योगी को मोदी विकल्प मान रहा है बीजेपी का कोर वोटर
कोर वोटर को बिदकने से रोकने के लिए योगी को आगे बढ़ा सकता है आरएसएस
चरण सिंह
तो क्या पीएम मोदी वीपी सिंह साबित होने वाले हैं ? क्या यूजीसी एक्ट मोदी के लिए वीपी सिंह के मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने वाला साबित होने वाला है ? क्या यूजीसी, जनरल नरवणे की किताब, अमेरिकी से ट्रेड डील और यूजीसी एक्ट पर घिर चुके हैं ? क्या बीजेपी का कोर वोटर मोदी के विकल्प के लिए खुलकर चर्चा करने लगा है ? क्या बीजेपी का मातृ संगठन आरएसएस योगी को मोदी के विकल्प के रूप में तैयार करने में लग गया है ? क्या अमित शाह का प्रधानमंत्री बनने का सपना सपना ही बन रह जाएगा ? ये सब सवाल आज की तारीख में देश के राजनीतिक गलियारे में घूम रहे हैं।
दरअसल पीएम मोदी के ओबीसी के बावजूद बीजेपी के कोर वोटर राजपूत, ब्राह्मण, बनिया कास्यस्थ ने उन्हें अपना नेता माना पर यूजीसी एक्ट लागू करते ही बीजेपी का कोर वोटर पीएम मोदी से बिदक गया है। बीजेपी नेतृत्व के खिलाफ सड़कों पर आ गया। जहां ब्राह्मण सभा खुलकर बीजेपी का विरोध कर रही है वहीं करनी सेना भी सामने आ गई है। यह यूजीसी एक्ट का विरोध ही रहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस एक्ट पर रोक लगानी पड़ी। इस आंदोलन की खासियत यह रही कि भले ही सवर्ण समाज बीजेपी नेतृत्व के खिलाफ खड़ा हुआ हो पर योगी आदित्यनाथ के प्रति आंदोलनकारियों का रुख सॉफ्ट रहा है।
बीजेपी के कोर वोटर से पीएम मोदी से नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि पाकिस्तान से युद्ध के समय सीज फायर किया गया है। वह जानकारी भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दी। मोदी चुप्पी साध गए। ऐसे ही जब डोनाल्ड ट्रम्प ने 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया तब भी बीजेपी का कोर वोटर नाराज हुआ। अब जनरल नरवणे की किताब, अमेरिकी ट्रेड डील पर सरकार के ढुलमुल रवैये से बीजेपी का कोर वोटर नाराज है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या आरएसएस अब मोदी के विकल्प के रूप में योगी को तैयार करेगा।
दरअसल आज भी आरएसएस की पहली पसंद मोदी ही है। उसकी बड़ी वजह यह रही कि मोदी के आरएसएस के एजेंडे पर खुलकर काम किया। चाहे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मामला हो या फिर कश्मीर से 370 धारा हटाने का मामला हो या फिर आरएसएस का कोई भी काम पीएम मोदी ने उसे बखूबी किया है। ऐसे में आरएसएस जल्दी में कोई फैसला नहीं लेना चाहता है। वैसे भी आज की तारीख में योगी से अधिक पैठ मोदी की है। जब तक कृष्ण गोपाल आरएसएस और बीजेपी के समन्वयक का काम देखते रहे तब तक योगी आदित्यनाथ का मामला ठीक पर आज जब अरुण कुमार बीजेपी और आरएसएस के समन्वयक का काम देख रहे हैं तो योगी आदित्यनाथ का मामला थोड़ा ढीला पड़ा है।
बताया जाता है कि जब 2017 में जब पीएम और अमित शाह ने मनोज सिन्हा का नाम फाइनल कर दिया तो वह कृष्ण गोपाल ही थे जिन्होंने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनवाया था। बताया जाता है कि जब मोदी और अमित शाह ने मुरली मनोहर जोशी को मनोज सिन्हा का नाम लेकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के पास भेजा तो मोहन भागवत ने यह कह दिया था कि जब आप लोगों ने फाइनल कर ही लिया है तो मेरी क्या जरुरत है। तब आरएसएस का ही दबाव था कि योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया।
