रोमांस में मदमस्त एक इंसान!

हालांकि‌ अधिकतर रोमांस ‌ शब्द का इस्तेमाल स्त्री पुरुष के‌ प्रेम संबंधों ‌ के ‌ संदर्भ में किया जाता है, ‌ लेकिन रोमांस शब्द के ‌ दायरे ‌ की कोई हद बंदी नहीं‌ की जा सकती। विचारधारा, ‌ कला, साहित्य, संगीत ‌ के रोमांस में ‌ अल मस्त ‌ रमाशंकर सिंह का आज जन्म दिवस है।

 

इससे पहले भी मैंने उनके स्कूली जीवन से नए-नए निकले तथा‌ दिल्ली यूनिवर्सिटी के‌ हंसराज कॉलेज में ‌ इकोनॉमिक्स ऑनर्स के छात्र भी अभी नहीं बने थे कि उनकी जीवन यात्रा पर अब तक जो मैंने देखा,सुना या भोगा है, उसको लिखा है। जो गुजर चुका है उसमें वाक़्यात,की तारीखी‌ हकीकत वक्त के साथ नहीं बदलती लेकिन जो इंसान मुसलसल नयी यात्रा पर निकलता हो और जीवन की कशमकश के साथ समाजी, सियासी हालात पर ‌ रस्साकस्सी करने में आदतन रस लेता हो या यह कहें उसको अपनी फर्ज अदायगी मानकर या यह सोचकर कि अगर मैं नहीं लिखूंगा या बोलूंगा तो फिर मेरे औरों में क्या फर्क है, लगातार,‌ रोजमर्रा सोशल मीडिया में बेबाक़ी से चुभने या हकीकत को बयां करने में जुटा हो,‌‌ ‌ वैचारिकता के सवाल पर अपने‌ साथियों को भी लपेटने ‌ मैं गुरेज न करता हो तो जाहिर है उसके चाहने वालों या दुलत्ती मारने वालों की कमी होने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
यह इंसान चाहता‌ तो शान शौकत, ईशरत के साथ सभी का भला बनकर रह सकने की हैसियत में है, परंतु जब लड़कपन में ही समाजवादी विचार दर्शन की ‌घुटटी,‌ जिसमें संघर्ष, जेल यात्रा, ‌ जहां अन्याय वही प्रतिकार, जद्दोजहद‌ करने की आदत घुस गई हो और वह भी केवल किताबी नहीं जमीनी भी हो‌ तो उसका असर भी तो आखिरकार जोर मारेगा ही।
अपनी सूझबूझ, मेहनत, कड़े संघर्षों झंझावातों से गुजरते हुए जिस आईटीएम तालिमी मरकज की स्थापना इन्होंने की वह भी कम अजूबा नहीं। हालांकि ‌ एक निजी विश्वविद्यालय बना देना कोई बड़ी बात नहीं हिंदुस्तान के अनेकों मालदार घराने ऐसी यूनिवर्सिटी बना चुके हैं, और बना रहे हैं। परंतु शैक्षणिक योग्यता के उच्च मानदंडों ‌‌ को अपनाने के कारण आईटीएम यूनिवर्सिटी को ‌ नेक ए का ग्रेड भी मिल गया। शैक्षणिक योग्यता के साथ-साथ साहित्य, कला, संगीत, स्थापत्य, पेंटिंग के क्षेत्र में मे भी नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए।
परंतु मेरा सरोकार समाजवादी विचार दर्शन के प्रचार प्रसार, संरक्षण से है। उस संदर्भ में जो रफ्तार इन्होंने पकड़ रखी है आज के दौर में वह एक नायब नजीर है। शायद हिंदुस्तान में फिलहाल यही एक केंद्र है जहां समाजवादी साहित्य संग्रह की प्रक्रिया निर्बाध रूप से चल रही है। समाजवाद के मुतालिक किसी भी नई किताब, रचना की तीन-चार ‌ प्रतिया वहां पर भेजी जा सकती है, भेजी जा रही है। प्रोफेसर आनंद कुमार ने अपने निजी पुस्तकालय ‌ की अति महत्वपूर्ण किताबें विश्वविद्यालय को भेंट कर दी। विश्वविद्यालय के द्वारा तकरीबन 20 पुस्तकें प्रकाशित ‌की जा चुकी है। डॉ राममनोहर लोहिया मेमोरियल लेक्चर, डॉ राममनोहर लोहिया सभागार, मधु लिमए सभा कक्ष विद्यार्थियों को इन महान समाजवादियों को जानने का मौका दे रहा है।
