जब गांधी जी ने समाजवादियों को दी चेतावनी !

आज जब हम आज़ादी के मायने अपने-अपने नज़रिए से तय किए जा रहे हैं, गांधीजी की वह मुलाक़ात याद आती है जब 1947 में कुछ समाजवादी नेता उनसे मिलने आए थे। वे कांग्रेस हाईकमान पर विभाजन योजना को स्वीकार करने के लिए तीखा प्रहार कर रहे थे। लेकिन गांधीजी का उत्तर राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक गहराई से जुड़ा था।
उन्होंने कहा— “अब जब विदेशी शासक जा रहे हैं और सत्ता भारतीय हाथों में आने वाली है, तो यह समय विरोध का नहीं, सहयोग का है। अगर असहमति है, तो संवाद करो, लेकिन देश की नवजात स्वतंत्रता को जोखिम में मत डालो।”
गांधीजी ने चिंता समाजवादी मित्रों से कहा कि अभी तुम लोग समाजवाद का “क, ख, ग” भी नहीं समझ पाए हैं क्योंकि जब तक भारत सांप्रदायिकता और गुटबाज़ी के जाल में फंसा रहेगा, तब तक समाजवाद, समानता और न्याय केवल नारे बने रहेंगे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि
“पाकिस्तान इसी गुटबाज़ी का कड़वा फल है। जो राष्ट्र एकता में नहीं, विभाजन में शक्ति ढूंढ़ता है, उसका भविष्य भी अधूरा रहता है।”
गांधीजी ने एक गहरी बात कही जो आज भी हर राजनेता, कार्यकर्ता और नागरिक के लिए एक दिशासूचक यंत्र है। उन्होंने कहा कि
“हमारी सबसे बड़ी कमी यह है कि जैसे ही कोई हमसे असहमत होता है, हम उसे गलत ठहराने लगते हैं। मुद्दे की जगह व्यक्ति पर हमला करने लगते हैं, और इस तरह राष्ट्रीय एकता की नींव दरकने लगती है।”
उनका अंतिम संदेश आत्ममंथन से भरा था।उन्होंने कहा कि इस बूढ़े आदमी के इन शब्दों को याद रखना कि आने वाले समय में लोग हमारा मूल्यांकन हमारे नारे या लेबल से नहीं, बल्कि हमारे कर्म, त्याग और चरित्र की पवित्रता से करेंगे। अगर तुम जनता की पीड़ा को अपने दल के स्वार्थ के लिए उपयोग करोगे, तो यह पाप तुम्हारे ही सिर पर फूटेगा, ईश्वर तुम्हें विश्वासघात के लिए क्षमा नहीं करेगा।”
यह संदेश केवल समाजवादियों के लिए ही नहीं बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो सत्ता, विचारधारा या समूह के नाम पर जनता को बाँटने की कोशिश करता है। आज जब राष्ट्र फिर से वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है, गांधीजी की यह सीख पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है कि एकता से बड़ा कोई सिद्धांत नहीं, और ईमानदारी से बड़ी कोई राजनीति नहीं।

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