ब्राह्मण बनाम वेश्या प्रकरण : मैं कैसे मीठी बात करूं मैंने तो मिठाई खाई नहीं

राजेश बैरागी

क्या समाजवादी पार्टी प्रवक्ता राजकुमार भाटी मीठी जुबान बोलना भूल गए हैं? मैं हातिम सादाब सिद्दीकी साहब की उस कविता से बहुत प्रभावित हूं जिसमें एक मासूम सी बच्ची पूछती है,-ये बात समझ में आई नहीं और मम्मी ने समझाई नहीं, मैं कैसे मीठी बात करूं मैंने तो मिठाई खाई नहीं।’ हालांकि गले को सुरीला करने के लिए गवैये मिश्री खाते रहते हैं परन्तु मीठी जुबान होने के लिए मिठाई खाने की अनिवार्यता नहीं है। दुनिया के सभी पेशेवर और प्रगतिशील समाजों में जाति और धर्म गौण होता जा रहा है।मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार साथी से मैंने एक अन्य पत्रकार जो बरसों से उनके साथ था,की जाति के बारे में पूछने पर उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की। सभ्य समाज व्यक्ति के गुण, उपलब्धियां,आचरण और चरित्र पर ध्यान देता है। रूढ़िवादी सोच के लोग एक पूरे समाज की तुलना वेश्या से करने के बाद उस समाज के कुछ लोगों को अच्छा होने का संदिग्ध प्रमाण-पत्र जारी करने लगते हैं। इससे क्या सिद्ध होता है या हो सकता है। केवल सामाजिक भेदभाव और वैमनस्यता बढ़ने के और क्या हासिल होगा। हालांकि वोटों के लिए सामाजिक भेदभाव पैदा कर वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए इस प्रकार की बातें बहुत उपयोगी साबित होती हैं। मैं जितना और जबसे राजकुमार भाटी को जानता हूं, ब्राह्मणों को लेकर उनके हृदय में गहरी असहिष्णुता है।

वे मानते हैं कि ब्राह्मणों ने उनके अधिकारों पर सदा से डाका डाला है। हालांकि वे उस समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता हैं जो जनेश्वर मिश्र जैसे ब्राह्मण नेता के पदचिन्हों पर चलकर यहां तक पहुंची है। वर्तमान में माता प्रसाद पाण्डेय उनकी पार्टी के विधानसभा में नेता और नेता विपक्ष हैं। गाजियाबाद से सुरेंद्र कुमार मुन्नी और अमरपाल शर्मा उनकी पार्टी के बड़े नेता हैं। क्या ये सभी ब्राह्मण नेता वेश्याओं से हीन हैं? हालांकि वेश्याओं को हीन बताने वाले लोगों से मैं कभी सहमत नहीं होता हूं।आमतौर पर वेश्यावृत्ति मजबूरी में अपनाया जाने वाला पेशा है। इस पेशे की शिकार महिलाएं रोजाना शारीरिक और मानसिक रूप से आहत होती हैं। उनके उद्धार के लिए कोई प्रयास न करने वाले लोगों पर उन्हें हीन कहने की नैतिक पाबंदी तो होनी ही चाहिए। राजकुमार भाटी जिला स्तरीय अच्छे पत्रकार थे।

मुझे पत्रकारिता का रास्ता उन्होंने ही दिखाया इसलिए मेरे गुरु समान हैं।राजनीति की चकाचौंध ने उन्हें राजनीतिक दल में शामिल करा दिया। राजनीति में सिद्धांत, नैतिकता और मर्यादा बची नहीं हैं। संभवतः राजकुमार भाटी भी उसी वर्तमान प्रचलित हीन राजनीति के वाहक बन गए हैं। हालांकि उनसे ऐसी अपेक्षा नहीं थी।(नेक दृष्टि)(ऐसे ही अन्य समाचारों आलेख के लिए हमारी वेबसाइट www.nekdristi.com देखें)

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