‌ बहुलता ‌ मैं समाजवादी सिद्धांतों, विचार दर्शन, नीतियों,‌ कार्यक्रमों,‌ इतिहास तथा उसके सिद्धांत कारों ‌ के कार्यों ‌ जीवनियों ‌ पर लिखित रूप में ‌ साहित्य मौजूद है, ‌ परंतु वह बिखरा हुआ है, ‌ किसी एक स्थान पर वह एकत्रित नहीं है। लिखित के अतिरिक्त ‌ मौखिक रूप से ‌ उसकी क्रियाकलापों की गाथाओं के ‌ विशद इतिहास‌ के सहभागी‌ जो अब उम्र दराज हो चले हैं, ‌ से जाना जा सकता है ‌ उसकी अब तक कोई व्यवस्था या कार्य योजना नहीं है। हैदराबाद के बद्री विशाल पित्ती, ‌ जवाहरलाल नेहरू म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के डायरेक्टर डायरेक्टर डॉक्टर हरदेव शर्मा, ‌ तथा डॉक्टर मस्तराम कपूर ‌ ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य अवश्य किया है। परंतु नए संदर्भ में ‌ व्यक्तिगत रूप से कुछ‌ प्रयास अवश्य किए गए हैं, किए जा रहे हैं, ‌ परंतु संस्थागत ‌ ‌ कोई‌ एक केंद्रीय कृत व्यवस्था अभी तक उपलब्ध नहीं है जहां पर सारे साहित्य का ‌ संचय, पांडुलिपियों दस्तावेजों का रखरखाव तथा इसका प्रकाशन,‌ पुनः ‌ प्रकाशन और वितरण केंद्र तथा वितरण की कोई व्यवस्था अभी तक उपलब्ध नहीं है। आए दिन अनेकों जिज्ञासु लोग साहित्य को पढ़ने के लिए किताबें खरीदना चाहते हैं परंतु कोई व्यवस्था न होने के कारण निराशा हाथ लगती है।
इससे संदर्भित तीन दिन पहले रमाशंकर ने मुझे जो नोट भेजा‌ उसको पढ़कर मैं ‌ रोमांचित हो उठा।समाजवादी साहित्य, ‌ उसके इतिहास, कृतियां‌, सिद्धांतकारो, विचारको,‌ नेताओं की‌ रचनाओं के साथ-साथ मौखिक रूप से वर्तमान में विदयमान‌ उम्र दराज नेताओं, कार्यकर्ताओं से उस गौरवमयी परंपरा‌ के अज्ञात‌ वृतांत, ‌ किस्से कहानी‌ को रिकॉर्ड करने ‌ की‌ व्यवस्थित शुरुआती कार्ययोजना रमाशंकर ने प्रस्तुत की हैं‌ जिसको व्यापक स्तर ‌ पर विचार विमर्श करके ‌ एक ठोस आकार देकर इसको‌ अति शीघ्र शुभारंभ करने की पहल की है । जो निम्नलिखित है।
परिचय एवं परियोजना की दृष्टि
भारतीय समाजवादी आंदोलन ने देश की लोकतांत्रिक कल्पना, श्रमिक वर्ग की राजनीति और शोषण के विरुद्ध संघर्षों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिर भी देश के समाजवादी नेताओं, विचारकों, कार्यकर्ताओं और संगठनों के अनुभवों, स्मृतियों और आवाज़ों का समुचित प्रलेखन अब भी अधूरा है, खासकर अंग्रेज़ी और हिंदी में सुलभ रूप में। जैसे-जैसे पहली और प्रमुख समाजवादी पीढ़ी उम्रदराज़ हो रही है, उनके मौखिक अनुभव, दस्तावेज, और ऐतिहासिक सामग्रियों को संरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि भावी शोध, जनशिक्षा और सामूहिक स्मृति विचार के लिए सुरक्षित रह सके।
भारतीय समाजवादी आंदोलन के मौखिक अभिलेखागार का उद्देश्य है कि जीवित समाजवादी नेताओं, लेखकों, कार्यकर्ताओं और संगठनों के मौखिक अनुभव, पुस्तकें, फोटो, डायरियाँ और अन्य ऐतिहासिक सामग्री का योजनाबद्ध संग्रहण, संरक्षण और प्रचार-प्रसार किया जाए। यह अभिलेखागार एक बहुआयामी डिजिटल संग्रह के रूप में कार्य करेगा। यह हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में सुलभ रहेगा। इसमें निजी यात्राएँ, संघर्ष, वैचारिक घोषणाएँ और आंदोलन की विविध रूपरेखाएँ भी शामिल होंगी।
उद्देश्य
महत्वपूर्ण समाजवादी नेताओं, सहभागी और प्रत्यक्षदर्शियों के मौखिक इतिहास और व्यक्तिगत अनुभवों को रिकॉर्ड करना।