हालांकि योगी आदित्यनाथ आरएसएस से नहीं आते हैं और आरएसएस पृष्ठभूमि से आने वाले नेता को ही प्रधानमंत्री बनाता है। इसमें दो राय नहीं कि मोदी के बाद बीजेपी कोर वोटर योगी आदित्यनाथ को ही पीएम पद पर देखना चाहता है। योगी आदित्यनाथ को भले ही राजपूत नेता माना जाता हो पर वह सवर्णों के साथ ही हर हिन्दुओं के नेता माने जाते हैं। वैसे भी आज की तारीख में योगी बीजेपी में हिंदुत्व के ब्रांड हैं। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था के साथ ही विकास के मामले में भी योगी आदित्यनाथ की तारीख होती है। गत दिनों रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा था कि वह तो सोचते हैं कि योगी राज चलाने में माहिर हैं पर जिस तरह से उन्होंने उत्तर प्रदेश का विकास किया है उससे लगता है कि वह अच्छे अर्थशास्त्री भी हैं।
दरअसल बीजेपी के कोर वोटर की मोदी से नाराजगी की बात आरएसएस को भी पता चल रही है पर आरएसएस जल्द में कोई निर्णय नहीं लेनी चाहता है। फ़िलहाल योगी आदित्यनाथ की अगुआई में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ा जाना है। पर मोदी के विकल्प के रूप में योगी की चर्चा कर आरएसएस बीजेपी के कोर वोटर को बचाना चाहता है। वैसे भी बीजेपी का कोर वोटर फिलहाल बीजेपी को छोड़कर कहीं नहीं जा रहा है। वह न तो कांग्रेस में जा सकता है और न ही सपा में और न ही उस बीएससपी में जो आज की तारीख में सवर्णों का पैरवी कर रही। गत दिनों बीएसपी प्रमुख मायावती ने यूजीसी एक्ट का विरोध कर सवर्ण समाज का बचाव किया था। इस ही घूसखोर पंडत फिल्म पर उन्होंने ब्राह्मणों का बचाव किया था।
हां यह बात जरूर है कि यदि आरएसएस ने अपने कोर वोटरों की नाराजगी का इलाज जल्द नहीं किया तो उनका कोर वोटर बीजेपी से बिदक भी सकता है। वैसे भी सवर्ण समाज के लोग पोस्ट डालने लगे हैं कि यदि यूजीसी एक्ट न हटा तो बीजेपी ही हट जाएगी। ऐसे में प्रश्न उठता है कि गृह मंत्री अमित शाह के बारे में जो कहा जा रहा है कि वह प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक हैं तो उनका क्या होगा।
दरअसल बीजेपी का कोर वोटर सबसे अधिक नाराज ही अमित शाह से ही बताया जा रहा है। बीजेपी के कोर वोटर को लगता है कि अमित शाह प्रधानमंत्री बनने के चक्क्रर में योगी आदित्यनाथ को हटाना चाहते हैं। वैसे भी लोकसभा चुनाव में गृह मंत्री अमित शाह ने टिकट बंटवारे में योगी के एक न सुनी थी। यहां तक कि जनरल वीके सिंह को भी टिकट नहीं दिया था। यही वजह रही कि लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी 33 सीटों पर सिमट कर गई तो योगी के सर पर हार का ठीकरा फोड़ने का प्रयास किया गया पर योगी ने टिकटों के बंटवारे में उनकी सहमति की बात कर अपना बचाव किया। बाद में यूपी विधानसभा उप चुनाव की जिम्मेदारी योगी को दी गई और उन्होंने 10 में से 9 सीटें जीतकर अपने को साबित किया। अब देखना यह है कि आरएसएस पर बीजेपी के कोर वोटर की नाराजगी का कितना असर पड़ता है।








