लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल कराने के लिए, उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए, वहां लोक सभा के दो चुनाव क्षेत्र सृजित करने के लिए व लद्दाख का अपना लोक सेवा आयोग गठित करने की मांग को लेकर एक आंदोलन चल रहा था। सोनम वांगचुक अपने पांचवें अनशन पर लेह में बैठे थे। अचानक 24 सितम्बर, 2025 को जब कुछ अनशनकारियों को अस्पताल ले जाया गया और सरकार की तरफ से आंदोलन के जवाब में कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही थी, युवाओं का सोनम वांगचुक के शांतिपूर्ण सत्याग्रह पर भरोसा नहीं रहा तो उनका धैर्य टूटा और उन्होंने आक्रामक रूख अख्तियार किया। नतीजा यह हुआ कि पुलिस की गोलीबारी में चार जानें गईं व 44 लोग घायल हुए। कई के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए और कई गिरफ्तारियां हुईं। एक युवा ने जो पुलिस कार्यवाही से विचलित हुआ था अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या कर ली। सांनम वांगचुक को हिंसा के मद्देनजर अपना अनशन वापस लेना पड़ा किंतु दो ही दिन बाद 26 सितम्बर का उनकी भी गिरफ्तारी हो गई। उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाया गया और उन्हें अगले छह माह जोधपुर जेल में बिताने पड़े। फिर सरकार ने खुद ही उनके खिलाफ दर्ज मुकदमा वापस ले लिया और वे रिहा हो गए। पर उन्हें गिरफ्तार ही क्यों किया गया अथवा उनका चरित्र हनन कर उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून क्यों लगाया गया इसके लिए किसी की जवाबदेही नहीं तय हुई। यह सरकार के मनमाने ढंग से काम करने का एक उदाहरण है। लोगों की मांग पर लेह हिंसा पर एक न्यायिक आयोग भी गठित हुआ जिसकी आख्या आज तक प्रतीक्षित है।
सरकार के दमनकारी तरीकों से आतंक का ऐसा माहौल निर्मित हुआ कि साल भर कोई आंदोलन नहीं हुआ। किंतु अब ऊपरलिखित चार मांगों के अलावा एक नई मांग जुड़ गई – पुलिस हिंसा से पीड़ितों अथवा उनके परिवारजनों को न्याय और 24 सितम्बर की घटना के सम्बंधित जितने भी मुकदमे दर्ज हुए उन्हें वापस लिया जाना।
लेह हिंसा के ठीक एक वर्ष बाद दो जन सभाएं आयोजित हुईं। 23 सितम्बर को कारगिल के बस स्टैण्ड से शुरु हुआ एक संक्षिप्त जुलूस हुसैनी पार्क में पहुंच कर एक जन सभा में बदल गया। कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक संगठनों के नेताओं से सभा को सम्बोधित किया। कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के सह-अध्यक्ष सज्जाद कारगिली ने सभा का संचालन किया जिसे वर्तमान में लद्दाख के एकमात्र सांसद हनीफा जान व कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के दूसरे सह-अध्यक्ष असगर करबलाई ने भी सम्बोधित किया। दिल्ली विश्ववि़ालय से छात्र समूह हिमखण्ड, उत्तर प्रदेश से सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के सदस्यों व मध्य प्रदेश के एक किसान नेता एकजुटता दिखाने के लिए इस सभा में मौजूद थे। सज्जाद कारगिली ने वहां उपस्थित बहुसंख्यक शिया समुदाय को सम्बोधित करते हुए कहा कि यदि वे अपने लिए न्याय की लड़ाई नहीं लड़ सकते तो उन्हें फिलीस्तीन को आजाद कराने के नारे लगाना अथवा इमाम हुसैन की शहादत को याद करना छोड़ देना चाहिए।