संबंधित सामग्री – पुस्तकें, फोटो, पत्र, डायरियाँ और ऐतिहासिक दस्तावेज़ – संग्रहित और डिजिटाइज़ करना।
छात्र शोधकर्ताओं को मौखिक इतिहास, सांस्कृतिक अभिलेखन, ट्रांसक्रिप्शन, अनुवाद और नैतिक प्रलेखन में प्रशिक्षित करना।
हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में शोध, शिक्षा और संवाद को सुगम बनाना।
सामाजिक/राजनीतिक नेतृत्व/दल/दलों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों व संगठनों के साथ सहभागिता की स्थापना।
कार्यप्रणाली और प्रक्रिया
प्रशिक्षण एवं चयन: छात्रों को मौखिक इतिहास, अभिलेखन, ऑडियो-वीडियो उपकरणों के संचालन, ट्रांसक्रिप्शन और अनुवाद में प्रशिक्षित करना।
फील्डवर्क: प्रशिक्षुओं को अनुसंधान सहायकों और समन्वयकों की निगरानी में संबंधित समाजवादी नेताओं, लेखकों और संगठनों के पास साक्षात्कार और सामग्री संग्रह हेतु भेजना।
अभिलेखन और डिजिटाइजेशन: सभी सामग्री को एक सुरक्षित डिजिटल अभिलेखागार में संग्रहित करना; रिकॉर्ड की गई सामग्री का संपादन, नोट्स, ट्रांसक्रिप्शन और अनुवाद करना।
सामग्री निर्माण: रिकॉर्ड की गई सामग्री को प्रकाशन योग्य रूप देने के लिए संपादक, ट्रांसक्राइबर और लेखक नियुक्त करना।
तकनीकी एवं प्रशासनिक आधारभूत संरचना: कार्यालय, कंप्यूटर, इंटरनेट, ऑडियो-वीडियो उपकरण तथा परियोजना प्रबंधन के लिए एक समर्पित टीम लीडर की व्यवस्था करना।
टीम संरचना
परियोजना निदेशक / टीम लीडर (एक)
अनुसंधान सहयोगी/सहायक (दो)
संपादक/ट्रांसक्राइबर/लेखक (द्विभाषी) – (एक)
छात्र प्रशिक्षु (फील्डवर्क एवं अभिलेखन) – (चार या छह)
तकनीकी और प्रशासनिक सहयोगी स्टाफ – (एक)
भाषा और सुलभता
सभी सामग्री हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में संपादित व उपलब्ध कराई जाएगी। सटीकता, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और विस्तृत पहुँच के लिए अनुवादक तैनात किए जाएंगे।
सहभागिता नेटवर्क
आरंभिक विचार-विमर्श एवं कार्यशाला के लिए प्रमुख नेताओं, शिक्षाविदों, पत्रकारों व संगठनो‌‌ को आमंत्रित किया जाएगा।
प्रस्तावित विचार मंथन कार्यशाला (दिसंबर 2025, प्रथम सप्ताह)
1. एक दिवसीय कार्यशाला का उद्देश्य:
अभिलेखागार की दृष्टि, क्षेत्र और नैतिकता पर विमर्श
कार्यप्रणाली, टीम, तकनीकी आवश्यकताओं व निधि व्यवस्था को अंतिम रूप देना
संभागिता का तंत्र निर्माण और दीर्घकालीन योजना तैयार करना
महत्वपूर्ण प्रतिभागियों और संगठनों की सूची तैयार करना
योजना क्रियान्वयन के लिए खाका व घोषणापत्र तैयार करना
2. अपेक्षित परिणाम
एक व्यापक, द्विभाषी मौखिक अभिलेखागार की स्थापना
भारतीय समाजवादी विरासत की समझ और चेतना में वृद्धि
युवा शोधकर्ताओं को नए कौशल, प्रशिक्षण एवं रोजगार के अधिक अवसर
ब्रेनस्टॉर्मिंग कार्यशाला फ़्रेमवर्क
कार्यशाला का उद्देश्य
मौखिक अभिलेखागार की रूपरेखा और दिशा पर सहमति बनाना
परियोजना के तकनीकी, संगठनात्मक, और भाषाई पक्षों पर विचार विमर्श
टीम और भूमिकाओं के निर्धारण के साथ कार्यप्रणाली को अंतिम रूप देना
आवश्यक संसाधनों और सहयोग नेटवर्क पर चर्चा
भविष्य की योजना और कार्यान्वयन रोडमैप तय करना
थीम्स और डिस्कशन टॉपिक्स
1. परियोजना की दृष्टि और महत्व
समाजवादी आंदोलन के मौखिक इतिहास का संरक्षण क्यों आवश्यक है?
