US जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट माइकल कुगेलमैन (अटलांटिक काउंसिल के साउथ एशिया सीनियर फेलो) ने इंडिया टुडे टीवी को दिए इंटरव्यू में नई दिल्ली को साफ चेतावनी दी है कि ईरान-इजरायल-US युद्ध के बीच भारत “मुश्किल स्थिति” में है।
कुगेलमैन ने ठीक क्या कहा?
एक तरफ इजरायल के साथ मजबूत रिश्ते: पिछले सालों में डिफेंस कोऑपरेशन बहुत बढ़ा है (एयर डिफेंस सिस्टम, ऑपरेशन सिंदूर में इजरायली टेक्नोलॉजी की भूमिका, PM मोदी का इजरायल दौरा)।
दूसरी तरफ ईरान और गल्फ देशों के साथ हित: चाबहार पोर्ट, एनर्जी सप्लाई, भारतीय डायस्पोरा, और नॉन-अलाइनमेंट पॉलिसी। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर भारत ने शोक भी जताया था।
नतीजा: बैलेंसिंग आसान नहीं। कुगेलमैन ने कहा, “भारत मुश्किल स्थिति में है… यह लड़ाई कितनी खतरनाक और विस्फोटक हो सकती है, और भारत पर एनर्जी सिक्योरिटी तथा गल्फ में रहने वाले लाखों भारतीयों के कारण बहुत असर पड़ सकता है।”
उन्होंने नई दिल्ली को सलाह भी दी:
“स्ट्रेटेजिक हितों की रक्षा करो, जरूरी पार्टनरशिप बनाए रखो, एनर्जी सिक्योरिटी सुरक्षित रखो और स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी के पुराने सिद्धांत का पालन करो। इस लड़ाई पर अपना मैसेज बहुत सावधानी से दो।”
पृष्ठभूमि क्या है?
पश्चिम एशिया में US-इजरायल और ईरान के बीच तनाव फरवरी 2026 से बढ़कर पूर्ण युद्ध (Operation Epic Fury जैसी स्ट्राइक्स) का रूप ले चुका है। होर्मुज स्ट्रेट प्रभावित होने से तेल-गैस सप्लाई, LPG सिलेंडर और व्यापार रूट्स पर असर पड़ रहा है। भारत पहले ही ईरान से तेल आयात कम कर चुका है, लेकिन चाबहार पोर्ट अभी भी स्ट्रेटेजिक है। IMEC कॉरिडोर vs चाबहार – दोनों ही दांव पर हैं।
भारत की विदेश नीति हमेशा स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी पर टिकी रही है – न US-इजरायल के साथ पूरी तरह, न ईरान के साथ। जयशंकर ने हाल में ईरानी विदेश मंत्री से बात की और डी-एस्केलेशन की अपील की है।
भारत के लिए असली चुनौती
एनर्जी: गल्फ से तेल-गैस आयात (सऊदी, UAE) और लाखों भारतीयों की नौकरियाँ।
डिफेंस: इजरायल से हाई-टेक हथियार।
ट्रेड: चाबहार से अफगानिस्तान-सेंट्रल एशिया रूट।
डायस्पोरा: गल्फ में 90 लाख+ भारतीय।
कुगेलमैन का कहना सही दिशा में है – भारत को किसी एक पक्ष में नहीं जाना चाहिए, बल्कि सभी हितों का बैलेंस रखना होगा। भारत पहले भी ऐसे संकटों (2019-20 ईरान-US तनाव) से निकल चुका है।





