वेनेजुएला में चुनी हुई सरकार के राष्ट्रपति दंपती को अमेरिका द्वारा उठवा लेना एक स्वतंत्र राष्ट्र के वजूद के साथ क्रूर खिलवाड़

संप्रभुता और लोकतंत्र को बचाना दुनिया के स्वतंत्रता पक्षधरों के लिए बड़ी चुनौती : अजय खरे

 

रीवा । समता सम्पर्क अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप के उत्तरी भाग में मौजूद वेनेजुएला की स्वतंत्रता और संप्रभुता को ताक पर रखते हुए अमेरिका के द्वारा एयर स्ट्राइक करके वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी धर्मपत्नी का अपहरण कर बंधक बना लिया जाना अत्यंत आपत्तिजनक चिंताजनक शर्मनाक निंदनीय कृत्य है। यह कार्यवाही एक स्वतंत्र राष्ट्र के वजूद के साथ क्रूर खिलवाड़ है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी कार्रवाई तो अपहरण करके फिरौती मांगने वाले गिरोहों जैसी है। अमेरिका अपने से काफी कमजोर देश पर हावी होकर उनके प्राकृतिक संसाधनों को अपने कब्जे में लेना चाहता है। यह उसका साम्राज्यवादी हथकंडा है। वेनेजुएला के विशाल तेल भंडारों पर अमेरिकी गिद्ध दृष्टि के चलते ऐसा हो रहा है।

श्री खरे ने बताया कि न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सीधे फोन कर करके इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और युद्ध है। ज़ोहरान ममदानी की इस प्रतिक्रिया पर अमेरिका में कोई उनकी देशभक्ति पर सवाल नहीं खड़ा कर रहा है लेकिन यदि भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मनमानी क्रियाकलाप पर कोई एक शब्द भी बोल दे तो उसे देशद्रोही बताते हुए अंधभक्तों के हमले शुरू हो जाते हैं। वेनेजुएला मामले में भारत सरकार के द्वारा दबी जुबान से दी गई प्रतिक्रिया महज खानापूर्ति है।

लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि अमेरिका के द्वारा वेनेजुएला के खिलाफ की गई इस तरह की कार्यवाही को किसी भी दृष्टि से सही नहीं ठहराया जा सकता है। यह बात पूरी दुनिया के लोकतंत्र के लिए खुली चुनौती और चुप रहना कायरता है। दुनिया के छोटे देशों की संप्रभुता पर अमेरिका लंबे समय से हमला कर रहा है। इराक पर झूठे आरोप लगाकर उसकी संप्रभुता पर 20 मार्च 2003 को हमला किया गया था। उस समय भारतीय संसद ने भी इस कार्यवाही से असहमति जताते हुए विरोध प्रकट किया था। अमेरिका ने इराक़ में कठपुतली सरकार बनाकर अपदस्थ किए गए राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के ऊपर मुकदमा चलवाकर उन्हें फांसी पर लटकवा दिया। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डब्लू जॉर्ज बुश ने सद्दाम हुसैन के द्वारा उन पर की गई टिप्पणी को लेकर जिस तरह का बदला लिया वह बहुत ही घटिया अमानवीय था। बाद में इराक पर लगाए गए रासायनिक हथियार रखने के आरोप पूरी तरह झूठे निकले। इराक के अपदस्थ राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर इराक की अदालत ने फैसला सुनाया था लेकिन वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी के मामले में अमेरिका ने अपहरण करके अपने यहां हिरासत में ले रखा है और मुकदमा भी अमेरिका में चलाया जाएगा, जो सरासर गलत है। अमेरिका को न तो उन्हें गिरफ्तार करने का अधिकार है न ही मुकदमा चलाने का। यह तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरासर गुंडागर्दी और आतंकवादी कार्रवाई है। यह वेनेजुएला की संप्रभुता पर घोषित हमला और अंधेरगर्दी है। यह पूरी दुनिया में आतंक फैलाकर अपना दबदबा बनाए रखने का अत्यंत घिनौना कार्य है। यहां यह बताना जरूरी है कि अमेरिका ने आतंक फैलाने वाले बिन लादेन को भी निकोलस मादुरो तरह शिकार बनाया था लेकिन उसे मौके पर मार दिया गया था। पाकिस्तान के ऐबटाबाद शहर में 2 मई 2011 की रात्रि में ओसामा बिन लादेन को घर से उठाने वाले अमेरिका सैन्य अभियान में मारा गया। उसकी मौत के 12 घंटे बाद अमेरिका के विमान वाहक पोत विन्सन पर शव को एक सफेद चादर में लपेटकर एक बड़े थैले में रखा गया और फिर अरब सागर में डुबो दिया गया। उसका शव समुद्र में कहां डुबोया गया इसका आज तक पता नहीं है। निश्चित रूप से ओसामा बिन लादेन खूंखार आतंकवादी था यदि उसे विधि सम्मत तरीके से सजा (फांसी )होती तो अमेरिका के ऐसे गलत हौसलें बुलंद नहीं होते। आज़ अमेरिकी मनमानी इस कदर बढ़ गई हैं कि वह संप्रभुता संपन्न देश पर हमला करके आतंक फैला रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तानाशाही को लेकर यदि आज अमेरिका को आतंकवादी देश कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक संप्रभु देश वेनेजुएला और वहां के चुने हुए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की चुनौती को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से अपनी प्रतिष्ठा का विषय बनाकर गली के गुंडो की तरह हरकत की वह बहुत ही घटिया अमानवीय अशोभनीय एवं पूरी दुनिया में आतंक फैलाने वाली है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी आतंकवादी कार्य शैली से दुनिया के तमाम राष्ट्रों को यह संदेश देना चाहते हैं कि उनका जो भी विरोध करेगा उसको इसी तरह सबक सिखाया जाएगा। अमेरिकी दबाव में आने वाली डरपोक सरकारों की कमी नहीं है फिर भी इस मनमाने तौर तरीके पर पूरी दुनिया में जमकर नाराजगी और जन विरोध जारी है। संप्रभुता और लोकतंत्र बचाना दुनिया के स्वतंत्रता पक्षधरों के लिए बड़ी चुनौती है।

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