दस्तावेज़ीकरण के उद्देश्य और संभावित लाभ
2. मौखिक अभिलेखागार की कार्यप्रणाली
साक्षात्कार के लिए चयन प्रक्रिया: किन नेताओं, कार्यकर्ताओं, और संस्थाओं से संपर्क किया जाए?
प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा: छात्रों को किन कौशलों में प्रशिक्षित करना आवश्यक?
फील्डवर्क एवं अभिलेखन प्रक्रिया
3. तकनीकी और प्रशासनिक आवश्यकताएँ
ऑडियो-वीडियो उपकरण, ट्रांसक्रिप्शन सॉफ़्टवेयर, और डिजिटल संग्रहण
अनुवाद और द्विभाषी प्रस्तुति की रणनीति
कार्यालय एवं टीम प्रबंधन
4. टीम गठन और भूमिकाएँ
स्थायी कर्मचारी: परियोजना निदेशक, संपादक, ट्रांसक्राइबर आदि
शोध सहायक और छात्र प्रशिक्षु के कार्य और जिम्मेदारियाँ
समन्वयन और गुणवत्ता नियंत्रण के उपाय
5. नैतिक मुद्दे और गोपनियता
साक्षात्कार के दौरान गोपनीयता का संरक्षण
अनुमति और उपयोग की सहमति
अभिलेख के सार्वजनिक उपयोग और अधिकार
6. संसाधन जुटाने और सहयोग नेटवर्क
वित्तीय संसाधन और फंडिंग विकल्प
अन्य संस्थाओं, विद्वानों, मीडिया और सामाजिक संगठनों के साथ साझेदारी
प्रचार और जागरूकता कार्यक्रम
7. दीर्घकालीन योजना
अभिलेखागार का रखरखाव और अपडेटिंग
सामुदायिक सहभागिता और उपयोगकर्ता पहुंच
संभावित प्रकाशन, शोध, और शैक्षिक कार्यक्रम
एक्शन पॉइंट्स
प्रमुख संबद्धों और लक्षित व्यक्तियों की सूची तैयार करना
प्रशिक्षण मॉड्यूल के मसौदे का विकास
उपकरण और संसाधन बेसलाइन आवश्यकताओं का मूल्यांकन
टीम सदस्यों के चयन और भर्ती के लिए योजना बनाना
फाइनेंशियल बजट और फंडिंग प्रस्ताव की रूपरेखा तैयार करना
गोपनीयता और नैतिकता से जुड़ी नीतियां बनाना
साझेदार संस्थाओं से संपर्क और संभावित सहयोग का निर्धारण।
शैक्षणिक पाठ्यक्रम के इतर, ‌ सम-सामयिक ‌ विषय पर ‌ मशहूर मारूफ ‌ अपने अपने विषय के महारथियों ‌ की मुख्तलिफ‌ ज्ञान चर्चा का आयोजन अक्सर‌ विश्वविद्यालय में आयोजित होता रहता है। साहित्यकारों, कवियों, लेखकों, ‌ शायरो,‌ संगीतकारो‌ की समय-समय पर प्रस्तुतियां बड़े स्तर पर विश्वविद्यालय में तो होती ही रहती है। परंतु निजी जीवन में ‌भी कला, साहित्य,‌ संगीत, दर्शन ‌‌ संबंधी वार्ता सुनने, जानने की‌ बलवती इच्छा‌‌ भी इनमें सदैव बनी रहती है। इसकी एक नजीर ‌ ग्वालियर के एक प्रसिद्ध साहित्यकार ‌ एवं कवि पवन करण जो हर महीने अपने घर की बैठकी में ‌ इसका आयोजन करते हैं उसमें भी रमा‌ बेनागा‌ शिरकत करते हैं। जब मैं ग्वालियर में होता हूं तो मुझे भी अपने साथ वहां पर ले जाते हैं। ग्वालियर में एक छोटा सा नाट्य समूह ‌ ‌ प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक‌ ऐजाज‌ खान के निर्देशन में नवीन प्रस्तुतियां जब भी मंचित करता है,‌ रमा बड़े चाव के साथ उसको देखने के लिए और भी कई युवाओं को ‌ अपने साथ ले जाने का प्रयास करते हैं। विश्वविद्यालय में स्थापत्य कला ‌ का तो नया इतिहास लिखा जा रहा है। २0 -३ 0 फुट‌ ऊंची ‌ कृतियां‌ स्थापित की जा रही हैं। ज्ञान परंपरा के अंतर्गत ‌ पौराणिक आख्यानों, ‌ से लेकर ‌ भारतीय मनीषा के ‌ महान सूफी संतों ‌ पर आधारित ‌ सैद्धांतिक, ‌ निर्गुण, सगुण रूप में प्रस्तुतियों ‌ का आयोजन हो रहा है। कवि सम्मेलन, ‌ शेरो शायरी के‌ प्रोग्राम ‘इबारत,‌ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत ‌ का‌ 3 दिन का संगीत समारोह‌ बहुत ही सुरुचि पूर्ण तरीके से‌ आयोजित हो रहे हैं। जिसकी रूहेंरंवा‌ रमाशंकर सिंह ही है।‌
