चाइनीज करेंसी में रूसी तेल का पेमेंट… क्या बिना BRICS करेंसी के भारत-चीन-रूस ने ट्रंप के डॉलर डॉमिनेंस को चुनौती दे दी?

भारत-चीन-रूस ने हाल ही में रूसी तेल के भुगतान को चीनी युआन (Renminbi) में शुरू करके डॉलर की प्रमुखता को एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण चुनौती दी है। यह कदम BRICS की प्रस्तावित नई मुद्रा के बिना ही उठाया गया है, और यह ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति तथा डॉलर-केंद्रित वैश्विक व्यापार को निशाना बना रहा है। आइए इसे विस्तार से समझें:
रूसी तेल का भुगतान युआन में: अक्टूबर 2025 में, भारत की सरकारी तेल कंपनियों (जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन) ने रूसी तेल के 2-3 कार्गो (जहाजों में लादे गए तेल) के लिए युआन में भुगतान किया है। इससे पहले ज्यादातर भुगतान रूबल में हो रहा था, लेकिन अब युआन का उपयोग बढ़ रहा है। रूस के उप-प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने पुष्टि की है कि भारत रूसी तेल के लिए युआन के साथ-साथ रूबल भी इस्तेमाल कर रहा है। यह बदलाव पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण आया है, जो रूस को डॉलर से दूर धकेल रहे हैं।
भारत का रूसी तेल आयात: 2022 से भारत रूस से सस्ते तेल की सबसे बड़ी खरीदार बन गया है। अक्टूबर 2025 तक, युआन भुगतान का हिस्सा अभी छोटा है (कुल आयात का 5-10% अनुमानित), लेकिन यह तेजी से बढ़ सकता है। व्यापारी युआन को प्राथमिकता दे रहे हैं क्योंकि कुछ विक्रेता अन्य मुद्राओं (जैसे डॉलर या यूरो) को स्वीकार नहीं कर रहे।
चीन की भूमिका: युआन का उपयोग चीन की ‘बेल्ट एंड रोड’ और वैश्विक व्यापार रणनीति का हिस्सा है। जब भारत युआन में भुगतान करता है, तो यह युआन की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता बढ़ाता है और डॉलर के विकल्प के रूप में इसे मजबूत करता है। यह त्रिपक्षीय व्यापार (भारत खरीदता, रूस बेचता, चीन मुद्रा प्रदान करता) का उदाहरण है।

 

ट्रंप और डॉलर प्रमुखता की चुनौती

 

ट्रंप का दावा: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे वादा किया है कि भारत रूसी तेल खरीदना बंद कर देगा। ट्रंप ने इसे “अच्छा कदम” बताया और चेतावनी दी कि अगर भारत नहीं रुका तो 25% टैरिफ लगाएंगे। लेकिन भारतीय सरकार ने इस दावे को खारिज कर दिया है—कोई ऐसी फोन कॉल नहीं हुई। ट्रंप का यह बयान रूस पर दबाव बनाने और डॉलर-केंद्रित ऊर्जा व्यापार को बचाने की कोशिश लगता है।
डॉलर प्रमुखता पर असर: तेल व्यापार परंपरागत रूप से डॉलर में होता है (पेट्रोडॉलर सिस्टम), जो अमेरिका को वैश्विक वित्तीय शक्ति देता है। युआन का उपयोग करके भारत-चीन-रूस ने इसे तोड़ा है—यह डी-डॉलरीकरण (de-dollarization) का एक व्यावहारिक कदम है। BRICS (ब्रिक्स) की नई मुद्रा अभी प्रस्तावित चरण में है (2025 में कजाकिस्तान शिखर सम्मेलन में चर्चा हुई, लेकिन लागू नहीं), इसलिए यह बिना उसके ही एक चुनौती है। X (पूर्व ट्विटर) पर चर्चाओं में इसे ट्रंप के दावों का मजाक उड़ाते हुए “डॉलर को चकमा” कहा जा रहा है।

 

क्या यह बड़ी चुनौती है?

 

हाँ, लेकिन सीमित: यह छोटा कदम है, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से मजबूत। अगर यह बढ़ा, तो वैश्विक ऊर्जा व्यापार में युआन का हिस्सा 20% तक पहुंच सकता है, जो डॉलर (वर्तमान में 80%+) को कमजोर करेगा। रूस और चीन पहले से ही BRICS देशों के साथ युआन-आधारित व्यापार बढ़ा रहे हैं।
ट्रंप के लिए खतरा: ट्रंप की नीतियां (टैरिफ, प्रतिबंध) डॉलर को मजबूत रखने पर टिकी हैं। भारत जैसे उभरते बाजार का युआन की ओर झुकाव अमेरिका के लिए नुकसानदेह है, खासकर जब भारत अमेरिका का प्रमुख रक्षा साझेदार है।

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