जा सकती है।
महिला को क्या सलाह/टिप्पणी?
कोर्ट ने सीधे तौर पर “महिला को यह सलाह” नहीं दी, लेकिन अपने फैसले में साफ संकेत दिया कि:

लंबे समय तक लिव-इन में रहकर और बच्चा पैदा करने के बाद, रिश्ता टूटने पर रेप या यौन उत्पीड़न का केस आसानी से नहीं बनता।
ऐसे मामलों में अदालतें गंभीरता से जांच करें कि क्या वाकई शुरुआत में धोखा था, या यह सामान्य ब्रेकअप/रिश्ते की समाप्ति है।
महिला को कानूनी रूप से घरेलू हिंसा अधिनियम या मेंटेनेंस (भरण-पोषण) के तहत राहत मांगने का अधिकार हो सकता है, लेकिन IPC की धारा 376 (rape) जैसी गंभीर धाराएं लंबे consensual रिलेशन में आसानी से लागू नहीं होतीं।

अन्य संबंधित फैसले
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा है कि:

शादी का वादा टूटना अकेला रेप नहीं बनाता, जब तक साबित न हो कि पुरुष का इरादा शुरू से ही केवल शारीरिक संबंध बनाने का था।
लिव-इन रिलेशनशिप दो वयस्कों की पसंद है और इसमें सहमति महत्वपूर्ण है।

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