शुभकामनाओं सहित
राजकुमार जैन

‌जन्मदिवस के बहाने!
प्रोफेसर राजकुमार जैन
अनुज साथी रमाशंकर सिंह का ( 23 दिसंबर) को जन्म दिवस है। इस मौके पर चलन के मुताबिक यार दोस्त, घरवाले, रिश्तेदार, सहकर्मी, पड़ोसी, अपनी शुभकामनाएं भेजते ही हैं, परंतु मैं उस औपचारिकता को निभाने के लिए नहीं बल्कि एक ऐसा साथी जिसके साथ तकरीबन 55 साल का सफर रहा है, हर तरह के उतार-चढ़ाव खुशियां गम से न केवल हम वाकिफ हैं, संगत भी रही है। मैंने अपनी जिंदगी में अनेक लोगों के जीवन में दौलत शोहरत के बेशुमार उतार चढ़ाव को देखा है, परंतु जितना बड़ा बदलाव रमा में देखा, उसकी एक अलग ही कहानी है। सोशलिस्ट तहरीक से हमारी वैचारिक यात्रा शुरू हुई, जो निजी रिश्तों में बधंती गई। मुझे ऐसा लगता है कि किसी भी साथी के द्वारा अपनी विचारधारा, मिशन, सिद्धांतों, विचारों को आगे बढ़ाने में उसके द्वारा किए गए योगदान को रेखांकित रेखांकित करना भी आंदोलन के नजरिए से बेहद जरूरी है।
एक खांटी सोशलिस्ट का शैक्षणिक, सांस्कृतिक, कला, साहित्य, संगीत, स्थापत्य, पेंटिंग मूर्ति शिल्प, लोककलाओं, पेड़ पौधों, प्रकृति के विभिन्न छटाओं की जानकारी और उसका आचमन न सिर्फ अपने तक सीमित, बड़े पैमाने पर औरों को भी उसका रस रंजन करने का मौका भी रमा ने दिया है।
समाजवादी आंदोलन में डॉ राममनोहर लोहिया,मधु लिमए, बद्री विशाल पित्ती के बाद रमा एक ऐसा इंसान दिखाई दिया जिसने कला की दुनिया के मुख्तलिफ रंगों, कलाकारों रंगकर्मियों, साहित्यकारों, मूर्ति शिल्पियों, कवियों शायरों के जमावडे की न केवल संगत की, औरों को भी इनको नजदीक से निहारने, समझने और गुफ्तगू करने का मौका भी प्रदान किया।मेरी यादें 19 69 -70 के दशक में पहुंच गई। रमा ने 11वीं की परीक्षा पास कर ली थी पर अभी तक यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं लिया था। इसी दौरान सब्जी मंडी के पास की एक धर्मशाला में समाजवादी युवजन सभा की ओर से 11वीं पास करने वाले बच्चों के स्वागत तथा उन्हें अब आगे क्या करना है इसकी सलाह देने के लिए एक सभा आयोजित की गई थी। रमा और विजय प्रताप उसी सभा में पहली बार मुझसे मिले थे, उसी दिन मैंने उनको अपने कॉलेज हॉस्टल के कमरे में आने का आग्रह किया था। जसवीर सिंह,विजय प्रताप और रमा ने उसी साल 11वीं की परीक्षा पास की थी अगले दिन रमा मेरे हॉस्टल में आए थे मुझे उन दिनों में सोशलॉजी ऑनर्स में दाखिला दिलाने का भूत चढ़ा हुआ था। मैंने इन तीनों को सोशियोलॉजी ऑनर्स में दाखिला लेने के लिए सुझाव दिया परंतु केवल विजय प्रताप ने सोशियोलॉजी ऑनर्स में दाखिला लिया। जसवीर सिंह ने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में तथा रमा ने हंसराज कॉलेज में बीए ऑनर्स इकोनॉमिक्स में दाखिला लिया। लगभग 55 साल होने जा रहे हैं।