अखिलेश के लिए लगातार ढाल बन रहे बृजभूषण

उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बीच एक दिलचस्प सियासी समीकरण देखने को मिल रहा है। बृजभूषण शरण सिंह बार-बार अखिलेश यादव के लिए एक सियासी ढाल के रूप में उभर रहे हैं, जिससे बीजेपी और सपा के बीच चल रहे सियासी शह-मात के खेल में नया मोड़ आया है।
प्रमुख बिंदु:

 

बृजभूषण का अखिलेश के प्रति समर्थन:

 

बृजभूषण ने हाल ही में अखिलेश यादव के कुछ बयानों का समर्थन किया, खासकर कथावाचकों और धार्मिक आयोजनों को लेकर दिए गए बयान पर। जहां बीजेपी के कई नेता अखिलेश की आलोचना कर रहे थे, वहीं बृजभूषण ने इसे उनकी “राजनीतिक मजबूरी” करार देकर बचाव किया।
उन्होंने अखिलेश को “हनुमान जी का प्रशंसक” और “श्रीकृष्ण का वंशज” बताते हुए उनकी धार्मिक छवि को मजबूत करने की कोशिश की।
पूजा पाल मामले में भी बृजभूषण ने अखिलेश के सपा से निष्कासन के फैसले को सही ठहराया, जिससे बीजेपी का सपा के खिलाफ बनाया गया नैरेटिव कमजोर पड़ गया।

 

पुराने सियासी रिश्ते:

 

बृजभूषण का सपा के साथ पुराना रिश्ता रहा है। 2009 में जब बीजेपी से उनके रिश्ते खराब हुए थे, तब सपा ने उन्हें टिकट देकर संसद भेजा था।
बृजभूषण ने दावा किया कि जब अखिलेश यूपी के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने देवीपाटन मंडल को 500 करोड़ रुपये की योजनाओं का तोहफा दिया था, भले ही बृजभूषण उस समय सपा छोड़ने की बात कह चुके थे।

 

सियासी निहितार्थ:

 

बृजभूषण का अखिलेश के प्रति यह रुख बीजेपी के आंतरिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है, खासकर तब जब 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव नजदीक हैं।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि बृजभूषण अपनी राजनीतिक राह बदलने की ओर इशारा कर रहे हैं, क्योंकि उनके बेटे सांसद और विधायक हैं, और वे यूपी में अपनी सियासी जमीन मजबूत करना चाहते हैं।

 

विपक्षी दलों पर प्रभाव:

 

बृजभूषण का यह रुख सपा के “पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक” (PDA) नैरेटिव को मजबूती दे रहा है, जिसे बीजेपी कमजोर करने की कोशिश कर रही थी।
उनके बयानों ने बीजेपी के उस प्रयास को झटका दिया, जिसमें सपा को पाल-बघेल समाज का विरोधी बताया जा रहा था।

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