24 सितम्बर को लेह में पहले एन.डी.एस. स्मृति पार्क में विभिन्न बौद्ध सम्प्रदाय के लामाओं द्वारा अभी तक लेह के मुद्दे पर शहीद हुए सभी को प्रार्थना कर श्रद्धांजलि दी गई। इसके बाद एन.डी.एस. स्टेडियम में एक जन सभा हुई। इस सभा की खासियत थी दोनों कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस और लेह एपेक्स बॉडी के नेताओं की एक ही मंच पर उपस्थिति जो प्रतीकात्मक रूप से कारगिल के बहुसंख्यक शिया मुस्लिम समुदाय और लेह के बहुसंख्यक बौद्ध समुदाय की एकता का संदेश दे रही थी। ये दोनों संगठन ही लेह के मुद्दे पर सामूहिक संघर्ष के अग्रिम मोर्चें पर हैंं और सरकार के साथ बातचीत में संयुक्त रूप से शामिल होते हैं। यह गौर तलब है कि सरकार और आंदोलन विरोधी शक्तियों ने दोनों समुदायों के नेतृत्व में मतभेद पैदा करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है। फूट डालो और राज करो की नीति भाजपा शासन की विशेषता है जो देश के विभिन्न इलाकों में कहीं ज्यादा तो कहीं कम स्तरों पर हिन्दू-मुसलमान के बीच मतभेद के रूप में और मणिपुर में तो इसकी परिणति मैतेई व कुकी समुदायों के बीच पूर्ण अलगाव के रूप में, जिसकी चपेट में अब नागा समुदाय भी आ रहा है, देखी जा सकती है। देश के अन्य इलाकों में विभिन्न समुदायों के बीच जो दूरियां पैदा की गई हैं उसकी तुलना में तो लद्दाख में बौद्ध-मुस्लिम एकता एक शानदार साम्प्रदायिक सद्भावना का उदाहरण प्रस्तुत करती है जिससे भारत के दूसरे समुदाय भी सीख सकते हैं। लद्दाख के आंदोलन में कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस और लेह एपेक्स बॉडी ने संयुक्त रूप से मांगों को तय कर साथ-साथ प्रक्रिया में शामिल रहते हुए एकता की अद्भुत मिसाल पेश की है।
सोनम वांगचुक इस दिन जन सभा के सबसे लोकप्रिय वक्ता थे जिन्होंने विस्तार से पहले लद्दाखी भाषा में व फिर हिन्दी में अपनी बातें रखीं। उन्होंने यह उजागर किया कि अमित शाह पहले लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने को तैयार थे लेकिन फिर पलट गए। सोनम वांगचुक ने खुलासा किया कि अमित शाह ने कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस व लेह एपेक्स बॉडी के नेताओं से कहा कि यदि प्रधान मंत्री भी लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करना चाहें तो वे ऐसा नहीं होने देंगे। सोनम वांगचुक 24 सितम्बर 2025 की हिंसा के लिए सीधे तौर पर अमित शाह को ही दोषी मानते हैं क्योंकि अमित शाह द्वारा लद्दाख के लोगों को धोखा देने से युवाओं में आक्रोश पैदा हुआ और वे सड़क पर उतरे। उन्होंने देश में वर्तमान दौर में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही तय करने के अभियान, जिसमें नीट पर्चे के समय के पहले उजागर होने के मामले में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लिया जा चुका है, के क्रम में अमित शाह के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि राहुल गांधी जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारियों के ऊपर छर्रे के बौछार वाली बंदूकों के इस्तेमाल के लिए अमित शाह का इस्तीफा मांग सकते हैं तो लद्दाख में चार युवाओं की पुलिस की गोली से मौतों के लिए तो निश्चित रूप से अमित शाह से इस्तीफा मांगा जाना चाहिए।
सोनम वांगचुक ने कहा कि वे सरकार का हर किस्म का दमन झेल चुके हैं। उन्हें जेल में रखा गया, उनके शिक्षण संस्थान को सरकार द्वारा दी गई जमीन की अनुमति रद्द की गई और उनके संस्थान की विभिन्न सरकारी जांच संस्थाओं से जांच कराई गई। अब तो सिर्फ उनकी मुठभेड़ में हत्या करना ही बाकी रह गया है जिसके लिए भी वे तैयार हैं। उन्होंने अपनी जान को दांव पर लगा कर लद्दाख के लोगों में सरकार से बहादुरी से लड़ने का जज्बा और प्रतिबद्धता पैदा की है। यदि संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस व लेह एपेक्स बॉडी द्वारा रखी गई मांगों के अनुकूल एक विधेयक नहीं पारित करवाती है तो अगले वर्ष संघर्ष तेज होने के आसार हैं।
- संदीप पाण्डेय व गुंजन सिंह