आज के रमाशंकर सिंह की बहुत बड़ी तादाद में हर वर्ग राजनीति, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, कला के मुख्तलिफ रंगो शास्त्रीय संगीत, चित्रकला, स्थापत्य, वन्य जीवन के साथ- साथ लेखकों, कवियों, पत्रकारों सांस्कृतिक कर्मियों, नाटक कर्मियों आभासी दुनिया की मशहूर – मारूफ हस्तियों से विशेष पहचान बनी है।
इस सांस्कृतिक एवं भौतिक विकास के विभिन्न सोपानो से शायद बहुत कम लोग वाकिफ होगेॅ। इनकी आज की बनी हुई शख्सियत का आंकलन ही इनके आज के जानकार साथी, मित्र, सहकर्मी कर सकते हैं। परंतु मैं फख्र के साथ कह सकता हूं कि इनके जीवन की इस लंबी यात्रा के विभिन्न चरणों को मैंने देखा है। आज के इनके चाहने वाले इन्हें देखकर रश्क भी कर सकते हैं और कुछ लोगों में आंशिक रूप से ईर्ष्या का भाव भी उत्पन्न हो सकता है। परंतु मैंने 11 वीं पास उस बालक की इस लंबी यात्रा मैं जो बाधाएं, संकट, व्यवधान, अभाव, से फौलादी इरादे से जूझने का जज्बा भी देखा है।
मुझे आज तक याद है उन दिनों दिसंबर -जनवरी में दिल्ली में पडने वाली हॉड कंपकपाती सर्दी की रातों में, समाजवादी विचारों में दीक्षित होने के कारण, रात -रात भर हाथ में कूची और रंगों को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय की दीवारों पर, डॉ राममनोहर लोहिया के विचारों की सूक्तियां को लिखने के लिए पहले दीवारों को सफेदी अथवा गेरुआ रंग से पोतना, फिर कंधे पर लाई गई सीढी पर एक हाथ से दीवार या कोई और सहारा लेकर दूसरे हाथ से लिखना, खासतौर से इनसे इस काम को पूरी रात साथी इसलिए भी करवाते थे इनकी लिखावट इतनी शानदार होती थी कि सुबह विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं बड़ी आसानी से उसको पढ़ सकते थे। दिल्ली यूनिवर्सिटी में होने वाले आंदोलनों, जलसो, जुलूसो में नारा लगाने से लेकर भाषण देने तक। दिल्ली की सोशलिस्ट तहरीक में दरिया उठाने, माइक लगाने,स्टेज बनाने के लिए सिर पर तखत उठा कर लाने, प्रदर्शन करते हुए पुलिस की मार और जेल जाने कि लंबी तकलीफ भरी इस प्रक्रिया से यह गुजरे हैं। यह तो मैंने केवल एक दृश्य प्रस्तुत किया है, कहानी बहुत लंबी है। हां, एक बात और मुझे कहनी है। इनके पिताजी आम अभिभावकों की तरह इनके बारे में सपना देखते थे कि यह कोई बड़ा अफसर, डॉक्टर, इंजीनियर बने। परंतु जब ये पहली बार मेरे साथ जेल गए तो इनके पिताजी अपनी नाराजगी प्रकट करने के लिए मेरे हॉस्टल आए तो मैंने उनसे कहा था कि बाबूजी देखना कि यह एक दिन बड़ा आदमी बनेगा। उस दिन तो मेरी बात पर उनको यकीन नही आया और उनका गुस्सा बरकरार रहा। परंतु मैं कह सकता हूं कि आज वह होते तो निश्चित रूप से कहते हां यह ठीक ही कहता, था।
जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में कूदने के कारण उनके अध्ययन में व्यवधान पड़ा तो घर वालों ने इनकी शादी करने की ठान ली। इनके ससुर दिवंगत ठाकुर रतन सिंह जी मेरे मोहल्ले के रहने वाले थे, इसके बहाने एक मीठी याद भी दिलवा दिला दूं। जब रमा से वेअपनी बेटी की शादी करने की सोच रहे थे तो उनको मोहल्ले में मेरे बारे में पता चला, मेरा उनका घर बहुत पास में ही था, मोहल्ले के एक मित्र को लेकर ठाकुर साहब मुझसे मिलने आए और उन्होंने इनके बारे में दरयाफ्त किया। जाहिर है कि इनके बारे में जितनी झूठी – सच्ची बातें बना कर मैं कर सकता था कर दी। जिस तरह हर बाप अपनी बेटी के होने वाले शोहर के बारे में जानना चाहता है, वैसी हर तरह की जानकारी वह कुरेद कुरेद कर मुझसे लेना चाहते थे। मैंने अंत में कहा कि ठाकुर साहब रमा की आमदनी की आप फिक्र ना करें वह इतना टैलेंटेड है कि जो छोटी मोटी सरकारी नौकरियां हैं वह तो उसकी तौहीन है, वह इसके लिए नहीं बना है, उसकी दौड़ बहुत लंबी है। आप मुझे याद करोगे। शादी होने के बाद अक्सर वह कहा करते थे आपने सही कहा था। यह बात वह मोहल्ले में कई बार अपने संगी साथियों को भी कहते थे। मुझे याद पड़ रहा है की चांदनी चौक वाले ससुराल के घर मे कोई मांगलिक कार्यक्रम आयोजित था, उसमें रमा भी आए हुए थे, उसमें भी उस दिन ठाकुर साहब ने सबके सामने यह बात दोहराई थी।
कुछ दिनों के बाद आपातकाल की घोषणा कर दी गई। मैं मीसा में गिरफ्तार होकर तिहाड़ जेल में बंद हो गया। मेरे साथी जयकुमार जैन जेल में मुझसे मुसलसल मिलने आते थे, एक मोहल्ले में रहने के कारण उनकी ठाकुर साहब से निरंतर बात होती रहती थी, उससे मुझे पता लगा कि रमा भूमिगत होकर आपातकाल के विरुद्ध जूझता हुआ, छोटी-छोटी बुलेटिन, पर्चे, सूचनाओं के आदान-प्रदान तथा अन्य तरह से आपातकाल विरोधी कार्य में लगे हुए हैं। जिस समय रमा आपातकाल में भूमिगत होकर जगह जगह आपातकालीन विरोध के कार्य में जुटे हुए थे तो उस समय की एक बात ठाकुर साहब ने जयकुमार जैन को बताई थी कि इनका परिवार मोती बाग में किसी किराए के मकान में गुप्त नाम से रह रहा था। ठाकुर साहब उस समय इनके घर पर रोजमर्रा की जरूरत का सामान पहुंचाया करते थे। उन्होंने यह भी बताया था कि एक दिन उन्होंने देखा कि बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कपूरी ठाकुर भूमिगत होकर वहां इनकी सबसे बड़ी बेटी कनुप्रिया को गोद में खिला रहे थे। उनकी सेहत ठीक नहीं थी परंतु महीनों उनकी देखरेख सेवा इनके घर पर हो रही थी। भूमिगत अन्य साथियों से भी इनकी कुछ गतिविधियों के बारे में जेल में पता लगता रहता था। आपातकाल की समाप्ति के बाद ये वापस अपने गृह प्रदेश मध्य प्रदेश चले गए। हालांकि इनकी उम्र छोटी थी फिर भी पार्टी ने इन्हें चुनाव लड़ने की हिदायत दी। विधानसभा के चुनाव में जीत के बाद बनने वाले वीरेंद्र सकलेचा के मंत्रिमंडल में इन्हें मंत्री पद से भी नवाजा गया।
राजकुमार जैन

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